कोरोना वायरस महामारी से निपटने के लिए केंद्र सरकार ने तीन हफ्तों के लिए देशव्यापी तालाबंदी कर दी. इसकी सबसे ज्यादा मार यात्रा और पर्यटन, विमानन, हॉस्पिटैलिटी और मनोरंजन उद्योग पर पड़ेगी. पहले से मुश्किल में फंसे ऑटोमोबाइल सरीखे कुछ क्षेत्र और भी चरमरा जाएंगे. असंगठित क्षेत्र में अस्थायी श्रमिक के तौर पर या स्व-रोजगार करने वाले 30 करोड़ लोग आने वाले दिनों में रोजगार से जुड़ी चुनौतियों से दो-चार होंगे. शेयर बाजार भी बड़ी गिरावट के साक्षी बने. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 19 मार्च को कहा था कि सरकार ने अर्थव्यवस्था की मुश्किलों की थाह लेने और वित्तीय पैकेज सुझाने के लिए कार्यबल का गठन किया है, पर वक्त तेजी से गुजरता जा रहा है.
26 मार्च को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने संकट की घड़ी में गरीबों की मदद करने के लिए 1.7 लाख करोड़ रुपए के राहत पैकेज की घोषणा की. प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना के तहत उन लोगों के लिए खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित की जाएगी जो तीन हफ्तों की बंदी से प्रभावित हुए हैं. इसके लिए प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (डीबीटी) का इस्तेमाल किया जाएगा. इसके अलावा राहत पैकेज में कोरोना से लडऩे में मदद करने वाले हर कर्मचारी को 50 लाख रुपए का बीमा दिया जाएगा. प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत अगले तीन महीने तक अतिरिक्त पांच किलो चावल और एक किलो दाल का मुफ्त वितरण किया जाएगा. प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि के 8.69 करोड़ लाभार्थी किसानों के खाते में अप्रैल के पहले हफ्ते में 2,000 रुपए की पहली किस्त डाली जाएगी.
मनरेगा में दैनिक मजदूरी 182 रुपए से बढ़ाकर 202 रुपए की गई. इससे पांच करोड़ परिवारों को फायदा होगा और हर कर्मचारी को 2,000 रुपए अतिरिक्त मिलेंगे. अगले तीन महीने बुजुर्गों को 1,000 रुपए प्रति माह और 20 करोड़ महिला लाभार्थियों को 500 रुपए प्रति माह की अनुग्रह राशि दी जाएगी. ये उपाय सरकार की ओर से 24 मार्च को दी गई रियायतों के बाद किए गए हैं जिनमें वित्त वर्ष 2018-19 के लिए देरी से दाखिल किए जाने वाले आयकर रिटर्न दाखिल करने की आखिरी तारीख 31 मार्च से बढ़ाकर 30 जून 2020 कर दी. इसी तरह इस साल मार्च, अप्रैल और मई के माल और सेवा कर रिटर्न दाखिल करने की आखिरी तारीख बढ़ाकर 30 जून कर दी. अन्य कदमों में शामिल हैं: बैंक खातों में न्यूनतम धनराशि रखने की बाध्यता को तीन महीनों के लिए हटाया गया और एटीएम से कितनी भी बार धन निकालने पर अगले तीन महीनों तक कोई शुल्क नहीं लगेगा.
सरकार कैसे इस राहत पैकेज के लिए पैसे की व्यवस्था करेगी? एक विकल्प तो यह है कि भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) सरकारी बॉन्ड खरीदे—राजकोषीय जिम्मेदारी और बजट प्रबंधन कानून की राष्ट्रीय आपदा धारा आरबीआइ को इसका अधिकार देती है. सरकार के पास एक विकल्प यह भी है कि वह हाल के महीनों में कच्चे तेल की कीमतों में भारी गिरावट की वजह से हाथ आई बड़ी धनराशि का इस्तेमाल करे. सरकार उधार लेने पर भी विचार कर सकती है. एक और तरीका खर्चों में कटौती करने का है. मुंबई के एक निवेशक का अनुमान है कि सरकार के वेतन के मद में पिछले पांच साल में 140 अरब डॉलर (10.6 लाख करोड़ रुपए) का इजाफा हुआ है. वे कहते हैं, ''अगर सरकारी तनख्वाहों में 10 फीसद तक की कटौती कर दी जाए, तो तेल के दाम में आई गिरावट के फायदे के साथ इससे जीडीपी के करीब दो फीसद का फायदा मिल जाता है.''
आरबीआइ परिसंपत्ति-वसूली यानी बेकार पड़ी परिसंपत्तियों के प्रभावी इस्तेमाल से अधिकतम संसाधन जुटाने के कार्यक्रम पर भी विचार कर सकता है, जो दूसरे वित्तीय संकटों के बाद अन्य देशों में चलाए गए कार्यक्रम से मिलता-जुलता हो सकता है. अमेरिका में ऐसा ही ट्रबल्ड एसेट रिलीफ प्रोग्राम चलाया गया था, जिसमें वित्तीय संस्थाओं की बैलेंस शीट को महफूज रखने के लिए उनकी टॉक्सिक परिसंपत्तियों यानी मांग के ध्वस्त हो जाने की वजह से बेकार हो चुके निवेशों को खरीद लिया था. इससे 2007-08 के सबप्राइम वित्तीय संकट से निपटने के लिए खर्च की गई अमेरिकी सरकार की लागत निकल आई थी. प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के एक सदस्य कहते हैं, ''मगर इन उपायों में गहरा भरोसा होना चाहिए. इनका नतीजा घाटों में हो सकता है, जिससे और दिक्कत होगी, क्योंकि देश के राजनैतिक वर्ग के लिए इन घाटों को स्वीकार करने की सर्वानुमति बना पाना मुश्किल होगा.''
भारतीय उद्योग जगत अपने लिए जो मिल चुका है, उससे कहीं ज्यादा की उम्मीद कर रहा है. अर्थव्यवस्था के तकरीबन हरेक क्षेत्र की कंपनियां सरकार से मदद की गुहार लगा रही हैं. कुछ को अनुदान सहायता की उम्मीद है, तो कुछ दूसरी कंपनियां सस्ते कर्ज, करों में कटौती या कर भुगतान के टलने की उम्मीद लगाई हैं. वे बैंकों के लिए तय भुगतान की शर्तों में लचीलापन भी चाहती हैं. कुल मिलाकर वे यहां नीचे दिए गए उपायों की उम्मीद कर रही हैं.
1 व्यवसायों के लिए राहत पैकेज लाएं
26 मार्च को किए गए कल्याणकारी ऐलानों के अलावा कुछ लोगों का अनुमान है कि भारतीय अर्थव्यवस्था को जीडीपी के करीब 1 फीसद या करीब 2 लाख करोड़ रुपए के वित्तीय पैकेज की जरूरत है. साथ ही आपसी तालमेल के साथ राजकोषीय और मौद्रिक नीति से जुड़े उपाय करना जरूरी है. अभी तक कोई नीतिगत उपाय नहीं किए गए हैं—लेकिन अब जब देशव्यापी लॉकडाउन है, अर्थव्यवस्था को उबारने की योजना की जरूरत है. भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआइआइ) का कहना है कि वित्तीय पैकेज संकट से उबरने में उद्योग जगत की मदद करेगा और साथ ही उपभोक्ता मांग को तेजी से बढ़ाएगा. यह भी सुझाव दिया गया है कि 10 फीसद के दीर्घावधि पूंजीगत लाभ कर को हटा दिया जाए और कुल लाभांश कर 25 फीसद तय कर दिया जाए.
2 कारोबार के लिए सस्ती मिले पूंजी
भारतीय उद्योग जगत के कुछ क्षेत्र यह भी चाहते हैं कि आरबीआइ रेपो दर (जिस ब्याज दर पर वह व्यावसायिक बैंकों को उधार देता है) 50 आधार अंकों तक कम कर दे और साथ ही नगद आरक्षित अनुपात (जमाराशियों की फीसद धनराशि जो बैंकों को रिजर्व के तौर पर रखनी होती है) में भी 50 आधार अंकों की कटौती करे, ताकि पर्याप्त नकदी और सस्ते धन का प्रवाह बना रहे. क्रिसिल के चीफ इकोनॉमिस्ट डी.के. जोशी कहते हैं कि मुद्रास्फीति को काबू में रखते हुए रेपो रेट में 50-75 आधार अंकों की कटौती की जा सकती है. वे कहते हैं, ''कच्चे तेल की कीमतों में तेज गिरावट और मांग के ध्वस्त हो जाने के चलते उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआइ) पर आधारित मुद्रास्फीति के निकट भविष्य में चिंताजनक स्तर पर पहुंचने की संभावना नहीं है. हम देखते हैं कि खुदरा मुद्रास्फीति को वित्त वर्ष 2020-21 में 4.4 फीसद के स्तर पर रखा जा सकता है.''
कुछ अन्य चाहते हैं कि केंद्रीय बैंक ब्याज दरों में इससे भी ज्यादा—200 से 250 आधार अंकों के बीच—कटौती करे. नीतियों पर नजर रखने वालों का कहना है कि आरबीआइ को यह तत्काल करना चाहिए ताकि संकेत दिया जा सके कि उसके तार जमीनी हालात से जुड़े हैं. बैंकों के पास तकरीबन 3 लाख करोड़ रुपए नकदी है, लेकिन यह रकम व्यवस्था में नहीं आ रही है—जरूरत इस बात की है कि आरबीआइ बैंकों को उधार देने का इशारा करे और साथ ही बाजारों में स्थिरता सुनिश्चित करे. एसोचैम के प्रेसिडेंट निरंजन हीरानंदानी कहते हैं, ''भारत दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है इसलिए उसे ऐसे समय पर सुधार के कदम उठाने में पीछे नहीं हटना चाहिए. यही सही वक्त है जब भारतीय रिजर्व बैंक को कंपनियों को दिवालिया होने से बचाने के लिए मौद्रिक पैकेज का ऐलान करना चाहिए.'' वे यह भी सुझाव देते हैं कि रेटिंग एजेंसियों से हालात के स्थिर होने तक रेटिंग नहीं घटाने के लिए कहा जाए.
3 ऑटो कंपनियों को राहत दें
कुछ लोगों का कहना है कि ऑटोमोबाइल कंपनियों के लिए बीएस-4 वाहनों को निकालने की आखिरी तारीख 31 मार्च से आगे बढ़ा दी जाए. यह क्षेत्र खास तौर पर गंभीर चुनौती से दोचार है—मांग में सुस्ती के चलते फरवरी में बिक्री पिछले साल के मुकाबले पहले ही 19 फीसद से ज्यादा गिर चुकी थी. कोरोना वायरस की महामारी ने बिक्री को और भी गर्त में धकेल दिया. देश भर के डीलरों ने पिछले हक्रते तक बिक्री में 50 फीसद की गिरावट देखी—और अब वे कामकाज बंद करने को मजबूर हैं.
मारुति सुजुकी, महिंद्रा ऐंड महिंद्रा, मर्सिडीज बेंज और ह्युंडई मोटर्स सरीखे बड़े वाहन निर्माताओं ने अपने संयंत्र बंद कर दिए हैं. सबसे बढ़कर नए पर्यावरण नियमों का तकाजा है कि कार निर्माता और डीलर अपने बीएस-4 वाहन 31 मार्च तक निकाल दें और 1 अप्रैल से बीएस-6 वाहनों की व्यवस्था में चले जाएं. वह भी तब जब महामारी के चलते बिक्री खत्म हो चुकी है और अनबिके वाहनों का भारी बोझ उनके सिर पर है. विश्लेषण करने वाली कंपनी क्रिसिल का अनुमान है कि ऑटोमोबाइल क्षेत्र 2021 के वित्त वर्ष में भी इस झटके से उबर नहीं सकेगा.
फेडरेशन ऑफ ऑटोमोटिव डीलर्स एसोसिएशन के प्रेसिडेंट आशीष हर्षराज काले कहते हैं कि संगठन सुप्रीम कोर्ट से कटऑफ तारीख बढ़वाने की कोशिश कर रहा है. अलबत्ता अगर ऐसा नहीं हो पाता है, तो वे चाहते हैं कि ऑटो निर्माता अनबिके बीएस-4 वाहन डीलरों से वापस लें ताकि उनका घाटा कम हो सके.
4 रुपए को मजबूत करें
डॉलर-रुपए का विनिमय मूल्य 26 मार्च को 76 रुपए के पार चला गया. कइयों का मानना है कि रुपया अप्रैल के आखिर तक 80 रुपए प्रति डॉलर से भी ज्यादा अवमूल्यित हो सकता है. हालांकि जोशी मानते हैं कि यह छोटे वक्त की परिघटना है. भारत के पास विदेशी मुद्रा भंडार में फिलहाल करीब
481 अरब डॉलर हैं. उम्मीद की जा रही है कि और ज्यादा तरलता बनाने के लिए आरबीआइ कर्ज की मानक दरों में ज्यादा बड़ी कटौतियों पर विचार करेगा. इस बारे में फैसला लेने के लिए मौद्रिक नीति समिति की बैठक 3 अप्रैल को होने की उम्मीद है.
रुपए के अवमूल्यन की रफ्तार मध्य मार्च में तेज हो गई थी, जब विकसित देशों ने अपनी-अपनी मानक ऋण दरों में कटौती कर दी. अमेरिकी फेडरल रिजर्व इसे शून्य पर ले आया, जबकि बैंक ऑफ इंग्लैंड ने इसे 0.1 फीसद कर दिया. मार्च में ब्राजील, अर्जेंटीना, दक्षिण अफ्रीका, इंडोनेशिया और यहां तक कि सिंगापुर सरीखी उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राओं का मूल्य घटा—महामारी के चलते दुनिया भर के निवेशक 'जोखिम भरी परिसंपत्तियां' सस्ते में बेच रहे हैं. इस साल के पहले तीन महीनों में तमाम विदेशी फंड ने इक्विटी और डेट में निवेशित 11 अरब डॉलर निकाले. ज्यादातर देश खुद को अंतरराष्ट्रीय व्यापार से काटते दिखाई दे रहे हैं, जिससे निर्यातों में धीरे-धीरे भीषण ठहराव आ रहा है. वित्त मंत्रालय के एक शीर्ष अधिकारी कहते हैं, ''इन कारकों की मार छोटे वक्त में मुद्रा पर पड़ रही है. लेकिन चूंकि हमारे बैंकों के पास पर्याप्त पूंजी है, चूंकि हमारे पास पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार है और चूंकि कच्चा तेल 31 डॉलर प्रति बैरल से नीचे हैं, इसलिए इस फिसलन को रोका जा सकता है.''
5 बाजारों को शांत करें
भारतीय शेयर बाजार में पिछले एक पखवाड़े से ज्यादा वक्त से बेरोक गिरावट की चपेट में हैं. 23 मार्च को सेंसेक्स ने जब ऐतिहासिक गोता लगाया, निवेशकों ने एक ही दिन में 14.23 लाख करोड़ रुपए गंवा दिए. आरबीआइ को बाजारों को शांत करने के सभी संभव उपाय करने चाहिए—इस मामले में केंद्रीय बैंक के लिए एक बना-बनाया सांचा मौजूद है. अमेरिकी फेडरल बैंक ने बॉन्ड मार्केट में दखल देते हुए 500 अरब डॉलर के बॉन्ड और 200 अरब डॉलर की गिरवी-सुरक्षित प्रतिभूतियां खरीदीं. बैंक ऑफ इंग्लैंड और बैंक ऑफ कोरिया ने भी यही रास्ता अपनाया.
6 आमदनी में सहारा दें
लाखों भारतीयों के सामने आमदनी का संकट पैदा होने की आशंका है, जिसमें सरकार को उन्हें तेजी से सहारा देने की जरूरत है. मध्य और निम्न आय समूहों को आमदनी में सहारा देकर खपत का गिरना रोकने में अच्छी-खासी मदद दी जा सकती है. इससे भारत के 10 करोड़ वेतनभोगी लोगों के 70 फीसद जितने बड़े हिस्से—असंगठित क्षेत्र में काम पर लगे लोगों, औपचारिक अनुबंध के बगैर काम कर रहे लोगों, मसलन शहरी घरों के घरेलू कामगारों- को मदद मिल सकती है. अलबत्ता एक बड़ी चुनौती यह है कि संभावित लाभार्थियों की पहचान के लिए कोई डेटाबेस नहीं है. नीतियों पर नजर रखने वालों का सुझाव है कि सरकार इसके लिए 'समावेश की कसौटी' का इस्तेमाल करे—मसलन, जिनके पास जन धन खाते हैं. (इसका दूसरा पहलू यह है कि ज्यादातर जन धन खाते ग्रामीण इलाकों में हैं जबकि महामारी फिलहाल शहरी इलाकों में केंद्रित है.)
7 आइबीसी की कार्रवाई टाल दें
हालांकि सरकार 24 मार्च को संकटग्रस्त कंपनियों को सहारा देने का ऐलान कर चुकी है, पर कइयों का सुझाव है कि खासकर विमान और हॉस्पिटैलिटी सरीखे क्षेत्रों की कंपनियों के लिए आइबीसी के तहत कार्यवाहियां कुछ वक्त के लिए टाल दी जाएं. ये कंपनियां फिलहाल जिस वित्तीय दबाव की चपेट में हैं, वह असली कमजोरी की झलक नहीं देता—कोरोना वायरस की महामारी आखिरकार अप्रत्याशित घटना है. इससे होने वाले वित्तीय नुक्सान का पहले से अंदाजा नहीं लगाया जा सकता था. कई छोटे कारोबारों को चिंता है कि उनकी नकदी खत्म हो रही है और वे कर्ज की किस्त चुकाने में चूक सकते हैं और ऐसे में उन्हें डिफॉल्टर करार दिया जा सकता है.
8 राजकोषीय घाटे के लक्ष्य में ढील दें
जरूरत यह है कि सरकार कमजोर लोगों और कारोबारियों को उनकी आमदनी और नकदी के प्रवाह में सहारा दे. यह प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण और मनरेगा सरीखी रोजगार पैदा करने वाली योजनाओं के जरिए किया जा सकता है—इस खर्च की पूर्ति के लिए सरकार को अलबत्ता राजकोषीय घाटे के अपने लक्ष्य में जीडीपी के कम से कम 1 फीसद की ढील देनी पड़ेगी.
ट्रैवल और टूरिज्म के लिए टैक्स छूट पर विचार करें
इंडियन एसोसिएशन ऑफ टूर ऑपरेटर्स के सेक्रेटरी राजेश मुद्गिल कहते हैं कि इससे बदतर कारोबारी माहौल उन्होंने पहले कभी नहीं देखा. होटल 20 फीसद से कम भरे होने के बावजूद चलाए जा रहे हैं. सामाजिक दूरी बनाने के उपायों का गंभीर असर लगातार एयरलाइनों, होटलों, मॉल, मल्टीप्लेक्स, रेस्तरां और खुदरा व्यापारियों पर पड़ रहा है. कारोबार की मात्रा में कमी और क्षमता से कम पर उन्हें चलाने की मजबूरी का असर इन क्षेत्रों की कंपनियों के नकदी प्रवाह पर पड़ेगा. एसोसिएशन का अनुमान है कि उद्योग को कम से कम 8,500 करोड़ रुपए का नुक्सान हो सकता है.
इसकी भरपाई के लिए सरकार एक निश्चित वक्त के लिए जीएसटी का बकाया माफ करने या अगले वित्तीय साल के लिए दरें कम करने पर विचार कर सकती है. नीति विशेषज्ञों का कहना है कि निरंतर सहारे के लिए कर में कटौती या भुगतान टालना सबसे अच्छे विकल्प हो सकते हैं. आगरा के जेपी पैलेस होटल के वाइस प्रेसिडेंट हरि सुकुमार कहते हैं, ''महामारी ने उद्योग पर कहर बरपा दिया है. हमें भारी घाटा हुआ है और उससे उबरने से बहुत दूर हैं. हमें सरकार से भारी सहायता की जरूरत है. उद्योग के तौर पर हमें जीएसटी भुगतान टालने और जरूरी चीजों के भुगतान में मदद की जरूरत है. हमारे मासिक खर्चों का एक बहुत बड़ा हिस्सा बिजली का बिल चुकाने में जाता है.''
10 प्रतिशत और आभूषण कारोबारियों को सस्ते कर्ज की दरकार
रकम उगाहने की चुनौतियों और हांगकांग सरीखे प्रमुख बाजारों में संकट से घिरी इस क्षेत्र की कंपनियां पिछले दो वित्तीय वर्षों से कर्ज के गहरे संकट की चपेट में हैं. महामारी के चलते सुस्ती की वजह से हालात, खासकर हीरा निर्यातकों के लिए, जनवरी से और बदतर हो गए हैं. जयपुर के जेवेल्स एंपोरियम के मालिक अनूप बोहरा कहते हैं कि सरकार को बैंकों से कहना होगा कि वे सस्ते कर्ज दें और मौजूदा कर्जों की वापसी या उन पर ब्याज टाल दें और सोने पर आयात शुल्क हटा दें ताकि ऊंची चढ़ती कीमतों का असर कम हो. वे कहते हैं, ''यही अकेला तरीका है जिससे हम कर्मचारियों को बनाए रखने की उम्मीद कर सकते हैं. अगले छह महीनों में कारोबार में जान आने की मैं कोई संभावना नहीं देखता.''
11 कपड़ा उद्योग को कर प्रोत्साहन दें
निर्यात पर निर्भर रेडीमेड कपड़ों के निर्माता तीव्र प्रतिस्पर्धा से जूझ रहे हैं. क्रिसिल का कहना है कि अमेरिकी और यूरोपीय संघ सरीखे प्रमुख बाजार प्रतिकूल माहौल का सामना कर रहे हैं, ऐसे में सूती धागे का निर्यात करने वालों सहित निर्यातकों के लिए मांग का अच्छा-खासा दबाव हो सकता है. निर्यातकों के कारोबार पर वित्तीय साल 2019-20 की तीसरी तिमाही में पहले ही बुरा असर पड़ चुका है और उसकी वजह चीन से सप्लाई में व्यवधान रहा, जिसका इस कारोबार में एक-चौथाई हिस्सा है. सामाजिक दूरी के चलते परिधानों की मांग में भी नरमी आ सकती है. कंफेडरेशन ऑफ इंडियन टेक्सटाइल इंडस्ट्री ने सरकार से कर्ज पर ब्याज दर घटाने की मांग की है और कर्ज की वापसी पर चार तिमाहियों तक रोक लगाने के लिए कहा है. उसने कच्चे माल पर ऐंटी-डंपिंग और बेसिक कस्टम ड्यूटी से छूट की भी मांग की है.
12 एमएसएमई को कर्ज दें
पंजाब सरकार ने 23 मार्च को राज्य में पूरा कर्फ्यू लगा दिया. एवन साइकिल्स के चेयरमैन ओंकार सिंह पाहवा के लिए यह बुरे सपने से कम नहीं था—उन्हें न केवल लुधियाना की अपनी फैक्टरी बंद करनी पड़ी बल्कि माल भी हटाना पड़ा. इसका असर कारोबार और प्रशासन, दोनों पर पड़ा. अकेले पंजाब को राज्य के उद्योगों को मूल्य संवर्धित कर यानी वैट का 310 करोड़ रुपए का बकाया (जीएसटी से पहले का) चुकाना पड़ता है. वाहनों के कलपुर्जे बनाने वाली लुधियाना की रजनीश इंडस्ट्रीज के मैंनेजिंग डायरेक्टर राहुल आहुजा कहते हैं, ''कुछ छोटी-छोटी चीजें हैं जो सरकार कर सकती है, मसलन लॉकडाउन के दौरान बिजली की तयशुदा लागत माफ कर दे, सार्वजनिक क्षेत्र की अपनी कंपनियों से भुगतान जल्दी दिलवाए और उद्योगों के साथ लंबित दावों और विवादों का जल्दी निपटारा करे.'' पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के कई एमएसएमई ने वित्त मंत्रालय से मांग की है कि उन्हें सप्लायरों से वसूल किया गया जीएसटी रखने दिया जाए और मासिक आंशिक भुगतान करने का प्रावधान लाया जाए. आहुजा कहते हैं, ''इससे नकदी का प्रवाह बनाए रखा जा सकेगा.'' इस बीच पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिह ने वित्तीय साल 31 मार्च से बढ़ाकर अप्रैल करने के लिए कहा है.
13 कृषि क्षेत्र की डिलिवरी/कटाई की चिंताओं को दूर करें
केंद्र और राज्य दोनों की एक बड़ी चिंता लॉकडाउन के दौरान खाने की और जरूरी चीजों की सप्लाई को बनाए रखना है. हालांकि उन्हें लॉकडाउन की वजह से लगाई गई उत्पादन की पाबंदी से छूट दी गई है, फिर भी किसान अपनी उपज को स्थानीय मंडियों तक पहुंचाने में गंभीर परेशानियों का सामना कर रहे हैं. पंजाब के संगरूर इलाके में सब्जियों के एक बड़े ट्रांसपोर्टर गुरप्रीत सिंह कहते हैं, ''ट्रक ड्राइवर दोगुने किराये पर भी उपज की ढुलाई के लिए तैयार नहीं हैं.''
अलबत्ता राज्य प्रशासन ट्रांसपोर्ट यूनियनों से बात कर रहा है कि वे न केवल डिलिवरी के फेरे बढ़ा दें बल्कि इसके लिए अंधाधुंध पैसा भी वसूल न करें. मुश्किल तब और बढ़ जाएगी जब 1 अप्रैल से देश भर में रबी की फसलों की कटाई का सीजन शुरू होगा. इस काम में आम तौर पर उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड से आने वाले प्रवासी मजदूरों को लगाया जाता है. मगर राष्ट्रीय लॉकडाउन और कई राज्यों में कर्फ्यू के चलते मजदूरों की आवाजाही ठप हो गई है, जिससे फसलों की कटाई खतरे में पड़ गई है.
रामविलास पासवान की अगुआई वाला खाद्य खरीद मंत्रालय पिछले दो साल से खरीद और वितरण के तंत्र को डिजिटल बनाने में लगा है. मंत्रालय के एक शीर्ष अफसर कहते हैं कि अधिकारी राज्य सरकारों के अपने समकक्षों के साथ मिलकर फसलों के मासिक सर्वेक्षण का काम कर रहे हैं ताकि एक तारीख तय की जा सके जब किसानों को अपनी फसलों की स्थानीय मंडियों तक ढुलाई करनी होती है. वे फसलों की कटाई और ढुलाई की परेशानियां सुलझाने के लिए भी राज्य एजेंसियों के साथ मिलकर काम कर रहे हैं. इसके लिए कटाई के ज्यादा तेजी से भुगतान की और जहां मजदूरी की लागत का भुगतान सरकारी करती है वहां खेतिहर मजदूरों को मनरेगा के तहत लाने की
इजाजत देने की और चुस्त-दुरुस्त खरीद की जरूरत होगी.
वित्त मंत्री सीतारमण ने 23 मार्च को राज्य सरकारों को सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के 75 करोड़ लाभार्थियों को बांटने के लिए खाद्यान्न तीन महीने की उधारी पर खरीदने की इजाजत दी थी. उनके मंत्रालय की बड़ा विचार यह था कि भारतीय खाद्य निगम का स्टॉक खत्म किया जाए, जिसके पास 436 लाख टन अतिरिक्त भंडार है, और फिर खरीद के लिए जाया जाए. नई योजना पीडीएस दुकानदारों को हरेक परिवार का कोटा मौजूदा पांच किलो से बढ़ाकर दोगुना करने की इजाजत देती है.
जब ज्यादातर कारोबार ठप होने के कगार पर हैं, सरकार से वित्तीय पैकेज की शक्ल में राहत की मांग जोर पकड़ती जा रही है. आर्थिक तबाही को रोकने के लिए ऐसा एक पैकेज जल्दी से जल्दी लाने की जरूरत है.
कारोबार पर ताले
देशव्यापी लॉकडाउन के चलते सड़कें खाली हैं और दुकानें बंद
''भारत दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है इसलिए संकट समाधान के लिए पर्याप्त कदम उठाने में देरी नहीं झेल सकता. यही सही वक्त है कि आरबीआइ कंपनियों को दिवालिया होने से बचाने के लिए मौद्रिक पैकेज का ऐलान करे''
निरंजन हीरानंदानी
''आरबीआइ मुद्रास्फीति को काबू में रखते हुए रेपो दर में 50-75 आधार अंकों की कटौती कर सकता है. खुदरा महंगाई निकट भविष्य में बहुत ज्यादा बढऩे की संभावना नहीं है''
डी.के.जोशी
चीफ इकॉनोमिस्ट, क्रिसिल
बाद में आना
देश भर के बाजार बंद हैं और यहां तक कि जरूरी चीजों की सप्लाई भी बाधित हुई है
''एकमात्र सरकारी सहायता से ही हम अपने कर्मचारियों को बनाए रखने की उम्मीद कर सकते हैं. मदद नहीं मिली तो अगले छह महीनों में कारोबारों में जान आने की मैं कोई संभावना नहीं देखता''
—अनूप बोहरा
मालिक, जेवेल्स एंपोरियम, जयपुर
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