टाटानगर की सबसे बड़ी स्टार वैसे तो तीरंदाज दीपिका कुमारी हैं. पर महान बनने का इरादा रखने वाली वे अकेली नहीं हैं. अब झारखंड क्रिकेट टीम के खिलाडिय़ों में भी वैसी ही भूख जग उठी है.
झारखंड की जिस क्रिकेट टीम को पहले कोई जानता ही न था, वह इस साल रणजी ट्रॉफी के नॉकआउट चरण तक पहुंचने में कामयाब रही है. एक विशाल होर्डिंग में दीपिका उजाड़-से कीनन स्टेडियम की पृष्ठभूमि में खड़ी दिख रही हैं. यही वह जगह है, जहां 2012-13 के सत्र की शुरुआत में कई तरह के खिलाड़ी राज्य की टीम की तकदीर बदलने और इस स्टेडियम को देश के नक्शे पर एक पहचान दिलाने के लिए इकट्ठी हुए थे. इस मैदान पर पिछला अंतरराष्ट्रीय आयोजन 2006 में हुआ भारत-इंग्लैंड वनडे मैच था.
महेंद्र सिंह धोनी की वजह से प्रसिद्ध रांची झारखंड में क्रिकेट का नया पता बन गया है और अब इस शहर के पास गर्व करने के लिए 180 करोड़ रु. की लागत से बना एचईसी इंटरनेशनल स्टेडियम भी है, जहां 35,000 दर्शकों के समक्ष अंतरराष्ट्रीय मुकाबले होते हैं.
एक आयोजन स्थल के रूप में रांची ने जो प्रसिद्धि हासिल की है वह उसका हकदार है, लेकिन राज्य की टीम का भाग्य बदलने का श्रेय उन खिलाडिय़ों को जाता है जो हफ्ते में सातों दिन कीनन स्टेडियम में जाकर खूब पसीना बहाते हैं. और एक हद तक इसका श्रेय तारक सिन्हा को भी जाता है, जिन्होंने इनमें यह भूख जगाई.
झारखंड स्टेट क्रिकेट एसोसिएशन के निदेशक का पद ग्रहण करने और सीजन की शुरुआत में मुख्य कोच की अतिरिक्त जिम्मेदारी संभालने से पहले ही इस 63 वर्षीय हट्ठे-कट्ठे शख्स की ख्याति यहां पहुंच चुकी थी. खिलाडिय़ों ने उनके चमत्कार की कई कहानियां सुन रखी थीं और यह तो उन्होंने देखा ही था कि किस तरह से उनके नेतृत्व में राजस्थान देखते-ही-देखते रणजी ट्रॉफी चौंपियन बन गया था. झारखंड के खिलाडिय़ों ने भी ऐसा ही कुछ सपना देखने की हिम्मत की.
बात सिर्फ किसी टीम की नहीं है, इसमें सिन्हा का कुछ व्यक्तिगत भी दांव पर था. पिछले वर्षों में सराहना के बावजूद उन्हें फिर से खुद को साबित करना था. उन्होंने भारतीय क्रिकेट की चार पीढिय़ों में 12 अंतरराष्ट्रीय क्रिकेटर तैयार करने का रिकॉर्ड कायम किया है. यह संख्या द्रोणाचार्य अवार्ड विजेता डी.पी. आजाद, गुरुचरण सिंह, रमाकांत आचरेकर और सुनीता शर्मा के तैयार किए गए खिलाडिय़ों से ज्यादा है. उन्होंने 100 से ज्यादा प्रथम श्रेणी के क्रिकेटर तैयार किए हैं. उनकी छत्रछाया में दो रणजी खिताब मिले और भारतीय महिला टीम की विदेश में ऐतिहासिक विजय हुई है. इसके अलावा वे 1969 से भारतीय क्रिकेट का सबसे प्रतिष्ठित सोनेट क्लब चलाते आ रहे हैं. ऐसे समय में जब टीम इंडिया में कोच को बदलने के स्वर तेज होने लगे हैं, सिन्हा इस बारे में अध्ययन का विषय हो सकते हैं कि एक भारतीय कोच कितना कुछ हासिल कर सकता है.
झारखंड से जब उनके लिए ऑफर आया तो उस दौरान वे राजस्थान और दिल्ली में अपनी उपलब्धियों के बावजूद अधिकारियों की गुटबाजी की वजह से किनारे कर दिए जाने पर अपमान की स्थिति से बाहर निकलने की कोशिश कर रहे थे. वे कहते भी हैं, ‘‘यह देखकर मुझे पीड़ा हुई कि राजस्थान ने मेरी कोशिशों को पहचाना नहीं. वे सिर्फ यही सोचते थे कि मेरी नियुक्ति संजय दीक्षित (राजस्थान क्रिकेट संघ के पूर्व सचिव) ने की थी और दीक्षित के साथ ही मुझे भी बाहर कर दिया गया. झारखंड ने इस बूढ़े आदमी को फिर से अपने को साबित करने का मौका मुहैया किया है.’’
उस्तादजी के नाम से मशहूर सिन्हा के लिए ठुकराया जाना कोई नई बात नहीं. दिल्ली के अंडर-16 स्कूली खेल के ट्रायल में ठुकराए जाने पर ही उन्होंने कोचिंग का रास्ता पकड़ा था. जज्बाती यादों से एकाएक बाहर आते हुए वे बताते हैं, ‘‘सलमान खुर्शीद दिल्ली की अंडर-16 स्कूली टीम के कप्तान थे.
सर्वश्रेष्ठ विकेटकीपर बल्लेबाजों में से होने के बावजूद मेरा चयन नहीं हुआ क्योंकि तब दिल्ली पब्लिक स्कूल और जेवियर्स के बीच इस बात को लेकर भारी लड़ाई चलती थी कि किसके ज्यादा खिलाड़ी टीम में शामिल होते हैं. मैं बिरला स्कूल से था, इसलिए मेरा नाम खारिज कर दिया गया. उसी दिन से मैंने तय कर लिया कि किसी और गरीब प्रतिभावान बच्चे को अपने जैसी नियति का शिकार नहीं होने दूंगा.’’
वे कहते हैं, ‘‘मैं एक गरीब परिवार से था और पैसा बचाने को पैदल ही प्रैक्टिस के लिए जाता था. हर वक्त क्रिकेट खेलने को लेकर मां-बाप अक्सर डांटते. मुझे लगता था कि एक दिन मैं भारत के लिए खेलूंगा. लेकिन ऐसा नहीं हो सका.’’ सिन्हा ने 1969 में कुछ खिलाडिय़ों के साथ दिल्ली के अजमल खां पार्क में सोनेट क्लब का गठन किया. धीरे-धीरे उनसे और खिलाड़ी जुड़ते गए. इस तरह से उनके कोचिंग करियर की शुरुआत हुई. उन्हें दिल्ली के डीएवी कॉलेज में कोच बनने का मौका मिला, पर इस शर्त के साथ कि उनका पद चपरासी का होगा क्योंकि उस वक्त वही एक पद खाली था. ‘‘मेरा पहला वेतन 110 रु. महीने का था. मैदान पर मैं कॉलेज की टीम के लिए कोच था, पर कागज में चपरासी. मैंने दिल्ली के कॉलेज क्रिकेट पर हिंदू और सेंट स्टीफेंस का दबदबा खत्म करने का संकल्प किया. डीएवी दस साल तक चौंपियन रहा.’’
उनके लिए झारखंड का प्रस्ताव स्वीकार करना आसान न था क्योंकि वहां पेशेवर कोच रखने को लेकर राजस्थान के मुकाबले बजट की कई सीमाएं थीं. स्टेडियम के निर्माण में काफी पैसा लगा था और राज्य के बेहतरीन खिलाड़ी उपलब्ध न थे. धोनी ने खेलने से मना कर दिया और वरुण आरों को पीठ में चोट की वजह से पूरे सीजन बैठे रहना पड़ा.
सिन्हा बताते हैं, ‘‘मैं आया तो मुझे लेकर टीम में मैंने बड़ी उम्मीद देखी. मुझे अच्छा लगा. पर यह देखकर मैं हैरत में था कि हर कोई अपनी अलग पहचान चाहता था. आइपीएल के खिलाड़ी प्रैक्टिस के लिए अपने फ्रेंचाइज के किट पहनकर आते थे और अपने ग्लैमर से दूसरों को आतंकित रखते थे.’’ उन्होंने झारखंड की कैप तैयार करवाई और टीम के लिए ट्रैकसूट का भी ऑर्डर दिया. खुद भी पहनी हुई सफेद रंग की झारखंड फ्लॉपी की फख्र से चर्चा करते हुए वे कहते हैं, ‘‘मैंने उनसे कैप का सम्मान करने, कैप के लिए खेलने को कहा. मैंने कहा, जब आप अपने राज्य का सम्मान करेंगे तो भारत की कैप के साथ भी न्याय कर पाएंगे.’’
सिन्हा अपने स्वभावगत और अक्सर विवादास्पद निर्णयों के लिए जाने जाते हैं. उन्होंने 2010-11 के सीजन में मुंबई के खिलाफ राजस्थान के क्वार्टर फाइनल से पहले हार्निया की वजह से एक साल खेल से दूर रहने के बाद वापस लौटे अशोक मेनारिया को टीम में ले लिया और पिछले मैच में शतक बना चुके पुनीत यादव को बाहर कर दिया. उनके इस निर्णय की काफी आलोचना हुई, लेकिन सिन्हा का मानना था कि मेनारिया मैच जिता सकने वाले बड़े खिलाड़ी हैं, जिनकी टीम को जरूरत है. उनके इस भरोसे पर खरा उतरते हुए 22 वर्षीय खब्बू बल्लेबाज ने क्वार्टर फाइनल, सेमीफाइनल और फाइनल मैच में शतक ठोंके. कोच कहते हैं, ‘‘आपकी सहज-बुद्धि क्या कहती है, उस पर टिके रहने के लिए आपके अंदर हिम्मत होनी चाहिए.’’
झारखंड में उन्होंने तेज गेंदबाज राहुल शुक्ल को टीम से हटा दिया जो कि आइपीएल की मुंबई इंडियंस टीम में खेल चुके एक बड़ा नाम थे. उनकी जगह वे अजय यादव को लेकर आए जो एक भैंस चराने वाले से तेज गेंदबाज बन चुके चर्चित हीरो हैं. सिन्हा ने कहा, ‘‘यह देखना होता है कि किसी खिलाड़ी को कोचिंग की जरूरत है या प्रेरणा की. यादव जैसे खिलाडिय़ों के लिए तो सिर्फ प्रेरणा ही काफी है. मैंने उससे कहा कि तुमने पांच विकेट ले लिए तो मैं तुम्हें ओकले के पांच चश्मे दूंगा. उसने अगले ही दिन यह कर दिखाया.’’
सिन्हा कहते हैं, ‘‘कभी आपको दोस्त बनना होता है, कभी शिक्षक और कभी-कभी मां-बाप भी क्योंकि घरेलू क्रिकेट में हर तरह की पृष्ठभूमि से खिलाड़ी आते हैं. आइपीएल की अमीरी देख चुके सौरभ तिवारी जैसे खिलाड़ी को अपने काम से समझाना पड़ता है कि वे मुझे गंभीरता से लें. मैंने उनके खेल में कुछ तकनीकी बदलाव कराए, जिससे उनको फायदा हुआ.’’
पर सफलता की शुरुआत हो जाने से यह जरूरी नहीं कि आर्थिक दुश्वारियां खत्म हो जाएं. अपने क्लब में एक-एक पैसा लगा चुके सिन्हा को दिल्ली में अपने किराए के मकान को भी खाली करना पड़ा था. ऐसे मौके पर उनके पुराने शिष्य और भारतीय टीम में खेल चुके आशीष नेहरा ने मदद की.
सिन्हा कहते हैं, ‘‘समझ नहीं पा रहा था कि क्या किया जाए? मैंने आशीष को फोन किया और उसने कहा, ‘‘सर, मेरे होते हुए आपको कभी भी सड़क पर नहीं आने दूंगा.’’ उसने मुझे नई जगह दिलाई और कहा कि वह तो बस उस भरोसे के बदले कुछ लौटा रहा है जो मैंने उसमें दिखाया था. यह बात मेरे दिल को छू गई.’’
सिन्हा खुद से ही सीखने वाले कोच हैं. उन्होंने खेल के बारे में किताबें पढ़ीं, खिलाडिय़ों से उनके अनुभवों के बारे में बात की और अपने दिमाग को काम पर लगाया. वे ‘डेस्कटॉप’ कोचिंग और तथाकथित क्वालिफाइड कोचिंग, जिस पर क्रिकेट बोर्ड का जोर रहता है, को बकवास बताते हैं. उनके शब्दों में, ‘‘आप सिर्फ इसलिए अच्छे नहीं हो सकते कि आपने दो हफ्ते तक कोचिंग की पढ़ाई कर ली है. मैं टेक्नीक और बाकी चीजों पर एनसीए (नेशनल क्रिकेट एकेडमी, बंगलुरू) के किसी भी बड़े कोच से मुकाबला कर सकता हूं. आखिरकार आपको नतीजा दिखाना होता है.’’
खिलाड़ी याद करते हुए बताते हैं कि वे किसी मैच की योजना बनाने के लिए तड़के तीन बजे ही उठ जाते हैं. उनकी जिंदगी में ऐसा कोई दिन नहीं रहा जब वे मैदान पर न गए हों. और सिन्हा के शब्दों में, ‘‘मैं सिर्फ क्रिकेट के बारे में सोचता हूं, राजनीति या फिल्में मुझमें कोई उत्साह नहीं जगातीं. मैं लड़कों को नाम से नहीं बल्कि उनके चेहरे और खेलने की शैली से याद रखता हूं.’’
वे इसी तरह निस्वार्थ भाव से आगे भी अपना काम करते रहेंगे क्योंकि क्रिकेट उनकी जिंदगी है. वे तारीफ के लिए मरे नहीं जा रहे पर अब समय आ गया है कि तारक सिन्हा को वह मिले जिसके वे हकदार हैं.

