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डार्क मोड

यह अलग दिखने की सनक है

दुनिया भर में आजमाए जाने वाले अनोखे तौर-तरीकों के संसार में कदम रख रहे हैं युवा. इसमें पिशाच का वेश धरने से लेकर हिप-हॉप नाइट्स और सड़कों पर बी-बॉइंग से घर में गथ म्युजिक सुनने तक सब कुछ शामिल है.

अपडेटेड 10 जनवरी , 2013

नवंबर का महीना है, सर्दियां शुरू हो चुकी हैं और वैंपायर (पिशाच) थीम पर आधारित मौज-मस्ती भरी रात के लिए ट्रांसिल्वेनिया में तब्दील हो चुके दिल्ली के हार्ड रॉक कैफे में ग्यारहवीं की छात्रा उर्वशी खुल्लर स्लीवलेस लाल टॉप और काली मिनी स्कर्ट के साथ चमकदार काला नेकलेस पहने पहुंची हैं. उनकी हरी आंखों की कशिश और नुकीले दांत खौफ दर्शाने के लिए काफी हैं. उधर, मुंबई के टोट ऑन द टर्फ में 300 से ज्यादा लैटिन संगीत प्रेमी युवा 26 वर्षीया चौती नरूला की लोकप्रिय सालसा नाइट का लुत्फ  उठाने के लिए उमड़ चुके हैं.

‘‘डार्क’’ पार्टियां हों या रम्बा-बाचाता नाइट्स, आज की युवा पीढ़ी कुछ हटकर करने के तमाम अंतरराष्ट्रीय नुस्खों को आजमा रही है. वह कुछ ऐसे सबकल्चर्स (उप-संस्कृति, या हटकर दिखने के तौर-तरीके) को ला रही है, जिनके कुछ अपने कायदे-कानून हैं-कभी-कभार इसमें शामिल होने वाले दीवानगी की हद तक पहुंच जाते हैं. लड़कों के गैंग अब बैगी पैंट, फैंसी बाइक्स और भड़काऊ जैकेटों से आगे निकल चुके हैं. यू-ट्यूब और फेसबुक की यह पीढ़ी दुनिया भर में युवाओं के लटके-झटके अपना रही है और नए-नए प्रयोग भी कर रही है. इंग्लिश प्रीमियर लीग के दौरान जहां कॉलेजों के मैदान मैनचेस्टर यूनाइटेड बनाम आर्सेनल की रणभूमि बन जाते हैं,

 वहीं सिर मुंडवाना और उस पर तरह-तरह की बातें गुदवाना ताजा गथ फैशन स्टेटमेंट है. ऊंची सैंडिल पहने लड़कियां काम के बाद सालसा और सांग्रिया नाइट्स में दिखती हैं तो ब्रुकलिन के अश्वेत क्लबों से प्रेरित युवा शहर से दूर स्थित शराबखानों को अपने खेल का मैदान बनाकर रात भर टोपीवाली शर्ट और ट्रैक पैंट में रैप धुन पर थिरकते रहते हैं.

अब चाहे इसे ट्वाइलाइट शृंखला की लोकप्रियता कहें या फिर रैपर एमिनम का बेबाक म्युजिक और फुटबॉलर रोनाल्डो की सेक्स अपील, शहरी युवाओं को अपने नए दौर के आदर्श इसी रूप में मिले हैं और उनके पास इन्हें दीवाना बनाने की ताकत भी है. वर्चुअल कम्युनिटीज वैंपायर मीट-अप की योजनाएं बना रहे हैं जहां इंसान ‘‘भेडिय़ों’’ से भिड़ते हैं तो टीम एडवर्ड और टीम जैकब ऑनलाइन जंग में मुब्तिला होती हैं.

दिल्ली यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर प्रो. दिनेश सिंह कहते हैं, ‘‘दस साल पहले के मुकाबले आज छात्र नए फैशन, विचारधाराओं और आदर्शों के साथ प्रयोग करने के ज्यादा इच्छुक दिखते हैं. हो सकता है यह नए विचारों की देन हो, और वैसे भी आज सोशल मीडिया के कारण लोगों में अपनापा बहुत जल्दी फैल रहा है. चेन्नै में बैठा युवा बड़ी आसानी से न्यूयॉर्क के फैन क्लब के साथ खुद को जोड़ सकता है.’’

ऐसे तमाम सब-कल्चर सिर्फ मनोरंजन का साधन नहीं होते. अगर लैटिन म्युजिक और डांस से ऊर्जा और स्टाइल बहता है तो डार्क गथ समूह ठीक एक फुटबॉल मैच की तरह अपने चाहने वालों में आक्रामकता का संचार करता है.

मुंबई की साइकोलॉजिस्ट और लुकिंग ग्लास नामक संस्था की संस्थापक प्रियंका पटेल कहती हैं, ‘‘इंटरनेशनल ट्रेंड्स के संपर्क में आने का श्रेय सोशल मीडिया को जाता है. हमारे समाज का एक तबका इस तरह की संस्कृतियों की ओर आकर्षित हो रहा है और इसीलिए इतना उत्साहित है. हालांकि कभी-कभार ऐसे समूहों के साथ अतिसक्रियता और सनक भरा जुड़ाव दमित इच्छाओं या नैतिक रूप से सवालिया लालसाओं की भी देन होता है.’’ प्रियंका की संस्था युवाओं के साथ कला और नृत्य के जरिए काम करती है.

शैतानी करतबों का दबदबा
फिल्मी सितारों के जमाने अब लद गए. आज के युवा स्पाइक और बफी जैसे शैतानी पात्रों से प्रेरणा ले रहे हैं. कभी खलनायक माने जाते रहे काउंट ड्रैकूला के रंग-ढंग पर आज की ट्वाइहार्ड (ट्वाइलाइट सीरीज के दीवाने) पीढ़ी मरती है और उसके प्रेरणा स्रोत ट्रू ब्लड, एंजेल, मूनलाइट और ब्लड टाईज

जैसे टीवी शो से आ रहे हैं. गुडग़ांव के कुंसकाप्सकोलन स्कूल के डायरेक्टर मार्क पार्किंसन कहते हैं, ‘‘बच्चे और युवा आज दूसरी दुनिया के भुतहा पात्रों को लेकर उत्सुक हो गए हैं. पहले अपनी जिज्ञासा को शांत करने के लिए बच्चे डॉ. जैकिल ऐंड मिस्टर हाइड, फ्रैंकंस्टीन या काउंट डैरकूला देखते-पढ़ते थे. आज के युवा ट्वाइलाइट, हैरी पॉटर और द हंगर गेम्स में पनाह खोजते हैं.’’

आधुनिक वैंपायर का चेहरा बदल चुका है. वह काले कपड़े और हुड से आगे बढ़ चुका है. देश भर के छात्र मिलकर कई वैंपायर समूह बना चुके हैं. वे नियमित तौर पर मिलते हैं, रूहों से बात करते हैं, पिशाचों की शायरी गढ़ते हैं और इंसानी गर्दन पर स्नैक्स और खून का स्वाद चखते हैं.

दिल्ली की एक प्रोफेशनल 26 वर्षीया निहारिका लाहिड़ी कहती हैं, ‘‘वैंपायर कितने सेक्सी होते हैं! उनके तंग कपड़ों में कुछ तो आकर्षण है जो मुझे उत्तेजना से भर देता है. कुछ लोगों को लगता होगा कि वैंपायर को मानने वाले बुराई के समर्थक हैं, मेरे खयाल से ऐसा नहीं है.’’ खैर, बुराई का अनुयायी होना भी मुफ्त में नहीं है, इस पर पैसे खर्च करने पड़ते हैं.Sports

मुंबई की 42 वर्षीया किरन मेहरा का घर ट्वाइलाइट के 200 से ज्यादा पोस्टरों से पटा पड़़ा है और यह सब उनकी टीनेज बिटिया की करामात है जिसे वैंपायरों की दुनिया बहुत पसंद है. वे कहती हैं, ‘‘बच्चे अब रोमानिया के ट्रांसिल्वेनिया घुमाने की जिद कर रहे हैं.’’ 

बेकहम बनने की चाहत
कुछ अलग और हटकर दिखने के लिए जेब का भारी होना जरूरी है. अचानक देश में स्पोर्ट्स बार, लाइसेंसधारी फुटबॉल मर्चेंडाइज दुकानों, सोशल मीडिया फैन क्लबों और फुटबॉल प्रशिक्षण अकादमियों की जो भरमार हो गई है, उसके पीछे इन्हें चाहने वालों की कतार है. आर्सेनल के दीवाने क्लब के झंडे से अगर अपनी खिड़कियों के परदे बना रहे हैं तो लिवरपूल प्रेमी क्लब के लोगों से मेल खाने वाले वोदका के शॉट लगाने में मसरूफ हैं. मैनचेस्टर यूनाइटेड के दीवानों की दिक्कत दरअसल यह है कि क्लब के बनाए फ्रिज मैग्नेट उन्हें पर्याप्त संख्या में नहीं मिल पा रहे.

गुडग़ांव के रियल एस्टेट डेवलपर 25 वर्षीय सिमरदीप सिंह ने पिछले साल मैनचेस्टर यूनाइटेड का खेल देखने के लिए लंदन जाने पर एक लाख रुपए खर्च कर दिए. वे कहते हैं, ‘‘मेरे लिए तो मेरा क्लब ही मेरा परिवार है. हर बार जब कोई बड़ा मैच होता है, मैं खेल खत्म होने तक किसी से बात नहीं करता. हां, भारत में इसका बाजार खुल चुका है और दस साल पहले के मुकाबले इसके चाहने वालों के पास आज ज्यादा विकल्प हैं.’’

मुंबई के दांडेकर कॉलेज में कॉमर्स के छात्र विक्रांत मैथ्यू को अपने जन्मदिन पर तोहफे में 50,000 रु. की आर्सेनल वाली जर्सी मांगने में कोई संकोच नहीं होता. मेलबर्न यूनिवर्सिटी में पढ़ रहे कोच्चि के 26 वर्षीय सेबास्टियन जॉन कहते हैं, ‘‘इसकी शुरुआत डेविड बेकहम से हुई, जब 1998-99 में मैनचेस्टर यूनाइटेड ने प्रीमियर लीग, एफए कप और यूईएफए चौंपियंस लीग तीनों में जीत हासिल की. एक बार आप किसी क्लब के वफादार हो गए, तो फिर आप पलटते नहीं.’’

मैनचेस्टर यूनाइटेड के रिकॉर्ड दिखाते हैं कि भारत में ब्रिटेन के मुकाबले इसके प्रेमी कहीं ज्यादा हैं और क्लब अपनी इस लोकप्रियता को हलके में नहीं लेता बल्कि सबकी मांग पूरी करता है. क्लब की आधिकारिक वेबसाइट के मुताबिक इसके चाहने वालों की संख्या ब्रिटेन में 4,70,360 है जबकि भारत में यह 7,01,900 है. फुटबॉल के प्रति अचानक उमड़ी इस सनक का दोहन करते हुए आर्सेनल, चेल्सी, लिवरपूल, एफसी बार्सिलोना और रियाल मैड्रिड ने मर्चेंडाइज की दुकानें खोल दी हैं. और युवाओं को लुभाने के लिए इनकी योजना में प्रशिक्षण स्कूल भी हैं.Rapper

दिल्ली यूनिवर्सिटी की 18 वर्षीया छात्रा तनिका गोयल अपने हीरो डेविड विला ‘‘की मुस्कान पर मरती थीं,’’ लेकिन अब उनकी दीवानगी ने खतरनाक मोड़ ले लिया है. बार्सिलोना एक मैच में हार क्या गया, तनिका एक हफ्ते तक अपने बिस्तर से उठ नहीं पाईं. वे कहती हैं, ‘‘हर बार जब बार्सा हारता है, तो लगता है जैसे किसी ने मेरा दिल निकाल लिया हो. मैं जानती हूं कि यह सनक है, लेकिन मेरे लिए मेरी टीम ही सब कुछ है.’’

आओ रैप करें
कुछ हटकर वाली संस्कृति की नींव में नाजुक भावनाएं हैं, तो आक्रामकता इसका स्तंभ है. ट्रैफिक जाम हो, संबंधों में दरार हो या फिर कैंपस में झगड़ा-झंझट, नए रैप संगीत पर हुल्लड़बाजी के लिए नौजवानों को बस मौका चाहिए. अंडरग्राउंड कल्चर ग्रुप्स को बढ़ावा देने वाली मुंबई की ईवेंट मैनेजमेंट कंपनी कल्चर शॉक के राजेश मरार कहते हैं, ‘‘रैप अब बड़ी चीज बनता जा रहा है चूंकि छोटे-छोटे स्थानीय समूह इसे अपना रहे हैं.

डोंबिवली, मलाड़, बांद्रा में अपने-अपने रैप समूह बन गए हैं.’’ वे हर महीने मॉन्सटर बैटल्स आयोजित करवाते हैं जहां ये समूह अपना-अपना कौशल दिखाने को रात में पहुंचते हैं. मुंबई के एनिमेशन कलाकार और कभी-कभार अपने लिखे रैप गीतों से भीड़ जुटाने आने वाले 24 वर्षीय विराज मांजरेकर कहते हैं, ‘रैप अमेरिका के अश्वेत इलाकों में सामाजिक और राजनैतिक मुद्दों पर एक आवाज के तौर पर पैदा हुआ, लेकिन बाजारू रैप तो बदनाम चीज है. हम इसे इसकी मूल प्रतिष्ठा दिलाना चाहते हैं.’’ मांजरेकर हिंदी, मराठी और अंग्रेजी में सामाजिक बुराइयों के खिलाफ रैप गीत रचते हैं. 

डांस का महामुकाबला
हिप-हॉप कल्चर की वजह से बी-बॉइंग ने पहचान हासिल कर ली है. यह भारतीय कैंपसों में अपनी जड़ें फैला रहा है. मुंबई में ऐसे 30 ग्रुप हैं. खेल अपने प्रतिद्वंद्वी को कमरतोड़ और गर्दन तोड़ नाच से चुनौती देने का है. हाइ डाउन ग्रुप के नाम से पहला डांस ग्रुप बनाकर मुंबई में 2009 में बी-बॉइंग की शुरुआत करने वाले 21 वर्षीय विकी श्रेयन कहते हैं, ‘‘भारत में अब भी यह शुरुआती अवस्था में है. पहले जब हम लोग कहीं किसी आयोजन में नाचते थे, तो लोग हमें सर्कस वाला समझते थे. अब कुछ जगहों पर बाकायदा इसको प्रोत्साहन मिल रहा है, हमारे मेंबर बढ़ रहे हैं.’’Society

प्यार भरा नाच
भारत के महानगरों में सालसा के लोकप्रिय होने की एक वजह यह है कि यह आपमें नई जान डाल देता है और तनाव मुक्त करता है. लंदन के लैटिन बैशेज की तर्ज पर सालसा नाइट की शुरुआत करने वाली चौती नरूला कहती हैं, ‘‘यह एक लत है, लेकिन खुद को तनावमुक्त करने और ध्यान लगाने का बेहतर तरीका है.’’ आज महानगरों में युवा पीढ़ी के बीच कथक से ज्यादा लोकप्रिय फ्लेमेंको, कसीनो रुएदा और पासो दोब्ले जैसे यूरोपीय डांस हैं. दोस्तों के साथ शाम बिताने का सबसे अच्छा और नया नुस्खा स्पैनिश फूड है. यही नहीं, स्पेनिश सीखने के मामले में सबसे ‘‘कूल’’ भाषा बन चुकी है.

मुंबई में एक स्पेनिश डांस एकेडमी तान्ज़ ड्ढवेर्दन बॉलरूम इंटरनेशनल की सह-संस्थापक 35 वर्षीया रीशा धुलप बताती हैं, ‘‘पहले लोग सिर्फ सालसा के बारे में जानते थे, अचानक लैटिन कल्चर के प्रति बढ़ती दिलचस्पी के साथ अब नौजवान लोग जाइव, बाचाता, फ्लैमेंको और सांड़ से लड़ाई वाली आक्रामक नृत्य शैली पासो दोब्ले सीखने चले आ रहे हैं.’’ पिछले कुछ साल में उनकी एकेडमी में लैटिन डांस सीखने वाले युवाओं की संख्या तेजी से बढ़ी है.Salsa

भूतों की दीवानगी
नई पीढ़ी में भुतहा सनक अभी उतनी तेजी से तो नहीं फैली है, लेकिन गथ प्रेमी (जर्मन आधिदैविक कलाएं) छोटे-छोटे समूहों में ही ‘‘इसके दर्द का सुख्य्य ले रहे हैं, जैसा दिल्ली की 23 वर्षीया अर्पिता काला हमें समझाती हैं. इसका थीम डार्क होता है, इसलिए गॉथिक वेश धरने के लिए इसमें हिस्सा लेने वालों को काली जालीदार स्टॉकिंग पहननी होती है, बड़े-बड़े मध्यकालीन क्रॉस (ईसाई धर्म चिन्ह) लटकाने होते हैं, बाल सफाचट करने होते हैं और माथे पर एडगर एलन पो की कविता गुदवानी होती है.

भारत की यह कूल, शहरी संस्कृति अब संप्रदायों में तब्दील होती जा रही है. इनके चाहने वालों की भीड़ बढ़ती ही जा रही है. अलग दिखने के लिए कुछ भी कर गुजरने को इस पगलाई दुनिया में आपका स्वागत है.

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