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डार्क मोड

कहानी संग्रह: तेजाबी बिसात पर युवा चेहरे

युवाओं की पीड़ा और बेरोजगारी को रोमैंटिसाइज किए बगैर उन्हें उनके यथार्थ के साथ पेश किया है राजीव ने.

अपडेटेड 26 जनवरी , 2013

तेजाब
राजीव कुमार
भारतीय ज्ञानपीठ,
लोदी रोड, नई दिल्ली-3,
कीमत: 160 रु.
sales@jnanpith.net
इधर के दस-बारह सालों में कहानी की दुनिया में बहुत कुछ नया जुड़ा है. इस दरमियान कहानीकारों की एक ऐसी पीढ़ी प्रकट हुई है जिसने कहानी और जीवन दोनों को एक दूसरे के समानांतर ला खड़ा किया है. राजीव कुमार इसी पीढ़ी के एक विशिष्ट कथाकार हैं. तेजाब राजीव कुमार का पहला कथा संग्रह है, जिसमें कुल सात कहानियां हैं.

सातों कहानियां उसी समय में घटती हैं जहां एक तरफ तो तरक्की के बड़े-बड़े दावे हैं, विश्वशक्ति बनने के सपने हैं, वहीं दूसरी तरफ दिन-ब-दिन टूटते-बिखरते युवा हैं. राजीव की कहानियों के केंद्र में युवा ही हैं—कुंठित और बेरोजगार. चमकते हुए विज्ञापनी भारत के बरक्स इन युवाओं का तेज रोज-ब-रोज क्षीण हो रहा है. उनके चेहरे काले पड़ रहे हैं, वे धीरे-धीरे टूट रहे हैं, बिखर रहे हैं, अकेले पड़ रहे हैं, नष्ट हो रहे हैं. उनका सामाजिक व्यक्तित्व नष्ट हो रहा है, वे एक कॉकरोच में बदल रहे हैं.

ऐसा नहीं कि युवाओं की पीड़ा और बेरोजगारी को स्वर देने वाले वे पहले कथाकार हैं पर उनकी कहानियों में ये चीजें रोमैंटिसाइज किए जाने की बजाए पूरी भयानकता के साथ आती हैं, अक्सर तिक्त टिप्पणियों के रूप में. ये टिप्पणियां भी लेखक कम उसके चरित्र ज्यादा करते हैं. इन चरित्रों के बोले/कहे हुए से कहीं ज्यादा उनका जीवन कह जाता है.

शीर्षक कहानी तेजाब में कथावाचक का पिता अपनी राजनीतिक बिसात पर उसका उपयोग भर करने की कोशिश करता है, जब उसे पता चलता है कि कथावाचक उसके विरोधी विधायक की भतीजी से प्रेम करता है. तो वह कथावाचक का समर्थन करता है पर यह समर्थन चुनाव जीत जाने तक ही टिकता है. यह भयानक है कि पिता खुद बेटे को किसी लड़की से संबंध बनाने और फिर उसे छोड़ देने को उकसाए क्योंकि वह कथित रूप से निम्न जाति की है.

राजीव की कहानियां सकारात्मक सामूहिकता के बरक्स नकारात्मक सामूहिकता के खड़े होने की भी पड़ताल करती है. एक महाविद्यालय में छात्रसंघ के चुनाव को लेकर लिखी गई संग्रह की एक और कहानी बिसात भी यहीं पहुंचती है कि जब तक हमारी चेतना तमाम तरह के पूर्वाग्रहों की गिरवी है और हमने तरह-तरह के घृणित महाधीशों को अपनी चेतना का सौदा करने की खुली छूट दे रखी है तब तक लोकतांत्रिक संभावनाओं का कोई अर्थ नहीं बचा है.

करीना कपूर का फोटो या कॉकरोच, एलबम या ओवरब्रिज जैसी कहानियों के केंद्र में भी युवा ही हैं, जो लोकतंत्र के तमाम घात-प्रतिघातों के बीच छोड़ दिए गए हैं. यहां चुनावी संदर्भ नहीं हैं पर लोकतंत्र या आधुनिकता विरोधी शक्तियां ज्यादा महीन स्तर पर काम कर रही हैं. दोस्तों के बीच अजनबियत पैठ रही है और सकारात्मक सामूहिकता की सारी संभावनाएं हमेशा के लिए नष्ट हो रही हैं (ओवरब्रिज).

जहां स्वस्थ और सुंदर सपने कुंठा और बीमारी में बदल रहे हैं (एलबम, कॉकरोच और करीना कपूर का फोटो) और परिवार जहां पारिवारिक संपत्ति में अपना हिस्सा लेने के लिए और वसीयत के प्रभावी होने के लिए घर के बुजुर्ग की मृत्यु का इंतजार किया जा रहा है (मृत्यु उत्सव). इसके लिए विरोधी भी अपने मतभेद बुलाकर सामूहिक रूप से मृत्यु का इंतजार करते हैं. राजीव की कहानियों की दुनिया दहशत पैदा करने वाली है. पर ये स्थितियां कही बाहर से नहीं आई हैं. इसी देश-काल-समाज की हमारे आस-पास जड़ जमाए बैठी सच्चाइयां है.

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