आलोचना और विचारधारा, साहित्य की पहचान, सम्मुख, साथ-साथ
संपादक: आशीष त्रिपाठी
राजकमल प्रकाशन,
दरियागंज, नई दिल्ली-2,
चारों खंडों की कीमत: 1,500 रु.
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सम्प्रति नामवर सिंह हिंदी आलोचना के शिखर पुरुष हैं. साहित्य के परिदृश्य पर उनके हर हस्तक्षेप का महत्व होता है. सहमति-असहमति के बावजूद उनकी राय की अपेक्षा की जाती है. यद्यपि वर्षों से लेखकीय परिपाटी को त्यागकर उन्होंने वाचिक परंपरा अपना ली है, फिर भी उनका महत्व यथावत् है. ऐसे में पुस्तक स्वरूप में फिर से चार जिल्दों में उनके व्याख्यान और साक्षात्कार के संकलित प्रकाशन का अपना महत्व है. चूंकि ये पुस्तकें योजनाबद्ध और लिखित नहीं हैं, इस कारण इनमें एकरूपता और विषय की केंद्रीयता का अभाव है. इसके बावजूद यहां संग्रहीत शब्द सुचिंतित-सुविचारित हैं.
इन चार पुस्तकों में से दो आलोचना और विचारधारा और साहित्य की पहचान व्याख्यानों का संग्रह हैं, जो भिन्न-भिन्न अवसरों पर अलग-अलग मंचों पर दिए गए हैं. सम्मुख और साथ-साथ साह्नात्कार की किताबें हैं. सम्मुख के प्राय: हर साक्षात्कार में अलग-अलग पर एक ही प्रश्नकर्ता है. साथ-साथ में ज्यादातर संवादों में नामवर एक पक्ष हैं और उनके साथ कई लोगों की बातचीत है.
इस कारण साथ-साथ ज्यादा संवादी और बहसपरक है. नामवर जी की अब तक आई साक्षात्कारों की पुस्तक में यह किंचित भिन्न है. यह कई मुद्दों पर एक डिबेट है.
अगर इन किताबों के माध्यम से भी देखें तो नामवर जी के आलोचकीय व्यक्तित्व की ऊंचाई एवं विस्तार का पता चलता है. साहित्य के अकादमिक प्रश्न, आस्वादपरक पहलू, समकालीन विमर्श, चिंता के बिंदु पर प्रखर वक्तव्य मौजूद हैं. हां, कई बार वक्तव्य की तात्कालिकता में विश्लेषणात्मकता में कमी दिखाई देती है और नामवर जी संबद्ध विषय पर सिर्फ राय देते प्रतीत होते हैं.
आलोचना और विचारधारा नामवर जी के आलोचक-व्यक्तित्व के विविध पक्षों को सामने लाती है. एक ओर इस पुस्तक में गोल्डमान, रेमंड विलियम्स, रामविलास शर्मा, राÞल सांकृत्यायन जैसे व्यक्तियों के अवदान पर केंद्रित स्थायी महत्व के व्याख्यान हैं, वहीं आलोचना और साहित्य के समक्ष वर्तमान में दरपेश चुनौतियां भी विचारणीय हैं. 'आज की चुनौतियां और साहित्य’ शीर्षक निबंध में नामवर जी साहित्य में मुख्यधारा जैसी किसी चीज से इनकार करते हैं.
दरअसल नामवर जी का प्रतिमान वर्चस्ववाद के बरक्स बहुलता का स्वर रहा है. मार्क्सवादी दृष्टिकोण में प्रबल आस्था के बावजूद वे ऐसे आलोचकों की आलोचना करते हैं, जो माक्र्सवाद के संदर्भ में रैशनल होने की जगह जड़ता को अपनाते हैं, ''कार्ल माक्र्स के लिए वर्ग संघर्ष एक ऐसा अंध बिंदु है, जिसके परे वे कुछ और देख ही नहीं सके. दुर्भाग्यवश भारत में कई मार्क्सवादियों ने भी उनके 'अंध बिंदु’ को ज्यों का त्यों उठा लिया. वे मजदूर के शोर में किसान को और वर्ग के शोर में जाति और वर्ण को भूल गए.’’
साहित्य की पहचान पुस्तक कविता और कथा विधा पर केंद्रित है. इसमें कविता वाले खंड में कालिदास, कबीर, निराला, पंत, महादेवी वर्मा, अज्ञेय, भारत भूषण अग्रवाल से लेकर 'इधर की कविता’ पर विचार किया गया है. 'कालिदास एवं आधुनिक भाव-बोध 'शीर्षक निबंध में नामवर जी ने कालिदास का महत्व इस बात में रेखांकित किया है कि उन्होंने व्यवस्था की सीमा में रहते हुए उससे मुक्त होने का प्रयास किया है. नामवर जी फैशन के रूप में रीति काल की आलोचना को ठीक नहीं मानते तथा उसे युग के परिप्रेक्ष्य में देखते हैं.
सम्मुख और साथ-साथ में विचारणीय विषय को और व्यापकत्व मिलता है. यहां मार्क्सवाद, 1857 की क्रांति, किसान, अस्मिता-विमर्शवादी आंदोलन, वामपंथी राजनीति, भारत की अमेरिकोन्मुखता, लेखक-प्रकाशन जैसे अनेक अवधारणात्मक, सामाजिक, तात्कालिक प्रश्नों पर नामवर जी के विचार सामने आते हैं. कई साक्षात्कार तो काफी महत्व के हैं, मसलन सुरेश पांडे के द्वारा लिया गया कहानी केंद्रित साक्षात्कार कहानी विधा को समझने की दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण है.
इन सारे व्याख्यान और साक्षात्कार के बीच नामवर जी में कहीं न कहीं न लिख पाने की कसक है, जो 'सम्मुख’ के अंतिम साह्नात्कार में व्यक्त हुई है—''...पछतावा इसी चीज का है मुझे...जो कुछ चीजें हैं मेरे दिमाग में, योजनाएं बनी हुई हैं, उनको पूरा करके मैं लिख जाना चाहता हूं.” कुल मिलाकर ये पुस्तकें एक प्रखर आलोचक के सरोकार, अवदान के विविध आयामों को सामने लाती हैं. यहां प्राय: कोई नई स्थापना नहीं है. ये नये सिरे से किसी बहस को जन्म नहीं देतीं क्योंकि ये पूर्व में दिए गए वक्तव्यों का प्रकाशन हैं. नामवर जी विचारधारा के प्रति अडिय़ल रुख नहीं रखते, मार्क्सवादी आलोचना के एसेंस के साथ ही उनमें खांटी भारतीय देशजपन भी है. भारतीय संदर्भ उनसे ओझल नहीं होता. उनमें खंडन है तो निर्माण भी.

