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देश का मिजाज सर्वेक्षणः बागडोर पर सधी पकड़ 

कोविड-19 और लॉकडाउन ने अर्थव्यवस्था पर गहरे और स्थायी निशान छोड़े हैं, लेकिन देश का मिज़ाज सर्वेक्षण में लोगों ने सरकार पर भरोसा और यकीन जताया कि वह मौजूदा संकट से निजात दिलाकर फिर गाड़ी पटरी पर ले आएगी.

त्योहारी बिक्री पिछले साल दीवाली पर दिल्ली के लक्ष्मीनगर मार्केट का नजारा
त्योहारी बिक्री पिछले साल दीवाली पर दिल्ली के लक्ष्मीनगर मार्केट का नजारा
अपडेटेड 28 जनवरी , 2021

इतिहास में 2020 महामारी और अभूतपूर्व आर्थिक संकट के वर्ष के रूप में दर्ज होगा. दुनिया में सबसे सख्त और लंबे लॉकडाउन के नतीजतन देश की अर्थव्यवस्था लगातार नकारात्मक वृद्धि के साथ चार दशकों में पहली बार मंदी के गर्त में पहुंच गई. उत्पादन ठहर गया, सेवा क्षेत्र बैठ गया, प्रवासी मजदूर शहरों को छोड़ गए, कुटीर और छोटे उद्यमों ने वजूद बचाए रखने के लिए सरकार से मदद की गुहार लगाई. 

लेकिन कोविड-19 से ग्रस्त साल जैसे पूरा हुआ अर्थव्यवस्था सामान्य स्थिति में लौटने लगी है. एसऐंडपी ग्लोबल रेटिंग्स ने वित्त वर्ष 2021 में भारत की वृद्घि दर के अपने अनुमान में संशोधन किया और अब वह शून्य से 7.7 प्रतिशत नीचे बता रही है, जो दूसरी तिमाही में 'अनुमान से अधिक तेज’ वृद्घि की गवाही देता है.

लॉकडाउन की वजह से आर्थिक तबाही और बेरोजगारी के बावजूद आम धारणा यह है कि सरकार ने महामारी के दौरान अर्थव्यवस्था को अच्छी तरह से संभाला. शायद यही वजह है कि जनवरी 2021 में इंडिया टुडे देश का मिज़ाज जनमत सर्वेक्षण में 87 प्रतिशत लोगों ने सरकारी पहल पर संतोष जताया. सर्वेक्षण में मोदी सरकार के कामकाज को 24 प्रतिशत लोगों ने बेहतरीन, 46 प्रतिशत ने अच्छा और 21 प्रतिशत ने औसत बताया है. 

क्या रहेगा अर्थव्यवस्था का हाल?
क्या रहेगा अर्थव्यवस्था का हाल?

हालांकि अगस्त 2020 के देश का मिज़ाज सर्वेक्षण में 93 प्रतिशत से यह घटा तो है, लेकिन दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में सबसे छोटे प्रोत्साहन पैकेज के बावजूद सरकार की कोशिशों को सकारात्मक माना जा रहा है. अर्थशास्त्री और उद्योग जगत घटती मांग में इजाफे के लिए बड़े प्रोत्साहन पैकेज की मांग कर रहे हैं, लेकिन सरकार का फोकस छोटी इकाइयों और हाशिए के लोगों पर है.

अर्थव्यवस्था बहाली
मई में सरकार ने 'एक राष्ट्र, एक राशन कार्ड’ योजना सहित कई उपायों की घोषणा की शुरुआत की, जिसमें 68.6 करोड़ लाभार्थियों के लिए मुफ्त खाद्यान्न मुहैया किया गया, आपात कर्ज गारंटी योजना के तहत 61 लाख लोगों को 2.5 लाख करोड़ रुपए के ऋण की मंजूरी दी गई, पीएम गरीब कल्याण रोजगार योजना के लिए 10,000 करोड़ रुपए का अतिरिक्त आवंटन और उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (पीएलआइ) योजना के तहत 10 क्षेत्रों को 1.46 लाख करोड़ रुपए की प्रोत्साहन राशि दी गई.

ऋण अदायगी पर स्थगन के अलावा बुनियादी ढांचा निर्माण, सबसे कमजोर तबके के लिए रोजगार, खाद्य सुरक्षा और एमएसएमई को ऋण सहायता देने के उद्देश्य से योजनाएं तैयार की गईं. सीमित राजकोषीय गुंजाइश से कई अर्थशास्त्रियों और नीति-विशेषज्ञों की आलोचनाओं के बावजूद सरकार ने प्रत्यक्ष नकदी मदद की योजना नहीं शुरू की. सरकार को लगता था कि अनिश्चितता की स्थिति के मद्देनजर लोग नकदी मदद को खर्चने की बजाए बचा कर रखना चाहेंगे और इससे पैसे देने का उद्देश्य ही खत्म हो जाएगा.

अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर मोदी सरकार
अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर मोदी सरकार

सरकार 1 फरवरी को अपना बजट पेश करने जा रही है और अर्थव्यवस्था में उम्मीद की किरणें झिलमिलाने लगी हैं. भारतीय रिजर्व बैंक ने वृद्धि दर के अपने अनुमान में संशोधन करके 2020-21 के लिए शून्य से 7.5 प्रतिशत नीचे का अनुमान जताया है. पहले यह अनुमान शून्य से 9.5 प्रतिशत नीचे रहने का था. यह सुधार वित्त वर्ष 21 की दूसरी छमाही में कुछ सकारात्मक वृद्धि की संभावना के कारण है.

लगभग 77 प्रतिशत लोगों का मानना है कि अगले छह महीनों में अर्थव्यवस्था में सुधार दिखेगा या वह जस की तस रहेगी; सिर्फ 17 प्रतिशत का कहना है कि इसमें गिरावट आएगी. मनमोहन सिंह की सरकार के साथ मोदी सरकार के आर्थिक प्रदर्शन की तुलना करते हुए, 47 प्रतिशत का कहना है कि मोदी सरकार ने बेहतर प्रदर्शन किया है, जबकि 36 प्रतिशत का कहना है कि इसका प्रदर्शन यूपीए सरकार जैसा ही है. 

बागडोर पर सधी पकड़
बागडोर पर सधी पकड़

यह अगस्त 2020 के देश का मिज़ाज सर्वेक्षण के नतीजों से पांच प्रतिशत अंक की गिरावट है. तब 88 प्रतिशत ने कहा था कि आर्थिक मोर्चे पर मोदी सरकार का प्रदर्शन मनमोहन सरकार के बराबर या बेहतर था. पिछले अगस्त के सर्वे में सिर्फ 13 फीसद लोगों का मानना था कि मोदी सरकार ने यूपीए से खराब प्रदर्शन किया है, जबकि जनवरी 2020 के सर्वे में 30 प्रतिशत लोग ऐसा मान रहे थे. ऐसा लगता है कि 'मोदीनॉमिक्स’ में लोगों का विश्वास फिर से बहाल हुआ है. 

दिलचस्प बात यह है कि जनवरी 2020 के सर्वेक्षण में 27 प्रतिशत लोगों ने कहा कि उनकी आर्थिक स्थिति खराब हो गई है, ताजा सर्वेक्षण में केवल 12 प्रतिशत ने ही ऐसा कहा है. जनवरी 2019 में जहां 40 प्रतिशत लोगों ने कहा था कि उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ है, उसकी तुलना में इस साल जनवरी के सर्वेक्षण में 45 प्रतिशत लोगों ने कहा कि उनकी आर्थिक स्थिति कुछ सुधरी है.

देश की प्रति व्यक्ति आय इस वित्त वर्ष में 2000 डॉलर (1,46,000 रु.) से नीचे चली जाएगी और अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि देश को पिछले साल के स्तर पर लौटने में तीन साल का वक्त लगेगा. निजी और गैर-वित्तीय 2,531 सूचीबद्ध फर्मों का आरबीआइ का आंकड़ा बताता है कि अप्रैल-जून तिमाही में कर्मचारियों के मद में कुल मिलाकर 3 प्रतिशत की कटौती हुई है. उत्पादन क्षेत्र में दोहरे अंकों में गिरावट देखी गई.

बागडोर पर सधी पकड़
बागडोर पर सधी पकड़

हालांकि मोदी सरकार ने राहुल गांधी के ‘सूट-बूट की सरकार’ के तंज से छुटकारा पाने की बेतरह कोशिश की है, लेकिन यह धारणा नहीं बदल पाई कि उसकी आर्थिक नीतियां कॉर्पोरेट के पक्ष में झुकी हैं. 39 प्रतिशत का कहना है कि सरकारी नीतियों से केवल बड़े व्यवसाय को फायदा हुआ है. हालांकि, 29 फीसद का कहना है कि नीतियों का बड़े और छोटे दोनों तरह के कारोबार को फायदा हुआ है. मोदी सरकार ने कॉर्पोरेट टैक्स की दरों को घटाकर लगभग 25 प्रतिशत कर दिया है, नाकाम कारोबारियों के लिए दिवालिया संहिता लाकर राह आसान की है.  

बागडोर पर सधी पकड़
बागडोर पर सधी पकड़

आत्मनिर्भरता का खाका 
मई 2020 में, महामारी से सबसे बुरी तरह प्रभावित क्षेत्रों को राहत देने और विकास को गति देने के लिए केंद्र ने 20 लाख करोड़ रुपए के पैकेज (जीडीपी का 10 प्रतिशत) के साथ आत्मनिर्भर भारत अभियान की घोषणा की. इस पैकेज में महामारी की चपेट में आए उद्योगों और लोगों को राहत देने और नकदी का प्रवाह बढ़ाने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक के 8.04 लाख करोड़ रुपए के उपाय भी शामिल थे.

तीन चरणों में घोषित, आत्मनिर्भर भारत अभियान के उपायों में किसान क्रेडिट कार्ड, नाबार्ड के माध्यम से किसानों के लिए आपात कार्य पूंजी, एमएसएमई को सरकारी गारंटी ऋण, बिजली वितरण कंपनियों के लिए 1.18 लाख करोड़ रुपए के ऋण, रोजगार सृजन की सुविधा के लिए आत्मनिर्भर भारत रोजगार योजना और घरेलू उत्पादन को प्रोत्साहित करने के लिए पीएलआइ (उत्पादन से जुड़े प्रोत्साहन) योजना शामिल हैं.

हालांकि, ऐसे समय में जब अधिकांश एमएसएमई कारोबार के बंद रहने के बावजूद वेतन देने, ऋण चुकाने और भारी-भरकम बिजली बिलों के भुगतान के लिए जूझ रहे थे, कारोबारी और आम लोग सरकार से सीधी राहत की उम्मीद कर रहे थे, अधिक ऋण की नहीं. 43 प्रतिशत का कहना है कि राहत पैकेज से उनकी आर्थिक स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया, 20 प्रतिशत का कहना है कि हालत बदतर हुई जबकि 35 प्रतिशत का कहना है कि उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ है.

हालांकि, चीन से आयात पर देश की निर्भरता को कम करने के लिए सरकार के आत्मनिर्भर अभियान नाखुशी के बावजूद बहुत से लोग आत्मनिर्भर भारत के पीछे की भावना की सराहना करते हैं. 46 प्रतिशत ने इसे एक अच्छी पहल बताया.18 प्रतिशत इसे अव्यावहारिक कहकर खारिज कर दिया, क्योंकि देश में अभी तक दुनिया का आपूर्ति केंद्र बनने की क्षमता नहीं है, जबकि 13 प्रतिशत इसे बस एक जुमला मानते हैं.

खाद्य पदार्थों की कीमतों में महंगाई की स्थिति अब चिंता का विषय बन गई है. अब तक, आरबीआइ अपने 4 प्रतिशत (+/- 2 प्रतिशत) लक्ष्य के साथ बने रहने में सफल रहा, लेकिन लॉकडाउन ने हर क्षेत्र को तबाह किया. अक्तूबर में महंगाई 77 महीने के उच्च स्तर 7.6 प्रतिशत पर पहुंच गई, लेकिन नवंबर में 6.9 प्रतिशत पर आ गई. आरबीआइ ने महंगाई दर को बढ़ाने वाली कम ब्याज दरों से चिंतित होने के बावजूद, दिसंबर में ब्याज दरों पर यथास्थिति बनाए रखी. दिसंबर में खुदरा महंगाई दर 4.6 फीसद थी. देश का मिज़ाज सर्वेक्षण में 55 प्रतिशत को लगता है कि केंद्र ने बढ़ती महंगाई को रोकने के लिए पर्याप्त प्रयास किए हैं.

बैंक सेहत का सवाल 
चाहे इन्फ्रास्ट्रक्चर लीजिंग ऐंड फाइनेंशियल सर्विसेज (आइएलएफऐंडएस) हो, दीवान हाउसिंग फाइनेंस लिमिटेड, पंजाब और महाराष्ट्र सहकारी बैंक, यस बैंक हो या फिर लक्ष्मी विलास बैंक, एक के बाद एक बैंकों और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों के विफल होने के साथ, बैंकिंग प्रणाली में जनता का विश्वास डोल गया है. लोग पूछ रहे हैं कि मेरा बैंक कितना सुरक्षित है? सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की हालत सबसे बुरी है, जिनके खाते में 9.4 लाख करोड़ रुपए के डूबत कर्ज हैं.

सो, आश्चर्य नहीं कि देश का मिज़ाज सर्वेक्षण में 47 प्रतिशत लोग चाहते हैं कि सरकारी बैंकों का निजीकरण किया जाए, जबकि 39 प्रतिशत लोगों की राय अलग है. पिछले साल, आरबीआइ के एक आंतरिक कार्य समूह ने बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 में संशोधन करने का सुझाव दिया, ताकि बड़े कॉर्पोरेट घरानों को बैंकों का प्रमोटर बनने की अनुमति दी जाए.

हालांकि कई विशेषज्ञों ने इसका विरोध किया है. हालांकि 33 प्रतिशत लोग अभी भी बैंक की सावधि जमा में अपनी बचत को डालना पसंद करते हैं, दूसरा विकल्प सोना (18 प्रतिशत) है, जबकि अचल संपत्ति तथा म्युचुअल फंड तीसरे और चौथे स्थान पर हैं.

अधिकांश लोगों की नजरें बजट 2021 पर लगी हैं कि आर्थिक हालात बदलने के लिए सरकार क्या करने वाली है.

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