जहां एक जंगल था
मदन मोहन
अंतिका प्रकाशन,
शालीमार गार्डन, एक्सटेंशन-2, गाजियाबाद-5,
कीमत: 495 रु.
antika56@gmail.com
मदन मोहन की पहचान उनकी कहानियों से होती रही है. 1975 से शुरू हुआ उनका लेखन लगातार ऊंचाइयों की ओर बढ़ता रहा है. अब तक पांच कहानी संग्रह प्रकाशित करवा चुके मदन मोहन ने उपन्यास-लेखन के क्षेत्र में देर से कदम रखा. इसी साल छपा उनका पहला उपन्यास जहां एक जंगल था पूर्वांचल के गांवों की यथार्थ तस्वीर पेश करता है. अपने वस्तु-विन्यास में उपन्यास लेखक की राजनीतिक समझदारी और विचारधारात्मक रुझन का साक्षी बनता है. राजनीतिक पक्षधरता वाले लेखकों से यह ‘‘चूक’’ आम है कि वे रचना की केंद्रीय समस्या का समाधान देने के लोभ का संवरण नहीं कर पाते. मदनमोहन ने इस आशंका से खुद को भरसक बचाए रखा है. अपने पात्रों के प्रति उनकी निर्ममता श्रीलाल शुक्ल की याद दिलाती है.
उपन्यास का नायक गोरख नंद (सहाय) सरकारी नौकरी से सेवानिवृत्ति लेकर अपने पैतृक गांव मालेपार लौटता है. यह लौटना गांव में बसने के लिए नहीं है. वह अपनी जमीन-जायदाद पर मालिकाना हक कायम कर उसे निपटा देने के इरादे से आया है. अतिक्रमण हटाने की उसकी कोशिशों के दरम्यान बदले हुए गांव की सचाइयां अपनी पूरी जटिलता में उजागर होती हैं.
गांव में नए किस्म की राजनीति ने जिस माहौल का निर्माण किया है, उससे रिश्तों का पुराना व्याकरण गड़बड़ा गया है. एक खालीपन पसरा हुआ है. किस पर भरोसा किया जाए? जिन संबंधों में गोरख का अटूट विश्वास था, वहीं से उसे धोखा हुआ. विश्वास की सभी दीवारें एक बारगी दरक गईं.
मैला आंचल में रेणु ने जिन नई राजनीतिक ताकतों का उभार दिखाते हुए सत्तांध चरित्रों के नैतिक पतन का खाका खींचा था वह प्रक्रिया प्रस्तुत उपन्यास में पूर्ण होती है. परती परिकथा का नायक जित्तन परती जमीन को खेती लायक बनाने के लिए कुत्सित राजनीति का अनुभव लेकर और साथ ही उसका शिकार होकर परानपुर लौटता है. परानपुर का राजनीतिक परिदृश्य राष्ट्रीय राजनीति का लघु संस्करण है.
इधर जहां एक जंगल था का मालेपार गांव दलाधारित राजनीति के व्यक्तिगत इस्तेमाल की अभिनव बानगी पेश कर रहा है. गोरखनंदन के खेत भी परती पड़े हुए हैं. उसकी तरुणाई की प्रेमिका पैखी उसी की जमीन पर झोपड़ी डाले हुए है. उम्मीद कुछ ऐसी कि गोरख को अपना एक पांव इस डीह पर टिका लेना चाहिए. गोरख का मालेपार में कुल 38 दिन ठहरना हुआ. इसमें गांव के एक नवोदित दबंग कब्जेदार धर्मदेव यादव की साजिश से जिला जेल में काटे दिन भी शामिल हैं. जेल से बाहर निकले तो गोरख एक निर्णय ले चुके थे.
अमेरिकावासी इकलौते बेटे विकास के इंसिफैलाइटिस के वैक्सीन तैयार करने के महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट के लिए धन जुटाने के वास्ते खेत-बाग बेचने के मकसद से गांव आए गोरखनंदन हकीकत समझ चुके थे. वे अमेरिकी कंपनी के भारतीय दवा बाजार को दुहने देने में साझीदार नहीं बनना चाहते. वे यह भी नहीं चाहते कि उनकी जमीन कब्जेदारों के चंगुल में पड़ी रहे. इस चंगुल से जमीन को मुक्त कराना उनके वश में नहीं. विकल्पहीन स्थिति में वे विकल्प खोजते हैं.
मालेपार में लाइब्रेरी चलाने वाले राकेश बाबा को वे पत्र लिखते हैं. राकेश इस समय गायब हैं. गोरख अपना पत्र (वसीयत?) कचहरी प्रांगण में सार्वजनिक रूप से पढ़ते हैं. जमीन राकेश को, उनके नेक काम में सहायता के उद्देश्य से दे दी गई. प्रश्न बना रहता है कि राकेश की वापसी होगी क्या? बनटांगिया किसानों-मजदूरों की लड़ाई लडऩे वाले युवकों की जिस टोली का नेतृत्व राकेश कर रहे थे वह अब पुनर्गठित होगी. उम्मीद की लौ यहीं टिमटिमा रही है.
अपराध बोध से कुछ हद तक निजात पाकर गोरखनंदन शहर लौटते हैं. पैखी के संबोधन अब भी उनसे चिपके हुए हैं. ‘‘कायर, भगोड़ा और जनम के डरपोक’’. उपन्यासकार किसी पात्र से रियायत नहीं करता. अपनी ओर से कथा में दखल नहीं देता. भावनाओं की गागर छलकाने की बजाए स्वार्थों की बारीक दांव-पेचों भरी तफसील मुहैया कराता है. यही उसकी शक्ति है.

