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सैटेनिक वर्सेज के लेखक की त्रासदी और रोमांच

सलमान रुश्दी ने मौत के साये में बीतती जिंदगी के किस्से को संस्मरण की शक्ल में रखा है. इसमें उन्होंने  दोस्तों, चाहने वालों और बचाव में खड़े लोगों के बारे में बयान की है सनसनीखेज सच्चाई.

अपडेटेड 30 सितंबर , 2012

करीब दो दशक पहले एक वैलेंटाइन डे की बात है, बीबीसी के एक संवाददाता ने उनके निजी नंबर पर फोन किया और पूछा, ''अभी-अभी आयतुल्लाह खुमैनी ने आपकी मौत का फतवा दिया है, यह सुनकर कैसा लग रहा है?” उनका जवाब था, ''अच्छा नहीं लग रहा.” 1989 का वह मंगलवार जिसकी रुपहली सुबह की फिजाओं में उनके लिए प्यार की कोई सरगोशी नहीं थी और जब दुनिया का एक हिस्सा आजादी का जश्न मना रहा था, उनकी जिंदगी में एक डरावने सपने की मानिंद अपने डैने फैला रहा था—हिचकॉक की फिल्मों के ''उन हत्यारे काले पक्षियों की तरह, जिनके पंखों की फडफ़डाहट बता रही होती है कि बवंडर उठ चुका है.”

सेंट्रल लंदन के ब्लूम्सबरी जिले में बेडफोर्ड स्क्वॉयर में जॉर्जियन बिल्डिंग स्थित विले एजेंसी के ऑफिस, जिसमें वे काम करते हैं, की खिड़कियों पर आज सुबह पक्षियों की कोई काली अपशकुनी परछाई नहीं है. बेसमेंट के इस कमरे में मेरे सामने बैठने वाले सलमान रुश्दी के लिए गर्मी के मौसम की हवा खुशी का बस एक टुकड़ा हाथों में सौंपती है—जिंदा होने का और लिखने का.

बड़ा-सा कॉन्फ्रेंस टेबल रुश्दी की किताबों से भरा है, विभिन्न भाषाओं में अनूदित गत्ते की मोटी जिल्द और सॉफ्ट कवर से सजी किताबें, लेकिन उनके बीच जो किताब गर्व से सिर उठाए दमक रही है, वह है जोसफ ऐंटन की प्रेस में भेजी गई प्रतियां जो उनकी जिंदगी के सबसे स्याह पलों की दास्तां है.

उनका कहना है, ''मैं हमेशा किसी के नाम पर किताब लिखना चाहता था, जैसे डेविड कॉपरफील्ड, रॉबिनसन क्रूसो. मैं खुश हूं कि आखिरकार मैंने वह किताब लिख ही डाली.” एक समय था जब खुद उनके मन में कशमकश थी कि इस बारे में लिखने के सिलसिले में बुनती जा रही अपनी ही कहानी को लिखने में वे सक्षम हो पाएंगे कि नहीं.

कवर पर छपा नाम जोसफ ऐंटन उनकी अपनी ही खोज है. उस समय वे एक ऐसे कहानीकार थे जो जितना सुरक्षित था उतना ही खतरों से घिरा भी; जब जिंदगी जिंदा रहने के लिए एक जगह से दूसरी सुरक्षित जगह भगा रही थी; जब मौत का भय वजूद का एक अंतरंग हिस्सा बन चुका था. उनके सुरक्षा अधिकारी ने उन्हें नाम बदलने की सलाह दी थी, ऐसा नाम जो खास तौर पर एशियाई न हो.

रुश्दी अपने पसंदीदा लेखकों में से किसी का नाम रखना चाहते थे. पर आखिकार जो नाम उभरा वह ब्लादिमीर जॉयस या मारसेल बेकेट का नहीं था; यह जोसेफ कॉनरैड और एंटन चेखव से जन्मा. वे कहते हैं, ''एडवर्ड सईद के साथ हुई एक बातचीत मुझे याद आ रही है जो कॉनरैड के बड़े जानकार हैं. हमने कॉनरैड की लिखी किताब निगर ऑफ  द नारसिसस की एक पंक्ति ''आइ मस्ट लिव अनटिल आइ डाइ, मस्टनॉट आइ?” (जब तक मर नहीं जाता मुझे जीना होगा, क्या मुझे जीना नहीं चाहिए?)

एडवर्ड ने खुद भी ऐसा ही कुछ सोचा होगा जब उन्हें अपने कैंसर के बारे में पता चला था. उन्होंने अपनी जिंदगी भरपूर जी; वे जानते थे कि वे मरने वाले हैं फिर भी लिखते रहे और लेक्चर देने जाते रहे. वह पंक्ति मेरे जीवन के लिए भी प्रेरणा बन गई थी. दूसरी तरफ  विषाद, एकाकीपन और अलग कर दिए जाने के दर्द को शब्दों में बांधने की कला में चेखव का कोई सानी नहीं. मैं कुछ हद तक उनकी थ्री सिस्टर्स  के उस दुख में शामिल हो जाता जो अपने बिछड़े मॉस्कोन से मिलने की आस मन में बसाए जी रही हैं. मैं खुद शून्यों में फंसे जीव के मन की आकुलता को जी रहा था.” इस तरह जोसफ  एंटन का जन्म  हुआ. अपने सुरक्षा दल के लिए वह 'जो’ था और उसे तब तक जीना था जब तक मौत न आए. यही नहीं उसे अपना लेखन कतई छोडऩा नहीं था.Salman Rushdie

जोसफ  एंटन (जोनाथन केप; पेज 636; 799 रु.) अकेला ऐसा संस्मरण है जो तृतीय पुरुष में लिखा गया है. यह एक ऐसे उपन्यासकार की कहानी है जिसके गले में कीमत का एक पट्टा लटकाकर धर्म की सीमाहीन तानाशाही ने निर्वासित कर दिया है. इस संस्मरण में कहानी बुनने और गढऩे की शैली अपनाई गई है. यह इससे अलग किसी और रूप में ढल ही नहीं सकता था क्योंकि संस्मरण लिखने वाला एक ऐसा लेखक है जिसने कहानी की सीमाओं को चुनौती दी है; जिसने परस्पर जुड़ी दुनिया की हवाओं में बौराते दीर्घकाय बगूलों को शब्दों का चोला पहनाया है, जिसमें खुशी है तो दुख भी; जादू है, पागलपन है; और कठोर इतिहास का आवेग के साथ बीमार दर्शन भी.

जोसफ एंटन  का लेखक रुश्दी एक अलग रूप लेकर सामने आया है: सच्ची घटनाओं पर आधारित बेशुमार लोगों की भीड़ भरी एक रोमांचक कहानी जिसमें विचारों और भावनाओं की सशक्त ऊर्जा सांस ले रही है और जो किसी बेहतरीन रूसी उपन्यास की तरह ही व्यापक है और जिसके पन्नों में चिनगारी सुलग रही है. पन्नों में जीवन भर रहा रुश्दी एक लेखक है जो अपनी बहुरूपी भूमिका निभा रहा है, जबकि इसकी पटकथा तैयार करते समय वह एक निर्मम व्यक्ति बन जाता है.

इसलिए हमारे सामने रुश्दी बेटे के रूप में अपने मृत पिता से अंतरंग बातें कर रहा है; एक युवा असफल उपन्यासकार के रूप में सफलता की चाह में संघर्ष कर रहा है; परछाइयों के ऐसे शहर में भटकता लेखक है जहां समय की चाल पथरा गई है और चारों ओर एकाकीपन की चादर फैली हुई है; एक कहानीकार है जो अपने बेटे को दिए गए वचन को निभाने के लिए बरबाद हो गई दुनिया को फिर से आबाद करता है; नाकाम शादी के बिखरे टुकड़ों को सहेजने की कोशिश करता एक नाकाम आशिक है; कहानीकारों की खत्म हो रही प्रजाति का एक जीव जो ताउम्र दोस्तों की रहमदिली और दोस्ती का कर्जदार रहेगा. वे कहते हैं, ''सैटेनिक वर्सेज की इस घटना से पहले आत्मकथा लिखने में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं थी. मेरे लेखक बनने के पीछे की वजह यह थी कि मैं कहानी लिखना चाहता था, न कि अपने बारे में.”

जब उन्होंने अपने बारे में लिखने का फैसला किया तो उन्हें बिल्कुल अंदाजा नहीं था कि कहानी का अंत क्या होगा, ''अगर इसका अंत खराब तरीके से होने वाला है तो मैं लिखने की स्थिति में नहीं. जब तक मैं जान न लूं कि अंतिम पन्नों में क्या होगा, मैं नहीं लिख सकता. लंबे समय तक मुझे समझ में नहीं आया कि अंत क्या होगा—यह कब होगा और क्या अंत सुखद होगा या बहुत बुरा.” फिर भी, उस दौरान साल-दर-साल वे सारी बातों को नोट करते रहे और जब उस नरक से उबरकर बाहर निकले तो वे लिखने के लिए कतई तैयार न थे.Satanic Verses

''मैं दरवाजे को ताला लगा देना चाहता था. मैं उस समय का इंतजार करना चाहता था जब मैं उन घटनाओं के घेरे से खुद को बाहर निकाल सकूं.” जोसफ एंटन कहानी से इतर उपन्यास के रूप में एक बेहतरीन उदाहरण है, ''रुश्दी अपने अंदर के उपन्यासकार को नजरअंदाज नहीं कर सकते थे.” तृतीय पुरुष में कही गई इस कहानी में मुझे खुद को देखने की छूट मिली. सभी पात्र जिसमें मैं भी शामिल हूं, एक ही स्तर पर मौजूद हैं सिर्फ 'मैं मुझे दूसरों से अलग करता है.”

रुश्दी के जीवन की अबूझ् परतें जो शायद कोई नहीं समझ सकता, जोसफ एंटन का एक किरदार हमारे सामने खोलकर रखता है. कहानी विधा के जन्म से पहले के समय में यह कहानी परवान चढ़ती है. वे लिखते हैं, ''समय की मंजूषा में बंद संदेश की तरह दिए गए अपने पिता के पहले तोहफे को, जो परिवार का नाम है, वह तब तक नहीं समझ पाता है जब तक वह जवान नहीं हो जाता.” रुश्दी नाम उनके पिता अनीस ने खोजा था, जिनका वास्तविक नाम ख्वाज़ा मुहम्मद दीन ख़ालिकी देहलवी था. ''पुरानी दिल्ली का एक अच्छा नाम.”

अनीस ने इब्न रुश्द जो बारहवीं सदी के स्पेनी-अरब दार्शनिक थे, जिन्हें पश्चिमी दुनिया में एवरोज के नाम से जाना जाता है, से यह नाम लिया. वे लिखते हैं,  ''अपने अब्बा के दिए नाम को रखने के दो दशक बाद उन्हें  समझ में आया कि इस्लाम के प्रकांड विद्वान उनके वालिद, जो धार्मिक मान्यताओं को बिलकुल नहीं मानते थे, ने यह नाम इसलिए चुना, क्योंकि वे इब्न रुश्द का बहुत सम्मान करते थे. इब्न रुश्द अपने जमाने में इस्लामी कट्टरवाद से टकराते बुद्धिवादी विचारों की बहस की अगुआई कर रहे थे; 20 साल और बीत गए और फिर एक दिन सैटेनिक वर्सेज पर छिड़ी लड़ाई ने 800 साल पुराने उस बहस-मुबाहिसे को बीसवीं सदी में वापस ला खड़ा कर दिया.”

लेखक आगे लिखता है, ''तूफान से घिरने के बाद उन्होंने खुद से कहा, 'मैं’ कम-से-कम सही नाम के साथ लडऩे जा रहा हूं अलविदा कहने से पहले उनके वालिद ने उनके हाथों में वह ध्वज थमा दिया था जिसके नीचे वे अपनी लड़ाई लडऩे के लिए तैयार थे. इब्न रुश्द के नाम का ध्वज जो बुद्धि, दलील, विश्लेषण और तरक्की के लिए खड़ा हुआ था, जो चिंतन और धर्मतंत्र की बेडिय़ों में बंधे ज्ञान से आजादी चाहता था, जो इंसानी विवेक का पक्षधर था और अंधी मान्यताओं, गुलामी, अवरुद्ध होती राहों और सब मान लेने की प्रवृति का विरोध करता था.”

जोसफ एंटन का सबसे स्नेहिल और साहित्यिक हिस्सा वह है जहां वालिद और बेटे के 'ऊबड़-खाबड़ रास्ते में तय किए सफर’ का जिक्र है. वे एक जैसे दिखते हैं और उनकी आवाज भी एक जैसी है. इसके अलावा वे दोनों समान रूप से कुछ बातों को 'अमान्य’ ठहराते हैं. यही इस उपन्यास की शुरुआत है जिसे ब्रैडफोर्ड से कराची तक की गलियों में नफरत की आग में जलाया गया, पर उसे पढऩे के लिए किसी के हाथ नहीं बढ़े. बाद में, कैम्ब्रिज में बहुत कम छात्र इस्लाम पढऩे में दिलचस्पी रखते थे. ''वे अपने वालिद के बेटे थे, उनका खुदा में यकीन तो नहीं था, लेकिन खुदा और पैगंबरों के बारे में जानने की उत्सुकता काफी थी.”

इतिहास के उनके पसंदीदा विषयों में 'मुहम्मद और इस्लाम का उत्थान’ शामिल था. यहीं उन्हें मूल सैटेनिक वर्सेज मिली थी. रुश्दी ने लिखा है, ''जब उन्होंने इसे पढ़ा तो उनके मन ने कहा, ''अच्छी कहानी’ है. उस समय वे लेखक बनने के सपने बुना करते थे और किसी अच्छी कहानी को पढऩे के बाद उसे अपने मन के अंदर बसा लेते थे कि बाद में उस पर विचार करेंगे. 20 साल बाद उन्हें महसूस हुआ कि वह कहानी वाकई कितनी बेहतरीन थी.”

मैंने पूछा ''क्या इस्लाम अब भी आपको आकर्षित करता है?” उन्होंने कहा, ''यह उन कारणों में से एक है जिसने मुझे यह किताब लिखने की प्रेरणा दी. मेरी कहानी 1989 के बाद घटी उस बड़ी कहानी का एक छोटा हिस्सा बन गई है. हां, अब भी मेरी दिलचस्पी इस्लाम की राजनैतिक अभिव्यक्ति में बनी हुई है...यह हर दिन की खबर है. जब मैंने सैटेनिक वर्सेज  लिखी, मेरी दिलचस्पी धर्म तक ही सीमित थी—इसका इतिहास, इसका जन्म वगैरह. मेरा मानना है कि कुछ है जो इस्लाम के साथ सही नहीं बैठ रहा. एक कठोर भाव वाले इस्लाम का रूप तेजी से उभरता जा रहा है. भारत में भी अरबी इस्लाम जोर पकड़ रहा है जो और भी कठोर है. सूफी इस्लाम कोमल है जो भारत में पहले ज्यादा फैला हुआ था.”

''राजनैतिक तौर पर आप उदारवादी पक्ष की ओर बैठे हैं, क्या यह माना जाए कि आप उन लोगों में से हैं जो तथाकथित इस्लामी फासीवाद के सिद्धांत को नहीं मानते?” ''आप करोड़ों लोगों के बारे में यह नहीं कह सकते कि वे बुरे हैं. इतने लोगों को दोषी नहीं ठहराया जा सकता. ऐसा करना नासमझी है.” फिर भी, उनके विचार से ''मुसलमानों के लिए यह चिंता का सबब है कि पूरी दुनिया में इस्लाम के नाम पर उनके साथ क्या किया जा रहा है.” ''इस्लाम ने कहीं भी एक खुले विचारों वाला समाज नहीं तैयार किया है, जबकि इस तरह की मांगों को लेकर इसके अंदर आंदोलन भी हुए हैं जैसा कि हमने अरब स्पिंग (विद्रोह) में देखा.”

''क्या आपको नहीं लगता कि सियासी इस्लाम की कहानी आपकी अपनी कहानी के बगैर नहीं सुनाई जा सकती, शायद साम्यवाद की तरह जो सोल्जेनित्सिन के निर्वासन के बगैर नहीं कही जा सकती.” ''मैं खुद को उस तरह से नहीं देखता. मैंने इस्लाम को अपना विषय नहीं माना था. यह बस हो गया. मैं इससे अलग हो रहा हूं. मेरी इसमें कोई दिलचस्पी नहीं.”

उनके जीवन में ऐसे पल भी आए थे जब उन्हें कहा गया था कि वे एक अच्छा मुसलमान बनकर अपनी जान बचा सकते हैं. वे असहाय थे और बहुत दबाव में थे. मुस्लिम नेताओं के एक दल ने उनके और तेहरान के बीच मध्यस्थता करने का सुझव दिया और उन्हें शैतानी फंदे से बचाने के बदले अपने मत को छोडऩे की पेशकश की. रुश्दी मानते हैं, ''वह मेरी सबसे बड़ी भूल थी. जैसे ही मैंने उस दस्तावेज पर दस्तख्त किए, मैं खुद को वास्तव में बीमार महसूस करने लगा. मुझे लगा कि मैंने खुद को धोखा दिया है. ऐसा लग रहा था मानो अंदर से सब खाली हो गया हो.”

आज वे पहले से ज्यादा समझदार हो गए हैं. ''भविष्य में मैं ऐसी किसी बात पर समझौता नहीं करूंगा जिस पर समझौता नहीं करना चाहिए.” फिर भी, अजीब बात है कि ''मेरे जीवन का सबसे उलझन भरा पल होने के बावजूद वह मेरे लिए फायदेमंद साबित हुआ.” क्योंकि ''उस अनुभव ने ही मेरे अंदर लडऩे की ताकत को जन्म दिया.”

जोसफ एंटन मौत की दुनिया से लड़कर वापस लौटने की कहानी है. संघर्ष सिर्फ बिना दीवारों वाली कैद से निकलने तक ही सीमित नहीं था. एक लड़ाई वहां भी जारी थी जहां निजी जीवन में भावनात्मनक संतुलन कायम रखना था; अपने प्रकाशकों को लेकर मन में बैठी बेवजह घबराहट (उनमें से एक सोनी मेहता ने हारून ऐंड द सी ऑफ स्टोरीज को यह कहकर प्रकाशित करने से इनकार कर दिया था कि यह सैटेनिक वर्सेज  से भी ज्यादा विस्फोटक है) को संभालना था और और इन सबके ऊपर मन में उथल-पुथल मचाती कल्पनाओं की लहरों पर मचलते शब्दों पर लगाम भी कसनी थी. ऐसे में दोस्तों से राहत मिलती.

उन्होंने न सिर्फ इस निर्वासित कॉमरेड के लिए गांवों के अपने मकानों के दरवाजे खोल दिए, बल्कि अपने दिल में भी उन्हें बसा लिया. उनके नाम हैं मार्टिन एमिस (जिनकी कही पंक्ति काफी चर्चित हुई थी कि उनका दोस्त मुखपृष्ठ में खो गया है) इयान मैक्वान, हनीफ कुरैशी, ग्राहम स्विफ्ट, क्रिस्टोफर हिचेन्स और वाक्लाव हैवेल.

वे कहते हैं, ''कई किताबें दोस्ती के बारे में हैं, अपनी हद से बाहर जाकर उन्होंने मेरी मदद की है और मेरा खयाल रखा है. पुलिस भी दोस्तों पर विश्वास करने लगी थी. पुलिस की स्पेशल सेल और लंदन के साहित्य जगत ने भी मेरी ओर दोस्ती का हाथ बढ़ा दिया था.” सुरक्षा अधिकारी के साथ भी उनके रिश्ते काफी अच्छे बन गए थे और कम-से-कम 100 सुरक्षा अधिकारियों से उनकी मुलाकात हुई थी. वे कहते हैं, ''आज जब मंच पर नेताओं को देखता हूं तो वहां पीछे खड़े सुरक्षा अधिकारियों को पहचान जाता हूं” एक बार वे अपने बेटे जफर के साथ टीवी पर नेल्सन मंडेला को देख रहे थे जो दौरे पर आए हुए थे कि अचानक जफर ने चिल्ला कर कहा, ''वह देखो मोटा जैक.'' “वह उन सुरक्षा अधिकारियों में से एक था, जिसने हमारा खयाल रखा था.”

संस्मरण के रूप में यह किताब सच को पेश करने की कसौटी है और सच किसी के लिए कड़वा भी हो सकता है. उनकी चारों पूर्व पत्नियों को उनकी कहानी में जगह मिली है, पर हर जगह अच्छी बातें ही कही गईं हों, जरूरी नहीं. अपनी दूसरी पत्नी मैरीएन विगिंस के साथ उनका रिश्ता काफी मुश्किल भरा रहा. वे एक अमेरिकी उपन्यासकार थीं जो बहुत उग्र स्वभाव की महिला थीं. अपनी चौथी पत्नी पद्मा लक्ष्मी के बारे में वे लिखते हैं: ''(वैनिटी फेयर के रात्रिभोज में), चीखते-चिल्लाते एक-दूसरे पर खड़े फोटोग्राफरों के सामने यौवन और सौंदर्य की दीपशिखा को विभिन्न भाव-भंगिमाएं बनाते हुए वह देख रहे थे.

उन्होंने उसके चेहरे के भाव को देखा और अचानक उन्हें खयाल आया कि वह शरीर से शरीर के संबध को जी रही है, वहां खड़े सैकड़ों पुरुषों के साथ एक ही समय में देह का यह संबध जिया जा रहा है और उन सबको उसे छूने तक की छूट नहीं. ऐसा संभव नहीं कि एक वास्तविक पुरुष वैसी स्थिति के साथ मुकाबला कर सके. अंत में वह उसे खो देता है...”

रुश्दी उपन्यास के नजरिए से लिख रहे हैं और उन्हें वह सब वैसे ही सबके सामने उसी तरह से रखना था. इसमें वे दृश्य भी शामिल हैं, जिसमें वे अपने पिता को धक्का देते हैं. वे कहते हैं, ''कोई भी पूर्ण नहीं.” न सिर्फ  पत्नियां, बल्कि आशिक और पीछा करने वाले शोहदों ने भी खूब नाटक रचा है.

दिल्ली की एक औरत हवाईजहाज में उड़कर लंदन पहुंचती है और अपने प्यार से मिलने के एवज में एजेंट से शारीरिक संबंध बनाने का वादा भी कर देती है. संस्मरण के रूप में गढ़े इस उपन्यास में वे छोटे-प्यादे हैं, लेकिन कहानी के लिए कितने अहम हैं, यह उस समय महसूस होता है जब किताब के आखिरी पन्ने को हम पलटते हैं, तब उनकी हरकतों को इतिहास की विषादग्रस्त गलियों में जोसफ एंटन की उन सारी कारगुजारियों से भी बड़ा पाते हैं. रुश्दी कहते हैं, ''मेरे साथ जो हुआ, उस अनुभव के जरिए मैं बताना चाहता था कि दुनिया में क्या हो रहा है.”

जोसफ को एक सुकून भरी जिंदगी जीते देखकर और एंटन को उसका घर वापस मिलने की खुशी उनसे संभाले नहीं संभल रही. हमारी बातचीत के एक दिन बाद साउथ किंग्स्टन क्लब में लंदन का साहित्य जगत आजादी के संस्मरण को लिखने वाले लेखक का इस्तकबाल करने के लिए एक बड़ा जश्न मनाने जा रहा है और इसकी तैयारी की है जफर की इवेन्ट मैनेजमेंट कंपनी ने. उस रात वे एक ऐसी कहानी होंगे जिसे सब सुनने के लिए बेताब होंगे और ब्रॉम्प्टन रोड के आकाश को हिचकॉक की कहानियों से निकलकर आए काले परिंदे मटमैला नहीं कर पाएंगे. वे सब दूर असीम आसमान की गहराइयों में गुम हो चुके हैं.

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