अफगानिस्तान के क्रिकेटर खेल के बड़े उस्ताद भले न हों, लेकिन उनकी आंखों में एक सपना है. हरफनमौला करीम सादिक कहते हैं कि 2020 तक उनकी टीम दुनिया में अव्वल होगी. श्रीलंका में बीते 19 सितंबर को हुए ट्वेंटी-20 विश्व कप के मैच में जिस तरह से उनकी टीम ने भारत की टीम को 23 रनों की मुश्किल जीत के लिए मजबूर कर दिया, उसे देखकर लगता है कि करीम की बातों में दम है.
अफगानी क्रिकेट टीम 2005 में दुनिया में 39वें स्थान पर थी लेकिन इस बार विश्व कप में उसकी रैंकिंग 14वीं है. अब तक खेले ट्वेंटी-20 विश्व कप के चार मैचों में—2010 में वेस्टइंडीज में भारत और दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ तथा इस बार भारत और इंग्लैंड के खिलाफ—उसने भले कोई जीत हासिल न की हो, लेकिन उसके निडर और उत्साही खिलाड़ियों को पक्का भरोसा है कि जंग से बिखर चुके उनके देश को क्रिकेट ही जोड़ सकता है.
अफगान क्रिकेट बोर्ड के अध्यक्ष हामिद शिनवारी कहते हैं, ''हमारे लिए यह महज खेल नहीं. अफगानियों की खुशी दांव पर लगी है. इस खेल से हम अफगानिस्तान में अमन कायम कर सकते हैं. '' 30 वर्ष के शिनवारी जानदार शख्स हैं. उनका मिशन विश्व क्रिकेट में अफगानिस्तान को अच्छा दर्जा दिलाना है. अफगानिस्तान के जंगी इतिहास के आईने में देखें तो रोजाना की गुर्बत, लाचारी और अज्ञानता के अंधेरे से छापामार जंग के मैदानों तक निकलकर आती नित नई दास्तानों के बीच यहां की इस छोटी-सी क्रिकेट टीम की कामयाबियां दिल को सुकून देती हैं. यह दास्तान अब एक पुरस्कृत डॉक्युमेंट्री आउट ऑफ द ऐशेज में पैबस्त हो चुकी है, जिसकी पटकथा खेल की ताकत के मुकाबले टीम के भीतर एक-दूसरे के खिलाफ की जाने वाली सियासत पर ज्यादा जोर देती है. हर बार हारने के बावजूद अफगानी टीम को जो मीडिया कवरेज मिलता है, वह किसी विजेता से कम नहीं है.
इंटरनेशनल क्रिकेट काउंसिल (आइसीसी) ने इस बार श्रीलंका में आयोजित ट्वेंटी-20 विश्व कप में खेलने के लिए दो उभरती हुई नई टीमों— अफगानिस्तान और आयरलैंड—को चुना. अफगानिस्तान को भारत और इंग्लैंड के खिलाफ उतारा गया जबकि आयरलैंड को ऑस्ट्रेलिया और वेस्ट इंडीज से मैच खेलना पड़ा. अफगानियों ने बेहतरीन बल्लेबाजी और गेंदबाजी की नुमाइश से भारत को छका दिया. ओपनर सहवाग और गंभीर बाएं हाथ के लंबे तेज गेंदबाज शपूर जदरान के हमले में सस्ते में निबट गए.
ऐसा लगा कि भारत हार जाएगा, लेकिन कमजोर फील्डिंग ने उसे बचा लिया और चार कैच छूटने का नतीजा यह हुआ कि भारत पांच विकेट पर 159 के स्कोर तक पहुंच सका. इसके बाद नौसिखिए अफगानी बल्लेबाज भारत की फिरकी के आगे ढहते चले गए. दो दिन बाद इंग्लैंड ने अफगानी गेंदबाजों की अच्छी धुनाई करके पांच विकेट पर 196 का स्कोर खड़ा कर दिया और 17.2 ओवरों में 80 पर पूरी टीम को निबटा दिया. एक वक्त आठ विकेट महज 26 रनों पर गिर चुके थे, लेकिन गुलबुद्दीन नाइब के 44 रनों की पारी ने टीम को शर्मिंदगी से बचा लिया.
शिनवारी को तो मुकाबले के लिए चुन लिया जाना ही जीत लग रही है. ''वे कहते हैं, कुछ साल पहले हम जर्सी (इंग्लिश चैनल का द्वीप) के लिए खेलते थे.'' टीम की इस कामयाबी के चलते क्रिकेट अब अफगानिस्तान के राष्ट्रीय मानस का हिस्सा बन गया है. खिलाड़ी, अधिकारी और इस खेल को चाहने वाले कह रहे हैं कि अब यही इस देश का राष्ट्रीय खेल है.
यह दावा मामूली नहीं है. अफगानिस्तान जातीय, कबायली, भाषायी और मजहबी खांचों में बंटा हुआ है. अब तक क्रिकेट सिर्फ पख्तूनों से जुड़ा था जबकि तीन करोड़ की मिश्रित आबादी वाले ताजिक, उज़्बेक और हजारा इससे दूर रहते थे. टीम के सारे खिलाड़ी पख्तून हैं जिनका इलाका पाकिस्तान की सरहद से लगता है. रूस ने 1979 में जब हमला किया था तो लाखों लोग देश छोड़कर पाकिस्तान चले गए थे. वे वहां के शरणार्थी शिविरों में रहते हुए क्रिकेट खेलना सीखे हैं. गृहयुद्ध के समय अधिकतर पाकिस्तान में रहे. जब 9/11 के बाद अमेरिकी हमले में तालिबान का पतन हुआ, तब कहीं जाकरे शरणार्थी वतन लौटे. अपने साथ वहीं से वे क्रिकेट लेकर आए.
टीम के स्टार बल्लेबाज सादिक का परिवार पूर्वी अफगानिस्तान के जलालाबाद को छोड़कर तब चला गया था जब वे सिर्फ तीन साल के थे. सादिक पेशावर के एक शरणार्थी शिविर में अपना अनुभव बताते हैं, ''पाकिस्तानी टीवी पर रोज लाइव क्रिकेट आता था जिसे देखकर मैं बहुत उत्साहित होता था. फिर मैंने खेलना शुरू कर दिया.'' सादिक ने पेशावर में क्लब क्रिकेट खेला और धीरे-धीरे उन्होंने शरणार्थी नौजवानों की एक टीम खड़ी कर डाली. वे कहते हैं कि टीम ने एक स्थानीय क्लब टूर्नामेंट में दूसरा स्थान हासिल करके इतना अच्छा प्रदर्शन किया कि उन्हें लीग से ही बाहर कर दिया गया.
मुस्कराते हुए उन्होंने बताया, ''वे बोले, यह पाकिस्तान है, तुम लोग यहां मत खेलो. हमें प्रतिबंधित कर दिया गया. '' तब तक तालिबान की चूलें हिल चुकी थीं और उनका परिवार लौटकर जलालाबाद आ गया. उनके बड़े भाई ताज मलिक आलम ने राष्ट्रपति हामिद करजई के समर्थन से राष्ट्रीय टीम बनाई और उसके पहले प्रशिक्षक बने. उनके नेतृत्व में पहली कामयाबी टीम को 2010 में तब मिली जब वेस्ट इंडीज में ट्वेंटी-20 के लिए उसे चुन लिया गया. आज टीम को आइसीसी के ग्लोबल डेवलपमेंट प्रोग्राम के तहत सालाना सात लाख डॉलर का अनुदान मिलता है, साथ ही खेलने, प्रशिक्षण, अंपायरिंग और खेल प्रशासन संबंधी सुझव और प्रतिस्पर्धा के अवसर भी मिलते हैं.
आइसीसी की ग्लोबल रैंकिंग में अफगानिस्तान को 'एफिलिएट' (संबद्ध) राष्ट्र का दर्जा मिला हुआ है, लेकिन2013 के मध्य में आइसीसी के सालाना आम बैठक में उम्मीद है कि यह दर्जा बढ़कर 'एसोसिएट' यानी सहयोगी राष्ट्र का हो जाए. आइसीसी के ग्लोबल डेवलपमेंट मैनेजर टिम एंडरसन का कहना है कि सालाना अनुदान बढ़कर एक मिलियन डॉलर (5.3करोड़ रु.) हो जाने के अलावा सहयोगी दर्जे का टीम पर कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा.
वे कहते हैं, ''अच्छे एफिलिएट को अच्छे एसोसिएट के बराबर ही मिलता है. ये खिलाड़ी इतने अच्छे हैं कि एफिलिएट दर्जे वाले देशों में कोई इनके आसपास भी नहीं है, इसलिए वे अलग स्थिति में हैं. वे एफिलिएट के साथ नहीं खेलते, बल्कि सबसे अच्छी एसोसिएट टीमों आयरलैंड, नीदरलैंड्स, केनिया, स्कॉटलैंड और कनाडा के साथ खेलते हैं.''
शिनवारी को शिकायत है कि अफगानी टीम ने अब तक सिर्फ दो एकदिवसीय मैच खेले हैं—फरवरी में पाकिस्तान के खिलाफ और अगस्त में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ. वे आश्चर्य जताते हैं कि आखिर क्षेत्रीय स्तर की भारत जैसी ताकतवर टीमें उन्हें अपने साथ क्यों नहीं खेलने का मौका देती हैं. वे बताते हैं, ''अफगानिस्तान इकलौता एफिलिएट है जिसके पास किसी भी अंतरराष्ट्रीय टीम के खिलाफ खेलने की क्षमता है. '' अफगानिस्तान ने दोनों एकदिवसीय मैच संयुक्त अरब अमीरात में खेले थे, जहां शारजाह क्रिकेट क्लब का 25000 क्षमता वाला स्टेडियम आधिकारिक रूप से तब तक अफगानी टीम का ''होम ग्राउंड'' है जब तक कि उनके यहां जंग जारी है और अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट खेलना वहां मुमकिन नहीं. अफगानिस्तान दोनों मैच हार गया था, लेकिन उसने श्रीलंका जैसी ही कड़ी टक्कर वहां दी थी और अपने दावे को दोबारा मजबूत किया था कि एक न एक दिन वे दुनिया की सबसे अच्छी टीमों में शामिल होंगे.
टेस्ट खेलने वाले देशों का सदस्य बनने से पहले उन्हें लंबा रास्ता तय करना है. आइसीसी के एंडरसन कहते हैं कि शिनवारी का शिकवा उन्हें समझ आता है, लेकिन वे इस बात की ओर ध्यान दिलाते हैं कि ''एसोसिएट्स और पूर्णकालिक सदस्यों के बीच अभी भारी अंतर है. '' अफगानिस्तान बड़ी टीमों के साथ खेलना तो चाहता है, लेकिन उसकी टीम खुद अभी बड़ी नहीं हुई है.
'बड़ी टीमें' यानी भारत और ऑस्ट्रेलिया के अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट शेड्यूल बिल्कुल टाइट हैं, आइपीएल खेलने की भी बाध्यताएं हैं. एंडरसन कहते हैं कि इतने व्यस्त कार्यक्रम में बड़ी टीमों के पास छोटी टीमों को जगह दे पाने का वक्त ही नहीं है. वे कहते हैं, ''आखिर सदस्यों को तो एक-दूसरे के साथ खेलने को तैयार होना ही पड़ेगा. हर कोई भारत के साथ खेलना चाहता है लेकिन भारतीयों को ही तय करना होगा कि उनके लिए सही क्या है.''
अफगानी टीम 2009 से पेशेवर ढांचे में काम कर रही है, हालांकि बोर्ड ने वेतन का विवरण देने से मना कर दिया. एक प्रवक्ता नसरतुल्ला वफा ने सिर्फ इतना बताया, ''अच्छी रकम है. '' वतन लौटकर अफगानी टीम ने अपना अधिकांश समय अपनी विपक्षी एसोसिएट और टेस्ट दर्जे वाली टीमों के खेल और अभ्यास का वीडियो देखते हुए बिताया है. वफा ने बताया कि करीब आधा दर्जन बल्लेबाज 2011 में पुणे की एक निजी अकादमी ग्लोबल एकेडमी में समय गुजार चुके हैं. अफगानी क्रिकेट बोर्ड को उम्मीद है कि सहयोग के मामले में भारत भी ऑस्ट्रेलिया जैसी ही उदारता दिखाएगा. शिनवारी कहते हैं, ''अब तक भारत ने मामूली सहयोग किया है. वहां की सरकार ने हमें एकाध साल में कुछ स्टेडियम तैयार करके देने का वादा किया था, लेकिन अभी तक समझौते पर दस्तखत नहीं हुए हैं. ''
ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी माइकल हसी अफगानिस्तान के समाज पर क्रिकेट के प्रभाव की तुलना ऑस्ट्रेलिया से करते हैं, जहां कम ओवरों का क्रिकेट काफी तेजी से लोकप्रिय हुआ है. वे कहते हैं, '''यह अलग-अलग संस्कृतियों और राष्ट्रों के लोगों को साथ लाने का मामला है. ऑस्ट्रेलिया में कई संस्कृतियों और राष्ट्रों का प्रतिनिधित्व होता है और टी-20 उम्र, वर्ण, नस्ल और लैंगिक विविधताओं को एक सूत्र में बांधने का एक माध्यम है जिसका लुत्फ उठाते हुए हमें उससे इश्क हो जाता है. '' अफगानी क्रिकेट बोर्ड के आंकड़ों पर नजर डालें तो हम पाएंगे कि पूरा देश दक्षिण एशिया की परछाईं बनकर उभर रहा है, जहां खाली और बंजर मैदान का हर कोना एक पिच है और हर नौजवान के हाथ में घर का बना बल्ला और गेंद.
समूचे देश में गांवों और सुदूर कस्बों की टीमें मैच खेल रही हैं. एक कालीन डाल दिया और पिच तैयार! काबुल और जलालाबाद इनमें सबसे आगे हैं. दोनों ही शहरों में स्टेडियम हैं, जिन्हें कभी तालिबान लोगों को फांसी देने के लिए इस्तेमाल करते थे. जब यहां राष्ट्रीय या अंडर-19 टीम खेलती है, तो भारी भीड़ उमड़ पड़ती है—काबुल में 8,000 तो जलालाबाद में 15,000
कम-से-कम 2000 टीमें राज्य स्तरीय, क्षेत्रीय या राष्ट्रीय टूर्नामेंटों में यहां हिस्सा लेती हैं. क्रिकेट बोर्ड की योजना अगले साल से काबुल में 10 से 15 टीमों का साप्ताहिक टूर्नामेंट आयोजित करने की है. उसे उम्मीद है कि यह प्रतिस्पर्धा राष्ट्रीय शक्ल इख्तियार कर लेगी और दूसरे टूर्नामेंटों के लिए आदर्श साबित होगी. बोर्ड एक प्रीमियर लीग बनाना चाह रहा है, जहां से राष्ट्रीय टीम के लिए प्रतिभाओं को चुना जा सके.
उसके मुताबिक, फिलहाल कई स्कूलों में क्रिकेट एक खेल के रूप में शामिल कर लिया गया है और करीब 20,000 लड़के और 1,000 लड़कियां क्रिकेट खेल रहे हैं. देश के 34 में से 32 सूबों की अपनी टीमें हैं. चयनकर्ता रईस अहमदी के मुताबिक हाल ही में काबुल में अंडर-16 टीम के चयन में 600 लड़कों ने हिस्सा लिया था. फिलहाल सभी कम ओवरों का क्रिकेट खेल रहे हैं. खेल प्रशासन क्रिकेट को राष्ट्रीय एकता का प्रतीक बनाने में जुटा हुआ है. मसलन, उसकी योजना है कि खिलाड़ी अपने नाम में से कुलनाम/जातिनाम हटा दें, जिससे उनकी जातीयता या कबायली पहचान होती है.
सादिक का भाई आफताब अफगानिस्तान की अंडर-19 टीम से खेलता है. वे कहते हैं कि राष्ट्रीय टीम में पख्तूनों का होना स्वाभाविक बात है, ''क्योंकि हम ही जंग के दौरान पाकिस्तान गए और वहां हमने क्रिकेट सीखा, बाकी ईरान चले गए थे जहां क्रिकेट नहीं खेला जाता.'' उन्हें अपनी टीम की दिशा को लेकर कोई शुबहा नहीं है, ''हो सकता है 2020 में अफगानिस्तानी टीम दुनिया में पहले, दूसरे या फिर तीसरे नंबर पर हो.''

