दंगे की आग में झुलसने के एक सप्ताह बाद 3 मार्च को उत्तर-पूर्वी दिल्ली में जिंदगी अपनी पटरी पर लौट आई. बच्चे टॉफियां खरीदने किराना की दुकानों की ओर भाग रहे हैं, मस्जिदों में नमाज के लिए अजान शुरू हो गई हैं, मंदिरों में घंटियां बज रही हैं और उत्तर-पूर्वी दिल्ली नगर निगम का एक ट्रक हवा में उड़ती धूल को रोककर प्रदूषण स्तर को सुधारने (इस निर्वाचन क्षेत्र के लिए चुनावी वादों में से एक, बेहतर वायु गुणवत्ता प्रदान करना भी था) के लिए गलियों में चारों तरफ पानी का छिड़काव कर रहा है.
सांप्रदायिक दंगे के गर्दो-गुबार को साफ किया जाना अभी बाकी है. ट्रक आगे बढ़ रहा है. यह मलबे के ढेर, खाक हो चुकी मोटरसाइकिलों, जले हुए कागज और टूटे हुए कांच के ढेर, कालिख तथा धूल से भरे घरों और रैपिड ऐक्शन फोर्स (आरएएफ) के एक दस्ते, जिसे यहां भविष्य में दंगों से निपटने के तरीके सीखने के लिए तैनात किया गया है, के सामने से गुजरता है. आरएएफ के प्रशिक्षक बता रहे हैं, ''दंगाइयों ने ऊपर से हमला किया—इसका मतलब है कि पहला कदम छतों को साफ करना है. फिर जवानों के आने के लिए जमीन तैयार हो जाएगी.''
लेकिन केवल आरएएफ को ही दिल्ली के दंगे से सीखने की जरूरत नहीं है, बल्कि हर सार्वजनिक संस्था को सबक लेने की जरूरत है. दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान शहीन बाग को विरोध प्रदर्शन के स्थल के बदले सार्वजनिक परेशानी खड़ी करने वाला प्रयोग कहना; ऐसे क्षेत्र में जहां सीएए को लेकर हिंसा हुए तीन महीने भी पूरे नहीं हुए थे, वहां सांप्रदायिक झड़पों की अनुमति देना; असंतोष को राष्ट्रविरोध बताने वाले जहरीले भाषणों को गंभीरता से नहीं लेना; और बड़े पैमाने पर दंगे की आशंका भांपने में चूक—उत्तर-पूर्वी दिल्ली के निवासियों से कई स्तरों पर चूक हुई.
सेंटर फॉर इक्विटी स्टडीज के निदेशक, हर्ष मंदर कहते हैं, ''प्रत्येक लोकतंत्र को यह सुनिश्चित करना होगा कि नागरिकों को राज्य के विरुद्ध प्रदर्शन करने, असहमति जताने का अधिकार हो. भारत लोकतांत्रिक तानाशाही वाला देश बन रहा है—हमारे पास विरोध की जगहें क्यों नहीं हो सकतीं? अगर कोई एक वर्ग अलग विचार रखता है तो उसके प्रति शत्रुता को क्यों फैलाया जा रहा है?'' पश्चिम में, प्रदर्शनकारियों को लिखित अनुमति दी जाती है और निर्दिष्ट स्थलों में उन्हें अपने विचार व्यक्त करने की अनुमति दी जाती है ताकि वे विरोधों को विचारों के टकराव की बजाए एक संवाद के रूप में देख सकें.
उत्तरपूर्वी दिल्ली के निवासी टुकड़ों को जोडऩे की कोशिश कर रहे हैं, इसलिए नहीं कि वे ऐसा चाहते हैं, बल्कि इसलिए कि उन्हें यह करना ही होगा. शिव विहार में एक कार पार्किंग जहां अब 25 जली हुई कारें खड़ी हैं, के मालिक 40 वर्षीय रवि कुमार कहते हैं, ''मैंने अपने कर्मचारी के हाथ-पैर काटकर उसे जिंदा जला दिए जाते देखा है. मैं अब यहां काम नहीं करना चाहता. लेकिन गरीब लोग अपनी मर्जी से जब चाहें छुट्टी नहीं ले सकते. हमें अपना पेट भरने के लिए रोज काम पर जाना होता है.'' रवि दंगाइयों की भीड़ के अचानक पहुंचने पर कार पार्किंग में अपने 12 वर्षीय बेटे के साथ फंस गए थे. पिता-पुत्र बिना एक सेकंड का समय गंवाए पार्किंग की चारदीवारी कूदकर दूसरी तरफ से भाग निकले, तब जान बची.
बीमा निरीक्षक विभिन्न कार मालिकों के हर्जाने के दावे का सत्यापन करने पहुंचे हैं. इलाके में राज्य सरकार के प्रतिनिधि भी मौजूद हैं जो लोगों को उनके जले हुए घरों और व्यवसायों के मुआवजे का दावा करने के लिए फॉर्म भरने में मदद कर रहे हैं. राहतकर्मी और नागरिक समाज के सदस्य भी बीच-बीच में कभी-कभार भोजन, कपड़े और कंबल वितरित करने आ जाते हैं. लेकिन जो कुछ हुआ, उसके मानसिक आघात और जो खो गया है, उसके परिणाम से उबरने में लोगों की मदद करने के लिए यहां कोई नहीं है.
बीस वर्षीया सानिया पूछती हैं, ''मेरे छोटे भाई ने मोदी या केजरीवाल का क्या बिगाड़ा था?'' उनके भाई मोहम्मद आकिब की 3 मार्च को जीटीबी अस्पताल में मौत हो गई. वह महज 17 साल का था और दंगे के वक्त घर से बाहर था और पत्थरबाजी की चपेट में आ गया. आकिब की मां और अन्य रिश्तेदार अस्पताल से उसका शव लेने की प्रक्रिया पूरी कर रहे थे. सानिया कहती हैं, ''हमारा घर नहीं जला मगर जिंदगी तो बर्बाद हो गई न?'' उनकी नजर में पीडि़त और अपराधी स्पष्ट हैं.
वे कहती हैं, ''हमारे रिश्तेदारों ने अपने घर, कारोबार, अपनी दौलत गंवाई है. इन दंगों में मुसलमानों को निशाना बनाया गया.'' कई लोगों का कहना है कि माली नुक्सान से उबरने में उन्हें कई साल लग जाएंगे लेकिन जो मानसिक क्षति हुई है, उसकी कभी भरपाई नहीं हो सकेगी. शादी के जेवर, परिवारजनों से मिली चीजें, पसंदीदा स्वेटर और किताबें सब जलकर राख हो गए हैं. चांदपुर की 9 वर्षीया साहिबा बिलख रही है, ''मुझे अपनी ड्रॉइंग बुक चाहिए.'' जब हिंसा भड़की तो जान बचाने के लिए उसके माता-पिता उसे लेकर वहां से भाग गए लेकिन जब वह लौटी और वहां सबकुछ जलकर खाक हो गया.
मानसिक स्वास्थ्य पेशेवरों के अनुसार बच्चों और युवाओं के मानसिक बीमारियों का शिकार होने का जोखिम सबसे अधिक है. 2018 में, यूरोपीय आयोग के आरएएन सेंटर ऑफ एक्सीलेंस ने चरमपंथी वातावरण में रहने वाले बच्चों पर अध्ययन किया और निष्कर्ष निकाला कि ऐसे बच्चों के बड़े होने पर कट्टरपंथी हो जाने की संभावना बहुत अधिक रहती है. उत्तर-पूर्वी दिल्ली में, युवाओं ने अपने माता-पिता को घर और परिवार के नुक्सान पर कई दिनों तक रोते-बिलखते देखा है, उन्हें जान बचाने के लिए अपने जलते घरों से कूदना पड़ा या फिर खुद उन्हें पत्थर और गोलियों के हमले झेलने पड़े, ऐसे लोगों को जगह-जगह झुंड बनाकर टूटे फुटपाथों पर निराश बैठा देखा जा सकता है.
इनमें से अधिकांश जमघट हिंदू युवाओं या मुस्लिम युवाओं का है. 18 साल के अरुण कुमार कहते हैं, ''मुझे मुसलमानों के बारे में कुछ नहीं कहना है.'' अरुण ने हाल ही में अपनी स्कूली शिक्षा पूरी की है और 4 मार्च को उनके भाई की शादी होनी थी. वे बताते हैं, ''उन्होंने हमारी दीवारों पर सीएए विरोधी नारे लिखे. अब उन्होंने मेरे परिवार के घर को जला दिया और मेरे भाई की शादी को बर्बाद कर दिया. हम फिर भी कुछ नहीं कहेंगे. लेकिन हम इन घटनाओं को कैसे भूल जाते हैं और इन लोगों पर भरोसा कर लेते हैं? मैं जब उनके चेहरे देखता हूं, हिंसा का पूरा मंजर मेरे दिमाग में कौंध जाता है.''
स्थानीय लोग अपने स्तर पर सांप्रदायिक सौहार्द बहाल करने की पूरी कोशिश कर रहे हैं. शिव विहार के एक मदरसे में 41 वर्षीय शिक्षक अब्दुस समद, हमसे बात करते हुए घर में सूरज की सीधी रौशनी आने से रोकने के लिए टूटी हुई खिड़की पर एक कपड़ा बांधने की कोशिश कर रहे हैं. वे बताते हैं, ''हम यहां रहना चाहते हैं. हम यहां से नहीं जाना चाहते. हम नफरत नहीं चाहते. दोनों पक्षों ने बहुत कुछ खोया है. हमें विश्वास है कि सरकार हमारी मदद को आगे आएगी और हमें इन सबसे उबरने और फिर से खड़ा होने में मदद करेगी.'' वे कहते हैं कि बच्चे दो सप्ताह में पढऩे के लिए यहां फिर से आने लगेंगे. जो कपड़ा उन्होंने खिड़की पर बांधा वह उन्हें चांदपुर में उनके हिंदू पड़ोसी नवीन शुक्ला ने दिया है.
—सोनाली आचार्जी, श्वेता पुंज, कौशिक डेका, उदय माहूरकर, अजीत कुमार झा और गुलाम जीलानी.

