नरेंद्र मोदी को बीजेपी ने ज्यों ही चुनाव अभियान की कमान सौंपी, सियासत में हलचल मच गई. लंबे अरसे से साथ दे रही जेडीयू ने बीजेपी से किनारा कर लिया. शिवसेना जैसी कई अन्य पुरानी सहयोगी पार्टियां अपनी रणनीति पर फिर से विचार कर रही हैं. कुल मिलाकर बीजेपी एक बार फिर से अन्य पार्टियों के लिए अछूत बनती नजर आ रही है. इसी सियासी गणित पर आधारित पढि़ए ये स्टोरी...
आसमान से गिरे, खजूर में अटके. नरेंद्र मोदी के बीजेपी चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष बनते ही एनडीए के मजबूत सहयोगी जेडी (यू) का खिसकना बीजेपी की मोदीमय उड़ान को झटका दे चुका है. पार्टी एक बार फिर ’90 के दशक वाले दौर में पहुंच गई है, जहां वह अछूत मानी जाती थी. अर्थव्यवस्था, विकास, भ्रष्टाचार के मुद्दे पर हिंदुत्व हावी होने लगा है.
मोदी के नाम को आगे बढ़ाए जाने के बाद से कोई बड़ा क्षेत्रीय दल बीजेपी से जुडऩे को तैयार नहीं है, ऐसे में पार्टी अब हरियाणा में ओमप्रकाश चौटाला की पार्टी आइएनएलडी और पी.ए. संगमा की नेशनल पीपल्स पार्टी से चुनाव पूर्व गठबंधन करने की रणनीति बना रही है ताकि 'राजनैतिक अछूत’ का ठप्पा मिटा सके.
लेकिन मोदी को करीब-करीब प्रधानमंत्री उम्मीदवार मान चुकी बीजेपी के लिए मुश्किल शिवसेना ने भी खड़ी कर दी है. शिवसेना के कार्यकारी अध्यक्ष उद्धव ठाकरे ने अपने हालिया दिल्ली दौरे में मोदी के नाम पर लगातार सस्पेंस बनाए रखा. ऐसे में बिदक रहे सहयोगियों को रोकना और नयों को जोडऩा मोदी की राह को कठिन बना रहा है. मोदी के लिए मुश्किल सिर्फ अभी की नहीं है, चुनाव बाद गठबंधन का दायरा बढ़ाना उनके लिए टेढ़ी खीर होगा.
चुनाव बाद की स्थिति में बीजेपी की नजर जिन दलों पर है, उनमें तमिलनाडु से अन्नाद्रमुक, आंध्र प्रदेश से टीआरएस और जगनमोहन रेड्डी की वाइएसआर कांग्रेस, ओडिसा से बीजेडी शामिल हैं. अगर एनडीए के मौजूदा सहयोगियों शिवसेना और अकाली दल के साथ इन दलों की अनुमानित सीटों (75-80) को जोड़ा जाए तो नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए बीजेपी को अपने बूते 190-200 सीटें हासिल करनी होगी. लेकिन अगर कांग्रेस ने तेलंगाना राज्य बनाने का वादा पूरा कर दिया तो टीआरएस शायद ही एनडीए का रुख करे. हालांकि सीबीआइ के शिकंजे में फंसे जगनमोहन को लेकर बीजेपी का एक खेमा आश्वस्त है जबकि मोदी से बीजेडी को एतराज हो सकता है.
लेकिन इन दलों को लेकर बीजेपी की रणनीति सिरे चढ़ भी जाए तो सवाल है कि जब बीजेपी राम मंदिर जैसे आंदोलन के चरम पर भी 200 सीटें नहीं जीत सकी, तो अब कैसे संभव है? निश्चित रूप से लालकृष्ण आडवाणी उस स्थिति में निर्णायक भूमिका अदा करेंगे. हालांकि बीजेपी के एक वरिष्ठ महासचिव कहते हैं, ''हमें किसी के समर्थन की जरूरत ही नहीं पड़ेगी. इस बार हम व्यक्ति नहीं, विचारधारा की लड़ाई लड़ रहे हैं.”
लेकिन दावे और हकीकत में फर्क है. बीजेपी को सरकार बनाने के लिए जेडी (यू) और टीएमसी में से एक या दोनों का समर्थन हासिल करना होगा. वैसे नीतीश को आडवाणी से एतराज नहीं होगा. जबकि मोदी की वजह से जेडी (यू) ने बीजेपी से 17 साल पुराना रिश्ता तोड़ लिया तो पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी ने 19 जुलाई को दो-टूक ऐलान कर दिया, ''हम नरेंद्र मोदी को समर्थन नहीं करते और टीएमसी भविष्य में भी कभी उन्हें समर्थन नहीं देगी.”
जाहिर है कि सोशल मीडिया पर छाए मोदी का आभामंडल बहुमत के लिए जरूरी जादुई आंकड़े के आगे फीका पड़ सकता है.
(साथ में भावना विज अरोड़ा और कुमार अंशुमन)

