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टीम का चेहरा बदलने का क्या यही है सही वक्त?

फिर से कामयाबी के लिए क्या चाहिए भारतीय टीम को? सूची लंबी है पर असंभव नहीं. नया कप्तान, बेहतर सपोर्ट स्टाफ, कम तड़क-भड़क और ज्यादा सोच-विचार.

अपडेटेड 9 जनवरी , 2013

इसे प्रतिशोध की सीरीज की तरह प्रचारित किया गया. इंग्लैंड में 4-0 से हारकर लौटी भारतीय टीम गुस्से से बलबलाती हुई अपने घरेलू मैदान पर इंग्लैंड के कप्तान कुक और उनके साथी खिलाडिय़ों का इंतजार कर रही थी. नीली जर्सी वाले भारतीय खिलाडिय़ों को यह लगता था कि इस बार हिसाब बराबर करने का मौका है. इस प्रतिशोध वाले रवैए की वजह बताते हुए एक खिलाड़ी ने कहा, ''आप नहीं जान सकते कि 2011 के इंग्लैंड दौरे पर हमें कैसा अनुभव हुआ था. प्रैक्टिस से लेकर खेल तक, हर छोटी-बड़ी चीज के जरिए इसका पुख्ता इंतजाम किया गया कि हम वहां के मौसम-माहौल के अनुकूल न ढल सकें या अच्छा प्रदर्शन न कर पाएं. और इसके बाद हमारे लगातार कई खिलाड़ी चोटिल हो गए.”

जब क्यूरेटरों ने चार टेस्ट मैचों की सीरीज के तीन मैचों में ट्रैक बदलने और सहज, सख्त, तेज गेंदबाजी के अनुकूल पिचों को नया रूप देने के कप्तान एम.एस. धोनी के अनुरोध को नजरअंदाज कर दिया तो धीरे-धीरे यह गुस्सा मोहभंग में बदल गया. इसका परिणाम हुआ कि 28 साल में पहली बार इंग्लैंड ने भारत की सरजमीं पर 2-1 से सीरीज जीत ली.

बदले की भावना से अभिभूत खिलाड़ी 15 नवंबर से शुरू और 17 दिसंबर को खत्म होने वाले चार टेस्ट मैचों के दौरान मानसिक रूप से बिखर गए और बे-आबरू होकर उन्हें यह स्वीकार करना पड़ा कि इंग्लैंड ने वास्तव में अपना होमवर्क अच्छी तरह से किया है. कोलकाता टेस्ट से ठीक पहले एक खिलाड़ी ने पिच को टीम की संतुष्टि के मुताबिक तैयार करने के सवाल को खारिज कर दिया. उन्होंने कहा, ''इससे क्या बदल जाएगा? मुंबई में घूमती पिच मिली थी. क्या हुआ?”

हालांकि, चयनकर्ताओं ने सीरीज के बीच में ही टीम में फेरबदल कर जहीर खान, युवराज सिंह और कमजोर प्रदर्शन कर रहे बॉलर हरभजन सिंह को बाहर कर दिया था, लेकिन खासकर सचिन तेंडुलकर के बेहतर प्रदर्शन न कर पाने की वजह से भारतीय टीम को काफी नुकसान हुआ. खिलाडिय़ों को लगने लगा है कि उनका सर्वश्रेष्ठ बल्लेबाज जो पिछले वर्षों में 'इंजन का ड्राइवर’ हुआ करता था, अब 11 की टीम में एक बेटिकट यात्री जैसा ही रह गया है. अपमान से बचने के लिए टीम इंडिया को अपने भीतर और बाहर नीतिगत स्तर पर और व्यक्तियों में बदलाव करने की जरूरत है.Cricket

नए लुक वाली टीम के लिए नया कप्तान
वर्ष 2007 से 2008 के बीच भारत के पास दो कप्तान थे-वनडे और टी20 मैचों के लिए धोनी तो टेस्ट मैचों के लिए अनिल कुंबले. लेकिन अनिल कुंबले के रिटायर होने के बाद धोनी सभी तरह के मैचों के लिए कप्तान बन गए. अब फिर से अलग-अलग कप्तान की नीति पर वापस जाना होगा. यह ऐसी अवधारणा है जिसे दक्षिण अफ्रीका, इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया, पाकिस्तान और श्रीलंका जैसे देशों ने अपनाया है.

हाल की इंग्लैंड सीरीज के दौरान टीम के चयन, खिलाडिय़ों के क्रम और उन्हें मैदान में लगाने के गलत तरीकों से यह बात लगभग साबित हो गई है कि अब धोनी के कंधे से बोझ का एक हिस्सा किसी और को सौंप देना चाहिए. सुनील गावस्कर, बिशन सिंह बेदी और सौरव गांगुली जैसे कई दिग्गज खिलाडिय़ों ने धोनी को टेस्ट टीम से बाहर रखने या उन्हें टेस्ट की कप्तानी से हटाने की वकालत की है.

इंग्लैंड के खिलाफ चौथे टेस्ट मैच में धोनी के स्कोर का हवाला देते हुए बेदी गरजते हैं, ''धोनी को खुद को भाग्यशाली समझना चाहिए कि वे अब भी वहां बने हुए हैं. वे टेस्ट लायक कप्तान नहीं हैं. हमें ऐसा कप्तान चाहिए जो कम-से-कम 11 की टीम में अपनी जगह साबित कर सके. मुझे बताएं कि उनका 99 बनाना टीम के किसी काम आया है? मैं तो विराट कोहली को कप्तान बनाता. उनके पास क्रिकेट का तेज दिमाग है. आपको युवा खून पर भरोसा करना होगा. हम काफी समय से कई अनावश्यक लोगों को ढो रहे हैं.”

पूर्व भारतीय कप्तान अजित वाडेकर भी कहते हैं, ''मैं इस बात से सहमत हूं कि हम हर समय जीत नहीं सकते, लेकिन हम तो हमेशा हारते दिख रहे हैं. विराट कोहली या गौतम गंभीर को टेस्ट टीम का कप्तान बनाया जाए, रोहित शर्मा और अजिंक्य रहाणे को टेस्ट टीम में खेलने के लिए तैयार किया जाए और जब भी कोई प्रतिभावान लड़का मिलता है तो उसे तत्काल भारतीय टीम में शामिल कर लेने की जगह घरेलू क्रिकेट में उस पर नजर रखें ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि वह तैयार हो गया है.”

सर्वश्रेष्ठ चेहरों को आगे बढ़ाएं
तेंडुलकर को छोड़कर मौजूदा पंक्ति के किसी भी खिलाड़ी ने तीनों फॉर्मेट में से किसी एक में न खेलने का निर्णय नहीं लिया है. मौजूदा टेस्ट टीम के दस खिलाडिय़ों को सितंबर में श्रीलंका में होने वाली वर्ल्ड टी20 चैंपियनशिप के लिए तैयार 15 खिलाडिय़ों की मजबूत टीम में भी शामिल किया गया था. निश्चित रूप से नए चेहरों की जरूरत है और उन्हें किसी एक फॉर्मेट के लिए कारगर बनाने की जरूरत है. 1983 में विश्व कप जीतने वाली टीम के कप्तान रहे कपिल देव ने कहा, ''आपको टेस्ट टीम के लिए विशेषज्ञ खिलाडिय़ों की जरूरत है, सिर्फ ऐसे लड़कों की नहीं जो गेंद और बल्ले के साथ खेल सकते हों.”

भारतीय टीम को तेंडुलकर के बिना जीना सीखना होगा और जहीर को छोटे फॉर्मेट से बाहर रहना चाहिए. धोनी को टेस्ट मैचों में खेलना छोड़ देना चाहिए, तकनीकी रूप से ज्यादा मजबूत वृद्धिमान साहा या दिनेश कार्तिक को विकेट कीपिंग का मौका देना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि धोनी वनडे और टी20 मैचों के लिए शारीरिक और मानसिक रूप से तैयार रहें. वीरेंद्र सहवाग के लगातार चोटिल होते रहने से उनके 2015 तक खेल पाने की संभावना मुश्किल ही लग रही है. उन्हें तीनों फॉर्मेट में अपनी मौजूदगी के बारे में पुर्निवचार करना चाहिए.

युवराज सिंह सीमित ओवर वाले फॉर्मेट के लिए सबसे उपयुक्त हैं. टेस्ट टीम को ईशांत शर्मा, उमेश यादव, अशोक डिंडा और परविंदर अवाना जैसे अच्छे तेज गेंदबाजों की जरूरत है. इरफान पठान, प्रवीण कुमार और भुवनेश्वर कुमार को छोटे फॉर्मेट में उतारा जा सकता है. वनडे और टी20 मैचों के लिए एक अलग, फिट टीम रखना सबसे अच्छी बात होगी. इसी प्रकार विभिन्न दशाओं के लिए विभिन्न तरह के बॉलिंग आक्रमण की भी जरूरत है.

टीम इंडिया के इर्दगिर्द की टीम को भंग करें
मोटे और ज्यादा उम्र के डंकन फ्लेचर पूरी तरह से फिट नहीं दिखते, खासकर ऐसे समय में जब एक टीम को आगे रहने के लिए युवा कोच की जरूरत है. फ्लेचर के योगदान को नतीजों के संदर्भ में तौलना होगा. फ्लेचर की खासियत रणनीति बनाने की है. उनके दो साल के कार्यकाल में 20 टेस्ट मैचों में से सिर्फ छह में जीत मिलना साफ तौर से उनकी विफलता को जाहिर करता है. उनके सहयोगी फील्डिंग कोच ट्रेवर पेन्नी और बॉलिंग कोच जो डेवेज भी कोई चमत्कार नहीं कर पाए हैं. कोलकाता टेस्ट के दौरान भारत के बॉलिंग कोच के बारे में पाकिस्तानी पेसर वसीम अकरम ने मजे लेते हुए कहा, ''क्या भारत के पास बॉलिंग कोच है? मुझे तो ऐसा नहीं दिखता.” प्रज्ञान ओझा और रविचंद्रन अश्विन अपने व्यक्तिगत कोच से सलाह लेने लगे हैं.Ganguly

यहां यह पूछना प्रासंगिक होगा कि बीसीसीआइ ने कोच के पद के लिए भारतीय नामों पर विचार करना क्यों छोड़ दिया. आइपीएल जीतने वाली टीम कोलकाता नाइटराइडर्स के असिस्टेंट कोच और दिल्ली की रणजी टीम के चीफ कोच विजय दहिया ने कहा, ''यह कहना गलत होगा कि भारतीय कोच अच्छे नहीं हैं. हमने उन्हें पूरा मौका ही नहीं दिया है.” लालचंद राजपूत का उदाहरण लें, जिनके नेतृत्व में भारतीय टीम 2007 में टी-20 वर्ल्ड कप जीती थी. वे भारतीय ए टीम के इंचार्ज हैं. कुछ वजहों से उन्हें कभी भी भारतीय कोच के लिए शॉर्टलिस्ट की गई सूची में नहीं रखा गया. सौरव गांगुली, राहुल द्रविड़, अनिल कुंबले और वी.वी.एस. लक्ष्मण जैसे दिग्गजों की महारत का इस्तेमाल युवा खिलाडिय़ों को बुनियादी क्रिकेट सिखाने के लिए किया जाना चाहिए. द्रविड़ ने यह संकेत भी दिया है कि उन्हें कोच बनने से गुरेज नहीं है,  आक्रामक नई टीम इंडिया बनाने वाले गांगुली का इस्तेमाल फिर से टीम के पुनरुत्थान के लिए करना चाहिए.

नया टैलेंट चाहिए
बोर्ड और चयनकर्ताओं ने पिछली कतार के लिए खिलाडिय़ों की जरूरत को नजरअंदाज किया है. भारत में लेग-स्पिन के फिलहाल सिर्फ  तीन खिलाड़ी हैं—अमित मिश्रा जिनकी गेंद हवा में काफी धीमी हो जाती है, राहुल शर्मा जो ज्यादा तेज गेंद फेंक देते हैं और पीयूष चावला, जो गेंद को पर्याप्त टर्न नहीं दे पाते.

पहले भारतीय-ए टीम के दौरे को खिलाडिय़ों को उपहार की तरह दिया जाता रहा है, जो मेरिट की जगह कई मानदंड की वजह से इसमें जगह पाते थे. उन्मुक्त चंद और हरमीत सिंह की किस्मत पर नजर डालें. ये दोनों खिलाड़ी इस साल अंडर-19 वर्ल्ड कप जीतने वाली टीम का हिस्सा रहे हैं और इयान चैपल तथा वसीम अकरम ने भारत की असल संभावनाओं के रूप में उनकी तारीफ  की है. उन्मुक्त फिलहाल दिल्ली की रणजी टीम में जगह बनाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, जबकि हरमीत को अभी इस सीजन में मुंबई इलेवन में ब्रेक मिलने का इंतजार है. उनके हाशिए पर चले जाने का जोखिम है जैसा कि पहले अंडर-19 के दूसरे सितारों का हश्र हो चुका है.

भारतीय टीम के पूर्व ओपनर नवजोत सिंह सिद्धू कहते हैं, ''यदि आप किसी खिलाड़ी में पांच साल तक का भविष्य देखते हैं तो उसमें निवेश करें. लेकिन टेस्ट क्रिकेट को पर्याप्त महत्व दें क्योंकि वह मूल है. हर चीज उसी से निकली है.”

चोट से उबरने की कला
चोट प्रबंधन एक और महत्वपूर्ण पहलू है जिसकी क्रिकेट प्रशासक शायद ही चिंता करते हैं. चोटिल खिलाडिय़ों में उमेश यादव, वरुण एरोन, मुनाफ पटेल, प्रवीण कुमार, जहीर और आर.पी. सिंह के साथ आर. विनय कुमार भी शामिल हो गए हैं. करीब दो साल गायब रहने के बाद एस. श्रीसंत ने हाल में पहला मैच खेला है.

इस मामले में ऑस्ट्रेलिया के उदाहरण से सीख ली जा सकती है. विरोध के बावजूद वहां की टीम में खिलाडिय़ों को अंदर-बाहर किया जाता है. यहां तक कि नवंबर में नंबर वन टेस्ट रैंकिंग के निर्धारण के लिए दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ  मैच खेलना था, तब भी ऑस्ट्रेलिया ने तीनों टेस्टों में अलग-अलग बॉलरों के साथ खेला और निर्णायक टेस्ट मैच में बेन हिलफेनहॉस और पीटर सिडल जैसे मुख्य गेंदबाजों को आराम दिया गया क्योंकि वे बहुत ज्यादा खेल चुके थे. जब लगातार कई तेज गेंदबाज चोटिल होने लगे तो ऑस्ट्रेलिया को यह पता लगा कि जूतों में स्पाइक के एक खास डिजाइन की वजह से ऐसा हो रहा है और खिलाडिय़ों को ऐसे जूते न पहनने की सलाह दी गई. भारत में इतने विस्तार से चीजों को देखने का अभाव है.

तड़क-भड़क को अलविदा, बुनियाद पर लौटें
टी-20 लीग, आइपीएल से जो चकाचौंध वाला पैसा आया है उससे यह बात सुनिश्चित हो गई है कि ख्याति हासिल करने के लिए जनरेशन जेड (बिल्कुल नई पीढ़ी) लंबे रास्ते पर चलना पसंद नहीं कर रही है. छोटे से छोटे फॉर्मेट वाले क्रिकेट को इसके लिए दोषी माना जा सकता है क्योंकि इससे युवा बल्लेबाज तात्कालिक प्रदर्शन की कला सीखने पर जोर दे रहे हैं जिससे भविष्य में बेहतर टेस्ट बल्लेबाजों के आने का रास्ता अवरुद्ध हो रहा है.

पंजाब ने इस बुराई को रोकने के लिए 22 वर्ष से कम उम्र के खिलाडिय़ों के आइपीएल या टी-20 फॉर्मेट में खेलने पर पाबंदी लगा दी है, लेकिन अन्य राज्यों ने अभी कोई सबक नहीं लिया है. बुनियाद को मजबूत करने का अन्य पहलू यह है कि विदेशों में ज्यादा मैच खेले जाएं, ताकि चुनौतीपूर्ण वातावरण में खेलने के कौशल वाले खिलाडिय़ों का समूह लगातार तैयार होता रहे. विदेशों के ऐसे विपरीत वातावरण अकसर भारत के लिए अभिशाप साबित होते हैं.

इंग्लैंड में पिटने, और 2011 में ऑस्ट्रेलिया में पिटने के बाद अब भारतीय टीम को अपने घर में ही हार का अपमान सहना पड़ा है. फिर भी बीसीसीआइ चुप है और लोगों का गुस्सा शांत हो जाने का इंतजार कर रही है. लेकिन इस बार बचने का कोई रास्ता नहीं है. संकट से निपटने के लिए कुछ तात्कालिक कदम उठाने होंगे और अगले एक साल में लगातार प्रयास भी करना होगा. तब जाकर विजेता बना जा सकेगा. आखिर चैंपियन बनना कोई मजाक नहीं है!

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