पहली नजर में सर लेसेक बोरीसेविच एक सामान्य शिक्षक दिखते हैं. लंबे-तगड़े बोरीसेविच हल्की मुस्कान और गर्मजोशी के साथ हाथ मिलाते हुए अपने यहां आने वालों का स्वागत करते हैं. उन्हें लहराते हुए वस्त्र पहने लैटिन भाषा में बातचीत करते हुए सोचना जरा मुश्किल है हालांकि ब्रिटेन के 800 साल पुराने कैंब्रिज विश्वविद्यालय के कुलपति की हैसियत से यह उनके कामकाज का हिस्सा है.
इसके बावजूद 345वें कुलपति चिकित्सा के क्षेत्र में दुनिया के जाने-माने शोधकर्ता हैं, जिन्होंने सर्वाइकल कैंसर के टीके की खोज में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. इसी वजह से वे आधुनिक विज्ञान के क्षेत्र में भारत के साथ कैंब्रिज के सहयोग बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं. उनका कहना है, ''भारत के छात्रों का कैंब्रिज में बहुत आना-जाना है. अब हम विचारों के प्रवाह, नेटवर्क स्थापित करने और शैक्षिक प्रभाव फैलाने के बारे में सोच रहे हैं.”
इसका मतलब है भारत और कैंब्रिज के बीच 250 सक्रिय रिसर्च प्रोजेक्टों में भागीदारी. अब जरा बंगलुरू स्थित इंस्टीट्यूट फॉर स्टेम सेल बायोलॉजी ऐंड रिजेनरेटिव मेडिसिन (इनस्टेम) में केमिकल बायोलॉजी और मॉलीक्यूलर चिकित्साशास्त्र के क्षेत्र में नई पहल पर गौर कीजिए. इस प्रोजेक्ट को भारत सरकार के बायोटेक्नॉलॉजी विभाग (डीबीटी) से फंड मिलेगा और इसके तहत शोधकर्ता उन कोशिकीय अनियमितताओं का पता लगाएंगे, जिससे कैंसर होते हैं और उनकी रोकथाम के लिए इलाज तलाश करेंगे.
डीबीटी ने इसके लिए 96 करोड़ रु. मंजूर किए हैं. यह टीम वर्क होगा, जिसमें जेनेटिक्स, केमिस्ट्री, सेल बायोलॉजी, बायोकेमिस्ट्री और इमेजिंग के जरिए अनियमितताएं मालूम की जाएंगी और उनका इलाज ढूंढा जाएगा. इस मल्टीडिसिप्लिनरी माहौल में युवा शोधकर्ताओं और चिकित्सकों को उपचार संबंधी बुनियादी शोध के लिए प्रशिक्षित किया जाएगा.
2001 में नाइट की उपाधि पाने वाले इस इम्युनोलॉजिस्ट (रोगरोधी क्षमता विशेषज्ञ) का कहना है, ''यह हकीकत का पता लगाने का अवसर है.” खाद्य सुरक्षा, पानी, ऊर्जा, दवा की खोज, स्वास्थ की देखरेख और लाइफ साइंस भागीदारी के मुख्य क्षेत्र हैं. उनका कहना है, ''कैंब्रिज इन क्षेत्रों में काफी मजबूत है और हम भारत में ऐसे संस्थानों की तलाश कर रहे हैं जिनमें इसकी पूरक क्षमता हो. हम दोनों को साथ रखना चाहते हैं.” लेकिन ऐसा सिर्फ साइंस और टेक्नॉलोजी के क्षेत्र में ही नहीं किया जाएगा.
वे बताते हैं कि भविष्य के वैज्ञानिकों को सिर्फ नई तकनीक के बारे में बताने पर ही निर्भर नहीं रह सकते. उन्हें उस दिशा में काम करना होगा जहां लोग टेक्नॉलॉजी की कद्र कर सकें. यह उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती है. वे कहते हैं, ''और इसके लिए हमें समाज को समझ्ने की जरूरत है और यहीं ह्यूमेनिटीज (मानविकी) की अहमियत नजर आती है.”
इसमें कोई हैरत की बात नहीं है कि बोरीसेविच के तहत कैंब्रिज में शोध पर बहुत ज्यादा जोर है. उनका कहना है, ''मेरा जेहन एक चीज के बारे में हमेशा साफ था कि मुझे रिसर्च में जाना है.” यह प्रेरणा उन्हें उनके माता-पिता से नहीं मिली जो पोलैंड के आप्रवासी थे और दूसरे विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटेन में जा बसे थे.
पांच साल की उम्र तक बोरीसेविच अंग्रेजी नहीं बोल पाते थे. लेकिन उनमें शोध की लगन उस समय जग उठी जब उन्होंने कार्डिफ के वेल्श नेशनल स्कूल ऑफ मेडिसिन में प्रवेश लिया. उन्होंने कहा, ''मेडिकल स्कूल में पहले कुछ वर्षों ने मुझे यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि कितनी चीजें अंजानी हैं और कितनी चीज जानने की जरूरत है.”
लेकिन उतार-चढ़ाव वाले करियर में उन्होंने अस्पताल और लैब दोनों में अपना समय बिताया. उनका कहना है, ''व्यक्तिगत तौर पर मरीजों का इलाज करने से ज्यादा संतोषजनक कोई अन्य काम नहीं है. लेकिन आप महसूस करते हैं कि काश आप थोड़ा और जानते तो आप बहुत कुछ कर सकते थे.”
उनके अनुसार ज्यादा लोगों की मदद करने के लिए शोध दीर्घकालिक निवेश है. उन्होंने यूरोप से लेकर अफ्रीका के विभिन्न देशों का दौरा किया है, और वायरल इम्युनोलॉजी से लेकर संक्रामक बीमारियों, कोशिका की इम्युनिटी, वायरस से जुड़ी बीमारियों और टीका तैयार करने जैसे विविध क्षेत्रों में काम किया है.
उनका कहना है, ''मेरी दिलचस्पी इंसान को प्रभावित करने वाले जिद्दी वायरसों में है, जिसमें से 20 हम अपने शरीर में लेकर चलते हैं और किसी प्रकार उनके साथ संतुलन बरकरार रखते हैं.”
उन्होंने अपना ध्यान ह्यूमन पैपिलोमा वायरस (एचपीवी) पर केंद्रित किया: इम्युन सिस्टम या रोग प्रतिरोधी क्षमता किस तरह सर्वाइकल कैंसर पैदा करने वाले वायरसों से बचाव करती है. वे बताते हैं, ''एचपीवी बहुत व्यापक इंफेक्शन है और हर प्रकार के सर्वाइकल कैंसर के पीछे 99 फीसदी यही होता है.” उनका यह भी कहना है कि ''यह बहुत धीरे-धीरे फैलता है और यह आपको अगर कम उम्र में हो जाए तो यह खुद-बखुद खत्म भी हो जाता है.”
कार्डिफ में वे जिस समूह का नेतृत्व कर रहे थे, उसने इस बात का पता लगाना शुरू किया कि एचपीवी के खुद ही खत्म होने की क्या वजह होती है. इसके लिए टीका बनाने के विचार को इस बात से बढ़ावा मिला कि सर्वाइकल कैंसर से बचा जा सकता है और यह कि खासकर विकासशील देशों में काफी महिलाओं के लिए यह बड़ी समस्या है.
2001 के बाद जब से बोरीसेविच लंदन के इम्पीरियल कॉलेज के मेडिकल स्कूल के अध्यक्ष बने तब से उन पर प्रशासनिक जिम्मेदारियां बढ़ गईं. उन्होंने यह महसूस किया कि उच्च शिक्षा और विज्ञान में बढ़ती व्यस्तता और कॉलेज की शैक्षिक और वैज्ञानिक जिम्मेदारियां इस कदर हैं कि वे रोजमर्रा की चिकित्सा की छोटी-मोटी देखभाल के साथ इंसाफ नहीं कर पाएंगे.
वे बताते हैं, ''मेरा फोकस बदलकर दूसरे लोगों को अपना लक्ष्य हासिल करने में मदद करना हो गया और मेरा काम दो सवालों तक सीमित हो गया: क्या मैं प्रोत्साहित कर सकता हूं और क्या मैं सहायता कर सकता हूं यही भूमिका वे कैंब्रिज विश्वविद्यालय के कुलपति के तौर पर अक्तूबर, 2010 से निभा रहे हैं. और यह वह काम है जिसमें उन्हें सबसे ज्यादा मजा आता है.
क्या वे भारत और कैंब्रिज के बीच कोई नया अध्याय शुरू करेंगे? इस यूनिवर्सिटी का भारतीय छात्रों से पुराना और आत्मीय रिश्ता रहा है जिनमें भारत के तीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, राजीव गांधी और मनमोहन सिंह शामिल हैं. 19वीं सदी के मध्य से जब भारत से एक छात्र कैंब्रिज पढऩे गया था तब से लेकर अब उनकी संख्या 240 पहुंच गई.
उन्होंने इस बात की ओर इशारा करते हुए कहा, ''ये लोग हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं और हमारे समुदाय के बेहतरीन सदस्य हैं. लेकिन अब समय आ गया है कि भारत-कैंब्रिज संबंध को अगले स्तर तक ले जाया जाए.” बोरीसेविच कहते हैं, ''हम सब एक दूसरे से बहुत कुछ सीख सकते हैं क्योंकि हम सब विभिन्न प्रकार से समाधान ढूंढते हैं.”

