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कमलनाथ: सरकार में प्रणब मुखर्जी के नए विकल्प

विभिन्न पार्टियों के नेताओं के साथ अपने बेहतरीन संपर्क और पर्दे के पीछे बातचीत के सहज कौशल की वजह से संसदीय कार्य मंत्री बने सरकार के संकटमोचक.

अपडेटेड 8 जनवरी , 2013

बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) की अध्यक्ष मायावती जब 6 दिसंबर को राज्यसभा में खुदरा एफडीआइ पर बहस के दौरान बोलने के लिए खड़ी हुईं तो कमलनाथ को पहले से ही पता था कि वह क्या बोलने वाली हैं. केंद्रीय संसदीय कार्यमंत्री पिछली रात ही बीएसपी प्रमुख से मुलाकात कर चुके थे. वह राज्यसभा में मतदान से बाहर रहने की योजना बना रही थीं. मायावती, बीएसपी नेता सतीश चंद्र मिश्र और कमलनाथ के बीच यह मुलाकात आधी रात तक चली. अगली सुबह गहरे नीले रंग का सफारी सूट पहने कमलनाथ संसद में आत्मविश्वास से भरे लंबे-लंबे डग भरते हुए आए. बीएसपी का वोट सुरक्षित रूप से उनके पॉकेट में था और उन्होंने यह अच्छी खबर प्रधानमंत्री को सुनाई. प्रधानमंत्री के अलावा यह बात सिर्फ सोनिया गांधी ही जानती थीं कि उन्होंने वोट अपने पाले में कर लिए हैं.

नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता फारूख अब्दुल्ला ने इंडिया टुडे से कहा, ''मैं नहीं समझता कि कमलनाथ ने जो किया है, वह कोई और कर सकता था. वह आधी रात तक मशक्कत करते रहे और कोई नहीं जानता था कि वह क्या कर रहे हैं. ''Kamalnath

विपक्ष, जो कुछ मिनट पहले तक पत्रकारों को बता रहा था कि एफडीआइ वोट पर सरकार हार जाएगी, वह दरअसल सोता ही रह गया. यह चकित करने वाला और कमलनाथ के सियासी कौशल की धाक जमाने वाला क्षण था.

वैसे तो 5 दिसंबर को ही लोकसभा में हुए मतदान में यूपीए जीत चुका था, लेकिन कमलनाथ यह जानते थे कि राज्यसभा के सांसद ज्यादा जोखिम पैदा कर सकते हैं. यूपीए के लिए यह जरूरी था कि बीएसपी या समाजवादी पार्टी (सपा) सरकार के पक्ष में वोट करें, न कि मतदान से बाहर चले जाएं जैसा कि वे निचले सदन में कर चुके हैं. इसीलिए वह शीघ्रता से मायावती के घर की ओर बढ़ चले.

बीएसपी की नेता ने सदन में कहा, ''यदि विपक्ष का प्रस्ताव (एफडीआइ के खिलाफ) आगे बढ़ता है तो सदन को बाधित करने के लिए एक और राजनीतिक मसला मिल जाएगा और निजी क्षेत्र की नौकरियों में एससी/एसटी को आरक्षण जैसे कई महत्वपूर्ण बिल पारित नहीं हो पाएंगे. ''

कमलनाथ इस मामले को इतने बेहतर तरीके से पेश नहीं कर पाते. मायावती के बाद एआइएडीएमके नेता वी मैत्रेयन ने निराश होकर कहा, ''यदि सरकार जीतती है तो यह पैंतरेबाजी की जीत होगी. '' राज्यसभा में जीत के बाद वीकेंड में कमलनाथ ने एससी/एसटी बिल को संसद में आगे बढ़ा दिया.

प्रधानमंत्री को आखिरकार प्रणब मुखर्जी की जगह नया संकटमोचक मिल ही गया. तत्कालीन संसदीय कार्यमंत्री पवन कुमार बंसल उतने वजनदार नेता नहीं थे. इसी तरह पिछले अगस्त में मुखर्जी की जगह सदन के नए नेता बने सुशील कुमार शिंदे भी बेअसर थे. मनमोहन सिंह को ऐसे व्यक्ति की जरूरत थी, जो मुखर्जी की तरह हर पार्टी से राजनीतिक तोल-मोल कर सके और अर्थशास्त्र पर भी जिसकी अच्छी पकड़ हो.

इस मामले में ज्यादातर नेता कमजोर थे. 'कैबिनेट की ए-सूची' का कोई भी नेता इस बिल को मैनेज करने के लिए उपयुक्त नहीं लग रहा था. वित्त मंत्री पी. चिदंबरम में संजीदगी है, लेकिन उनके गठबंधन दलों से घनिष्ठ ताल्लुकात नहीं हैं. 10 जनपथ के प्रति वफादारी की वजह से ही शायद ए.के. एंटोनी को रक्षा मंत्रालय और शिंदे को गृह मंत्रालय तो मिल गया, लेकिन क्षेत्रीय दलों से बातचीत में वे बहुत आगे तक नहीं जा पाते. प्रधानमंत्री को पता था कि उन्हें इस मनमोहक सर्किल से परे देखना होगा.

इसके बाद नजर कमलनाथ पर गई, जो कि यूपीए 2 के कार्यकाल में ज्यादातर समय उपेक्षित ही रहे थे. जीत के लिहाज से देखें तो 66 वर्षीय कमलनाथ लोकसभा के सबसे वरिष्ठ नेताओं में से हैं. इस मामले में बस सीपीआइ (एम) नेता बासुदेब आचार्य ही उनसे आगे हैं. कमलनाथ पुराने कांग्रेसी हैं, जो संजय गांधी के जमाने की युवक कांग्रेस से उभरकर आए हैं. वे मायावती को कांशीराम के जमाने से जानते हैं.

1980 में इंदिरा गांधी के समय उन्होंने गठबंधन के लिए डीएमके से बातचीत की थी और 2004 में डीएमके को यूपीए से जोडऩे में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी. उन्होंने ममता बनर्जी को सड़क पर संघर्ष करने वाली एक साहसी नेता से मुख्यमंत्री बनते देखा है और ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक के साथ तो उन्होंने स्कूल की पढ़ाई की है. कमलनाथ जब किसी सहयोगी दल को फोन मिलाते हैं तो उन्हें पता होता है कि कौन-सा लहजा काम आएगा.

वह निश्चित रूप से अपने पहले फ्लोर टेस्ट में पास हो गए हैं. एफडीआइ की जीत से न केवल नाथ का प्रोफाइल बढ़ा है, बल्कि सरकार का हौसला भी. इससे यूपीए को अपने सुधार एजेंडे को लागू करने के लिए बल मिला है.

बीमा में एफडीआइ की सीमा को बढ़ाने वाले बिल के अलावा, जिस पर बीजेपी और कांग्रेस को अभी अपने मतभेद दूर करने हैं, सरकार को भरोसा है कि आने वाले बजट सत्र में आर्थिक सुधार के विधेयकों को आगे बढ़ा सकेगी. अब कांग्रेस में फील-गुड का माहौल है, जो कि संसद के शीतकालीन सत्र की शुरुआत के पहले दिन नहीं दिख रहा था.

यहां तक कि वॉलमार्ट द्वारा घूस देने के विपक्ष के नवीनतम आरोपों ने भी पार्टी के उत्साह को कम नहीं किया है. नाथ ने तत्काल ही इस मामले में जांच की घोषणा कर विपक्ष के डंक को बेअसर कर दिया, जबकि चिदंबरम और कपिल सिब्बल जैसे उनकी पार्टी के कई नेता सचेत कर रहे थे कि इससे ग्लोबल निवेशकों में गलत संदेश जाएगा.

उत्साहित कमलनाथ टकराव से जी चुराने के मूड में बिल्कुल नहीं हैं. उन्होंने शीतकालीन सत्र की शुरुआत से पहले ही अच्छी तरह से जमीनी दौड़ लगा ली थी और अपना होमवर्क कर लिया था, प्रधानमंत्री को इस बात के लिए मनाया था कि वे सपा नेता मुलायम सिंह यादव और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव, मायावती और बीजेपी नेताओं को अलग-अलग डिनर और लंच के लिए आमंत्रित करें. पहली बार गठबंधन दलों और मुख्य विपक्षी पार्टी को अलग-अलग बुलाकर समर्थन मांगा गया और इसके लिए सर्वदलीय बैठक या यूपीए की बैठक नहीं की गई. सपा के साथ 9 नवंबर के डिनर में ही नाथ ने एक और सहयोगी दल तथा पुराने मित्र फारूख अब्दुल्ला को भी आमंत्रित कर लिया था. इसके पीछे सोच यह थी कि यादव नेताओं को एफडीआइ के फायदे समझने के लिए एक मुस्लिम चेहरे का इस्तेमाल किया जाए.

कमलनाथ ने सपा और बसपा दोनों को यह समझा दिया कि दुकानदार लॉबी बीजेपी के प्रति प्रतिबद्ध है, इसलिए एफडीआइ को समर्थन देने से उनके वोट बैंक पर कोई असर नहीं पड़ेगा. लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने गैर इरादतन कमलनाथ को सबसे उपयुक्त सम्मान दे दिया, जब उन्होंने सदन में कहा, ''जिन 18 पार्टियों से बात की गई उनमें से सिर्फ  चार ने खुदरा में एफडीआइ का समर्थन किया है. '' इसके बावजूद यूपीए मतदान में जीत गई. बीजेपी को कमलनाथ के अंकगणित से नहीं बल्कि उनके बीजगणित से चिंतित होना चाहिए.

कमलनाथ के संसद में इस तरह के फ्लोर शो को देखने के बाद एक कैबिनेट मंत्री ने हंसते हुए कहा, ''हमने उन्हें पहले संसदीय कार्य मंत्री बनाने को क्यों नहीं सोचा? '' कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह कहते हैं, ''कमलनाथ ऐसे व्यक्ति हैं, जिन्हें आप नजरअंदाज नहीं कर सकते. यदि उन्हें कोई काम सौंपा जाता है तो वह उसे पूरा करते हैं. पिछले कुछ दिनों में उनकी समझने-बूझने की ताकत और नेटवर्किंग कौशल, दोनों साबित हो चुके हैं.''

अभी तक कमलनाथ को महत्वपूर्ण मंत्रालय तो मिले थे, लेकिन चोटी के मंत्रालय नहीं. उन्हें इस बात का मलाल तो रहा ही होगा कि उनके मुकाबले सिब्बल जैसे नए नेता को राजनीतिक मामलों की कैबिनेट कमेटी में उनसे पहले ही शामिल कर लिया गया. लेकिन धीरे-धीरे मनमोहन सिंह को यह बात समझ में आ गई है कि कपिल सिब्बल या सलमान खुर्शीद के बहस करने के कौशल से नहीं, बल्कि कमलनाथ के राजनैतिक कौशल से ही सरकार को मौजूदा संकट से बाहर निकाला जा सकता है.

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