जब दिल जोश और जज्बे से लबरेज हो और मन में कुछ कर गुजरने की ख्वाहिश हो तो बड़ी-से-बड़ी बाधाएं भी इनसान को आगे बढऩे से नहीं रोक सकतीं. कुछ ऐसी ही बातें लागू होती हैं बनारस के खानपुर के रहने वाले बेसबॉल के 23 वर्षीय खिलाड़ी दिनेश पटेल पर. एक साधारण से किसान परिवार में 8 मई, 1989 को जन्मे दिनेश पटेल, जिनके पिता घनश्याम पटेल के पास दो बिस्वा जमीन भी नहीं है, का मन बचपन से ही खेल की दुनिया में नाम कमाने का था. दिनेश के माता-पिता इतने गरीब थे कि उनके पास उन्हें ठीक ढंग से पालने-पोसने के लिए भी पैसे नहीं थे. इसलिए उन्हें उनकी नानी के पास खानपुर भेज दिया गया. दिनेश के मन में वहीं से खेल के प्रति रुझान पैदा हुआ.
जैसा कि पटेल कहते हैं, “मेरा झुकाव बचपन से ही खेलों की तरफ था. मैं एक अच्छा खिलाड़ी बनकर देश दुनिया में अपने माता-पिता का नाम रोशन करना चाहता था. इसलिए मैंने बहुत पहले से ही प्रैक्टिस शुरू कर दी थी. हालांकि उस समय मैं ऊहापोह की स्थिति में था कि किस खेल में हाथ आजमाना चाहिए.”
दिनेश की इस ऊहापोह को कुछ हद तक कम करने का काम किया उन्हीं के गांव के अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नाम कमा चुके धावक संतोष पटेल ने. संतोष के सुझाव पर दिनेश ने भाला थ्रो और बेसबॉल की तैयारी करनी शुरू कर दी.
दिनेश को एक रास्ता तो मिल गया था, लेकिन मंजिल अब भी बहुत दूर थी और यह रास्ता बिलकुल भी आसान नहीं था. बिना किसी साधन और सुविधाओं के दिनेश दिन-रात मेहनत करते थे. उनके इस परिश्रम की गवाह हैं उनकी नानी और गांव के लोग. उन्होंने एकदम सुबह उठकर और देर रात तक दिनेश को खेल का अभ्यास करते देखा है. तब कोई इस बात की कल्पना भी नहीं कर सकता था कि एक छोटे से गांव में गरीब परिवार में पला-बढ़ा यह मामूली-सा लड़का एक दिन सफलता की ऐसी कहानी लिखेगा.
हालांकि गांव में रहकर खेलों की तैयारी करने वाले खिलाडिय़ों के सामने आर्थिक समस्या एक बहुत बड़ी बाधा बनती है और दिनेश भी इससे अछूते नहीं रहे. बकौल दिनेश, “जब भी किसी खेल प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए जाना पड़ता तो हमेशा पैसों के बारे में सोचता था. मेरी जेब में बिलकुल पैसे नहीं होते थे. परिवार के पास भी इतने संसाधन नहीं थे कि वे मेरी मदद कर पाते. इसके अलावा जब भी किट वगैरह लेने की जरूरत पड़ती तो मुसीबत खड़ी हो जाती थी.”
दिनेश की समस्याओं का काफी हद तक समाधान 2004 में तब हुआ जब उनका चयन स्पोटर्स कॉलेज लखनऊ (गुरु गोविंद सिंह स्पोर्ट्स कॉलेज) में हो गया. दिनेश कहते हैं, “शुरू-शुरू में मैं इस बात को लेकर परेशान था कि किस तरह से अपना नाम स्पोर्ट्स कॉलेज में लिखवाऊं. वहां एडमिशन मिलना भी आसान नहीं था, लेकिन मुझे लगता था कि एक बार प्रवेश मिल गया तो आगे का रास्ता जरूर आसान हो जाएगा.”
दिनेश की किस्मत के दरवाजे 2007 में तब खुले जब फ्लोरिडा, अमेरिका की सेवेन फिगर नामक कंपनी ट्रायल के लिए भारत आई. लखनऊ और दिल्ली में हुए ट्रायल में दिनेश प्रथम रहे, लेकिन मुंबई में हुए फाइनल में दिनेश ने द्वितीय स्थान प्राप्त किया. प्रथम स्थान प्राप्त करने वाले रिंकू के साथ प्रतियोगिता में बेहतर करने वाले और आयोजकों को अपने क्षमता-प्रदर्शन से आकर्षित करने वाले दिनेश का भी चयन कर लिया गया.
उत्साही स्वर में दिनेश कहते हैं, “गेंद को बाउंड्री पार करने के मामले में मैं नंबर वन था लेकिन आयोजकों द्वारा तैयार पैमाने के अनुसार मैं राइट जगह पर गेंद नहीं मार सका. मेरी बजाए रिंकू को कम दूरी पर ही गेंद फेंकने के बावजूद सही जगह पर बॉल मारने पर प्रथम चुन लिया गया. लेकिन मेरे अच्छे प्रदर्शन के कारण आयोजकों ने रिंकू के साथ मेरा भी चयन कर लिया.
दिनेश और उसके परिवारवालों के लिए यह बहुत बड़ी उपलब्धि थी. उनके गांव और परिवार से तो क्या, पूरे देश से अमेरिका के इतने बड़े स्पोर्ट्स क्लब के साथ कॉन्ट्रैक्ट करने वाला वह पहला व्यक्ति था. अमेरिका जाने के तीन-चार महीने के अंदर ही दिनेश का कांट्रैक्ट वहां के प्रसिद्ध बेसबॉल क्लब पिट्सबर्ग पायरेट्स के लिए हो गया. फिर क्या था दिनेश का नाम अमेरिकी बेसबॉल की दुनिया में छा गया. इस बाबत दिनेश कहते हैं, “दो साल के लिए हुए इस कांट्रैक्ट के बाद मैंने जाना कि बेसबॉल सचमुच क्या चीज है. इस खेल से जुड़े जितने भी उपकरण और तैयारी के लिए जितनी सारी सुविधाएं मैंने वहां देखीं अपनी पूरी लाइफ में नहीं देखी थीं.”
दिनेश भारत और अमेरिका के शीर्ष खेलों और उस पर मिलने वाली सुविधाओं के अंतर के बारे में कहते हैं, “अमेरिका में जितनी सुविधाएं इस दौरान मिलीं उतनी सुविधा शायद मैं समझता हूं यहां क्रिकेट वगैरह जैसे खेलों में भी खिलाडिय़ों को नहीं मिलती हैं, जो यहां का प्रमुख खेल है. अगर मैं कहूं तो यहां के राष्ट्रपति को ही उतनी सुविधाएं मिलती होंगी जितनी वहां के खिलाडिय़ों को मिलती हैं. वहां पर हर महीने 60-70 हजार रु. मिलते थे. इसके अलावा खाने-पीने, रहने, आने-जाने के लिए अलग से पैसा मिलता था.”
अमेरिकी बेसबॉल क्लब से दो साल के कांट्रैक्ट के खात्मे के बाद गांव वापस आए और फिर उन्हें दो महीने के लिए उसी अमेरिकी क्लब की तरफ से चीन भेजा गया. दो माह के लिए 20 अप्रैल, 2012 को दिनेश को चीन के एमएलबी सेंटर भेजा गया. दिनेश के अनुसार वहां पर जाकर लोगों को इस खेल से रू-ब-रू कराने की जिम्मेदारी उन्हें मिली थी. चीन की यात्रा से दो हफ्ते पहले लौटे दिनेश नेशनल गेम की तैयारी में जुट गए हैं जो अगले 10 महीने बाद होने हैं.
दिनेश पटेल इस बात को लेकर दुखी हैं कि भारत में खेले जाने वाले खेलों के साथ सरकार दोहरी नीति अपनाती है. उनका मानना है कि सरकार सभी खेलों को समान महत्व देने के बजाए उनके साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार करती है. पटेल के ही शब्दों में, “कुछ खेलों के लिए ही सरकार के पास पैसे और योजनाएं हैं. जबकि जरूरत इस बात की है कि सरकार को सभी खेलों को बढ़ावा देने के लिए योजनाएं बनानी चाहिए.”
उनकी नानी कलावती को आज अपने नाती पर बहुत फख्र महसूस होता है, लेकिन एक समय था जब वह हर समय खेल में डूबे दिनेश को देख गुस्सा होती थीं. इस दौरान जब उन्हें रात को घर आने में देर होती तो नानी की डांट खानी पड़ती. उनकी नानी को शायद इस बात का डर रहता था कि कहीं उनका लाडला गलत राह पर तो नहीं जा रहा है. वे कहती हैं, “जब दिनेश रात को लेट आता तो काफी गुस्सा आता था और खूब डांटती थी. लेकिन आज मुझे दिनेश पर गर्व है.”
दिनेश में काबिलियत और कुव्वत है, मगर जरूरत इस बात की है कि हमारी सरकारों की इनायत ऐसे खिलाडिय़ों पर हो जो कीचड़ में कमल के फूल के समान हैं.

