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दवा पेटेंट: खोज का महत्व या जान की कीमत

क्या सुप्रीम कोर्ट नोवार्टिस को कैंसर की महंगी दवा के पेटेंट की मंजूरी देगा? विकासशील देशों की फार्मेसी के तौर पर भारत का भविष्य तय करने में यह फैसला महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा.

अपडेटेड 6 अक्टूबर , 2012

हाल ही में 11 सितंबर को हुई सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट के जज आफताब आलम और रंजना देसाई की खंडपीठ ने स्विस दवा निर्माता नोवार्टिस एजी से पूछा, ‘आप इसे पांच रु. में क्यों नहीं बेचते? हर महीने की खुराक के एक लाख बीस हजार रु. तो बहुत ज्यादा है?’’ मामला कैंसर की महंगी दवा ग्लिवेक का था जिसके पेटेंट के लिए यह कंपनी लंबे समय से कानूनी लड़ाई लड़ रही है. यह सवाल महज एक न्यायिक टिप्पणी भर नहीं था, बल्कि इसने दवा उद्योग में छिड़ी जंग से जुड़े एक बुनियादी सवाल को फिर से उठा दिया है.

भारत सरकार के खिलाफ नोवार्टिस का मुकदमा दवाओं के पेटेंट से जुड़ा है. पिछले छह साल से यह कानूनी लड़ाई जारी है और बार-बार ग्लिवेक को पेटेंट कराने संबंधी कंपनी का आवेदन इस आधार पर खारिज कर दिया गया है कि यह कोई नई दवा नहीं है. इस सिलसिले में पूरी लड़ाई अब एक नई बहस को जन्म दे चुकी है जिसके एक छोर पर किफायती दवाओं पर जनता के अधिकार की बात है तो दूसरी ओर दवा निर्माता कंपनी की ओर से की जाने वाली खोज पर उसके अधिकार का सवाल. इस क्रम में भारत के सात साल पुराने पेटेंट कानूनों पर भी सवाल उठे हैं, खासकर उसकी धारा 3(डी) पर, जो ज्ञात दवाओं के नए रूपों के पेटेंट को वर्जित करती है जब तक कि उस दवा की क्षमता कई गुना बढ़ी हुई न हो. इस धारा की ऐसी व्याख्या को कंपनियां अब चुनौती दे रही हैं.medicin patent

यह बहस ताकतवर बनाम कमजोर के सनातनी संघर्ष का दिलचस्प उदाहरण है: एक ओर खरबों डॉलर वाली ग्लोबल दवा कंपनियां हैं तो दूसरी ओर हमारी घरेलू दवा निर्माता कंपनियां, जो समान प्रभाव वाली जेनेरिक यानी वैसी ही  दवाएं बनाती हैं. पेटेंट मिलने के बाद किसी कंपनी का उस दवा की खरीद-फरोख्त पर एकाधिकार कायम हो जाता है और वह स्थानीय प्रतिस्पर्धियों को समान सस्ती दवाएं बेचने से रोक सकती है. भारत का पेटेंट कानून सभी के लिए किफायती दवाओं तक पहुंच को संरक्षण देता है जिससे बड़ी कंपनियों को अपनी दवाएं बाजार में उतारने में दिक्कत आती है. कई हालिया कानूनी फैसले इस बात की पुष्टि करते हैं: मार्च में भारत ने जर्मन कंपनी बेयर को कहा कि वह उसकी पेटेंटधारी कैंसर दवा नेक्सावर का लाइसेंस भारतीय फर्म नैटको को सौंप दे. इसी तरह मई में कैंसर की दवा एर्लोसिप के मामले में स्विस कंपनी रोश ने पेटेंट उल्लंघन का मुकदमा दायर किया था, फैसला सिप्ला के हक में आया.

दो माह के भीतर ग्लिवेक पर आने वाला फैसला भारत के नए पेटेंट तंत्र की किस्मत को तय करेगा. जीत नोवार्टिस की होती है तो वैश्विक दवा कंपनियों को लाखों नए ग्राहकों का बाजार मिल जाएगा. इंडियन फार्मास्युटिकल अलायंस सेक्रेटरी जनरल डी.जी. शाह कहते हैं, ‘‘इससे घरेलू दवा उद्योग को भविष्य में मंदी का सामना करना पड़ेगा क्योंकि भारत 80 फीसदी विकासशील दुनिया को किफायती दवाएं देता है.’’

जाहिर है, सस्ती दवाओं का मामला अहम है. नोवार्टिस ने 20 साल पहले ग्लिवेक को बाजार में उतारा था, तभी से इसे क्रॉनिक माइलॉयड ल्यूकेमिया की सबसे अच्छी दवा माना जाता है. यह बीमारी का इलाज तो नहीं करती, लेकिन मरीज की उम्र को तीन से दस साल तक बढ़ा देती है. दिक्कत यह है कि नोवार्टिस भारत में इस दवा की 30 गोलियां यानी महीने भर की खुराक 1,20,000 रु. में बेचती है जबकि इसी दवा के जेनेरिक संस्करण 8,000 से 12,000 रु. में उपलब्ध हैं. भारत सरकार के सलाहकार हैदराबाद के फार्मा विशेषज्ञ लंका श्रीनिवास के मुताबिक, भारत के साथ लाभ यह है कि यहां 60 प्रमुख क्षेत्रों से जुड़ी 60,000 सस्ती दवाओं का उत्पादन होता है. वे कहते हैं, ‘‘कच्चे माल से लेकर मुनाफे का मार्जिन, श्रम और भारी मात्रा में उत्पादन, हर चीज की लागत यहां सस्ती है.’’ यहां सालाना होने वाले 12 अरब डॉलर (64,032 करोड़ रु.) के उत्पादन का आधा यूरोपीय संघ से लेकर अफ्रीका, अमेरिका और जापान तक, दुनिया भर में निर्यात होता है. श्रीनिवास के मुताबिक, ‘‘यह अपने आप में हमारी दवाओं की गुणवत्ता का सबूत है.’’

नोवार्टिस मामले की जड़ नवंबर 2001 में हुए विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूएचओ) के इंटेलेक्चुअल प्रोपर्टी ( बौद्धिक संपदा) राइट्स (ट्रिप्स) समझौते से जुड़े हैं जो दोहा की बैठक में किया गया था, हालांकि इसमें सदस्य देशों को रियायत दी गई थी कि वे अपने नागरिकों के स्वास्थ्य के अधिकार का संरक्षण कर सकते हैं. बौद्धिक संपदा पर काम करने वाली दिल्ली स्थित कानूनी फर्म सिंह ऐंड सिंह की वकील प्रतिभा सिंह बताती हैं, ‘‘भारत 2005 तक फार्मा में पेटेंट नहीं देता था, लेकिन डब्ल्यूएचओ का सदस्य होने के नाते उसे अपने पेटेंट कानून को ट्रिप्स समझैते के अनुकूल बनाना पड़ा.’’

भारत ने सदस्य देशों को दी गई रियायत का इस्तेमाल करते हुए अपने 1970 के पेटेंट कानून में संशोधन किया और धारा 3(डी) को शामिल कर लिया. विदेशी दवा कंपनियां इसी धारा को चुनौती दे रही हैं.

सिंह कहती हैं, ‘‘धारा 3(डी) भारत की अपनी विशेषता है. यह ट्रिप्स की बाध्यता को संतुलित करती है और गरीबों की सस्ती दवाओं तक पहुंच को भी संरक्षित करती है. इसी के चलते आज भारत फार्मा पेटेंट कानूनों के मामले में दुनिया में सर्वश्रेष्ठ है.’’ फिलीपींस, अर्जेंटीना, थाइलैंड और चीन तक के पेटेंट कानून में अब ऐसे ही प्रावधानों को शामिल करने के लिए संशोधन किए जा रहे हैं. धारा 3(डी) पर छिड़ी जंग सैद्धांतिक है. मसलन, यदि मॉलिक्यूल पहले से ज्ञात हो, तो उस पर आधारित सिर्फ ‘गुणात्मक खोज (इंक्रीमेंटल इनोवेशन) ’ के लिए पेटेंट नहीं दिया जा सकता. दूसरी कोटि की खोज वे हैं जिनमें ‘इसकी क्षमता में पर्याप्त वृर्द्धि होती है. इन दोनों कोटियों का इस्तेमाल कर बड़ी दवा कंपनियां पेटेंट करवाती रहती हैं और अपनी बनाई महंगी दवाओं पर एकाधिकार कायम किए रहती हैं. इस रणनीति को कारोबारी भाषा में ‘‘एवरग्रीनिंग’’ कहते हैं और धारा 3(डी) इसकी छूट नहीं देती है. यह सालाना 12 खरब डॉलर (6,403,200 करोड़ रु.) के वैश्विक दवा उद्योग के लिए खास है क्योंकि कई महंगी और मशहूर दवाओं की पेटेंट अवधि खत्म होने को आ रही है. इसे ‘पेटेंट क्लिप’ कहते हैं. ग्लिवेक को अमेरिका में मिला पहला पेटेंट जुलाई 2015 में खत्म हो जाएगा. यह ऐसे वक्त है जब अनुसंधान और विकास की लागत आसमान छू रही है, पुरानी कमाई को बनाए रखने के लिए दवा कंपनियों को तत्काल नई दवाओं की जरूरत है और साथ ही जेनेरिक दवाओं का कारोबार भी तेजी से फैल रहा है. ऐसे में ग्लोबल दवा कारोबार को नए प्रोत्साहन की जरूरत आन पड़ी है. ऑर्गेनाइजेशन ऑफ फार्मास्युटिकल प्रोड्यूसर्स ऑफ इंडिया महानिदेशक तपन जे. रे कहते हैं, : ‘‘नई खोज के पहिए को घूमने के लिए बौद्धिक संपदा अधिकार का तेल चाहिए.’’

नोवार्टिस के वकील गोपाल सुब्रमण्यम ने कोर्ट से कहा था, ‘‘इस मुकदमे का लक्ष्य पैसा कमाना नहीं बल्कि प्रतिष्ठा को वापस पाना है.’’ सवाल यह है कि दुनिया के 35 देशों में जब ग्लिवेक को पेटेंट हासिल है, तो भारत में क्यों नहीं? जवाब न्यायमूर्ति आलम ने 11 सितंबर को दिया था, ‘‘ये देश जरा टेढ़ा है.’’

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