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गैरी सोबर्स : अपनी उंगलियां काटकर इतिहास गढ़ने वाला क्रिकेट का नायक

महान ऑलराउंडर सर गैरी सोबर्स ने बल्ले और गेंद से क्रिकेट की सीमाएं तोड़ीं लेकिन उनका कद खेल से कहीं बड़ा था. वे उस कैरिबियन समाज के नायक थे जो अपनी आजादी, पहचान और आत्मसम्मान की लड़ाई लड़ रहा था

Sir Garry Sobers
सर गैरी सोबर्स का 17 जुलाई 2026 को निधन हो गया
अपडेटेड 19 जुलाई , 2026

"कैरिबियाई द्वीप में क्रिकेट हमेशा से सिर्फ एक खेल नहीं रहा है. वहां का समाज अपने लोगों से किसी खास हुनर की उम्मीद नहीं करता था और न ही योग्यता को कोई खास सम्मान देता था. ऐसे माहौल में क्रिकेट ही एकमात्र ऐसा रास्ता था, जिसने एक आम इंसान को अपना पूरा कद दिखाने का मौका दिया. वहीं से उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर परखे जाने का मौका मिला. क्रिकेटर ही हमारे असली नायक थे.”

कैरिबियाई समाज की इस गहरी नस को महान लेखक वी.एस. नायपॉल ने बड़े सलीके से दर्ज किया था. उनका यह अवलोकन सर गार्फील्ड सेंट ऑब्रुन सोबर्स की शख्सियत पर बिल्कुल सटीक बैठता है. 89 साल की उम्र में उनका चले जाना एक पूरे इतिहास का उठ जाना है. उनके साथ ही उस दौर का आखिरी मुहावरा भी दफन हो गया, जब नए संप्रभु देश अपनी आजादी की इबारत खेल के मैदानों पर लिख रहे थे. गैरी सोबर्स सिर्फ महान ऑलराउंडर नहीं थे, वे उस वेस्टइंडीज का चेहरा थे, जो अपनी स्वतंत्रता की लय खुद तलाश रहा था.

कैरिबियाई समुद्र की नीली लहरों से दूर, उत्तरी बिहार के मधुबनी जिले के मेरे पैतृक गांव उरेन के दालानों में सोबर्स का यह मिथक हमारे बचपन की स्मृतियों में दर्ज था. मेरी पीढ़ी ने सोबर्स को खेलते नहीं देखा था, लेकिन वे हमारे घरों में एक रूहानी उपस्थिति की तरह रहते थे. मेरे स्वर्गीय चाचा बशिष्ठ नारायण ठाकुर अक्सर शाम को दालान में बैठकर गैरी सोबर्स, फ्रैंक वोरेल और वेस्टइंडीज टीम के किस्से सुनाने लगते. विवरण ऐसा मनमोहक होता कि मिथिला के धूल भरे आंगन कुछ देर के लिए केंसिंग्टन ओवल या सबीना पार्क में बदल जाते थे.

विज्डन ने साल 2000 में गैरी सोबर्स को 'क्रिकेटर ऑफ दि सेंचुरी' घोषित किया था
विज्डन ने साल 2000 में गैरी सोबर्स को 'क्रिकेटर ऑफ दि सेंचुरी' घोषित किया था

इन बहसों ने मेरे भीतर खेल के प्रति एक कशिश पैदा की. मैंने समझा कि खेल सिर्फ औसतों का रूखा गणित नहीं है, इसके पीछे समाज, राजनीति और मानवीय भावनाएं होती हैं. सालों बाद जब मैंने स्टीवन रिले की डॉक्युमेंट्री फिल्म ‘फायर इन बैबिलॉन’ देखी तो मुझे सब कुछ साफ दिखने लगा. उस फिल्म में वेस्टइंडीज टीम का जो गुस्सा और ताकत दिखाई गई थी, वह उसी कहानी का अगला हिस्सा थी, जो चाचा सुनाया करते थे. गोरे शासकों के सामने न झुकने का वह कैरिबियाई आत्मसम्मान दरअसल सोबर्स की ही दी हुई जमीन पर खड़ा था.

सी.एल.आर. जेम्स ने अपनी किताब ‘बियॉन्ड ए बाउंड्री’ में सवाल पूछा था कि वे क्रिकेट के बारे में क्या जानते हैं, जो सिर्फ क्रिकेट जानते हैं. खेल को आप सामाजिक और राजनीतिक लड़ाइयों से अलग नहीं कर सकते. अगर फ्रैंक वोरेल वह रास्ता थे जिसने वेस्टइंडीज क्रिकेट को रंगभेद से बाहर निकाला, तो गैरी सोबर्स वह नायक थे जिन्होंने उस रास्ते पर चलकर पूरी दुनिया को जीत लिया.

बे लैंड का वह लड़का

गार्फील्ड सोबर्स की असल कहानी 28 जुलाई 1936 को बारबाडोस के एक बेहद गरीब मोहल्ले बे लैंड से शुरू होती है. उनका बचपन त्रासदियों के बीच बीता. वे दोनों हाथों में छह-छह उंगलियों के साथ पैदा हुए थे. बचपन में उन्होंने खुद एक तेज चाकू और तांत की मदद से उन अतिरिक्त उंगलियों को काटकर अलग कर दिया था. यह हकीकत किसी लोककथा जैसी लगती है. जब गैरी सिर्फ पांच साल के थे, उनके पिता की समुद्र में डूबने से मौत हो गई. इस हादसे ने परिवार को घोर गरीबी में धकेल दिया. लेकिन सोबर्स ने समुद्र तट पर ताड़ के पत्तों के बल्लों और तारकोल की गेंदों से क्रिकेट का ककहरा सीखकर अपने दुखों का इलाज ढूंढ लिया.

1954 में इंग्लैंड के खिलाफ जब उन्होंने पहला टेस्ट मैच खेला, तब वे नौवें नंबर पर उतरने वाले एक साधारण बाएं हाथ के स्पिनर थे. लेकिन अगले चार सालों के भीतर इस सीधे-सादे लड़के ने खुद को दुनिया के सबसे बड़े बल्लेबाज के रूप में परिवर्तित कर लिया. 1958 में सबीना पार्क में पाकिस्तान के घातक गेंदबाजों के सामने उन्होंने नाबाद 365 रनों की ऐतिहासिक पारी खेली. उन्होंने सर लेन हटन के उस रिकॉर्ड को ध्वस्त कर दिया जो सालों से अजेय माना जाता था. एक 21 साल के लड़के ने अपने पहले टेस्ट शतक को सीधे तिहरे शतक में बदल दिया था. यह रिकॉर्ड 36 साल तक कोई नहीं छू सका. आखिरकार 1994 में ब्रायन लारा ने इसे तोड़ा. यह देखना कितना सुखद था कि जब लारा एंटीगा में यह इतिहास रच रहे थे, तब सोबर्स खुद मैदान के किनारे मौजूद थे और उन्होंने बढ़कर अपने इस वारिस को गले से लगा लिया था.

विराट कोहली सर गैरी सोबर्स के साथ; अपने दौर में सुनील गावस्कर की संगत
विराट कोहली सर गैरी सोबर्स के साथ; अपने दौर में सुनील गावस्कर की संगत

अपने बीस साल के टेस्ट करियर में सोबर्स ने 93 मैचों में 57.78 के शानदार औसत से 8,032 रन बनाए, जिसमें 26 शतक और 30 अर्धशतक शामिल थे. एक गेंदबाज के रूप में उन्होंने 235 टेस्ट विकेट लिए और फील्डिंग में अपनी अद्भुत फुर्ती से 109 कैच लपके. प्रथम श्रेणी क्रिकेट में उन्होंने 383 मैचों में 28,000 से अधिक रन बनाए और 1,000 से ज्यादा विकेट झटके. यह किसी एक इंसान के बूते का नहीं, बल्कि एक मुकम्मल संस्था का ब्यौरा लगता है.

एक देह में पांच किरदार

लेकिन ये आंकड़े सोबर्स के खेल की उस जादुई खूबसूरती को दर्ज नहीं कर पाते जो मैदान पर घटती थी. सर डोनाल्ड ब्रैडमैन ने उन्हें पांच खिलाड़ियों के बराबर का अकेला क्रिकेटर और धरती का सबसे महान ऑलराउंडर माना था. यदि कोई वैज्ञानिक एक आदर्श क्रिकेटर का ढांचा तैयार करना चाहे, तो वह निश्चित रूप से गार्फील्ड सोबर्स जैसा ही दिखेगा.

बल्लेबाजी करते समय उनका बैक-लिफ्ट आसमान छूता था, उनका कवर ड्राइव कलात्मक अनुभव था और उनका हुक शॉट सबसे तेज गेंदबाजों का गुरूर तोड़ देता था. गेंदबाजी में वे किसी बहरूपिये की तरह थे. वे नई गेंद से आक्रामक तेज गेंदबाजी करते और उसे दोनों तरफ स्विंग कराते. गेंद पुरानी होते ही वे बाएं हाथ की पारंपरिक स्पिन या अपनी कलाई के जादू से चाइनामैन और गुगली फेंकने लगते थे. फील्डर के रूप में वे स्लिप और शॉर्ट-लेग पर किसी भूखे तेंदुए की तरह मुस्तैद रहते. उन्होंने क्रिकेट की तमाम मुश्किलों को बहुत आसान बना दिया था.

हमारी पुरानी पीढ़ी उन्हें इंग्लिश काउंटी क्रिकेट के चमत्कारों के लिए भी याद करती है. जब नॉटिंघमशायर ने 1968 में उन्हें कप्तान चुना, तो उन्होंने एक थकी हुई टीम में जीत का जज्बा भर दिया. अगस्त 1968 में स्वांसी के मैदान पर उन्होंने मैल्कम नैश के एक ओवर में लगातार छह छक्के लगाने का अनूठा रिकॉर्ड बनाया. हालांकि लोग इस ओवर की बात बार-बार करते थे, जिससे सोबर्स अपनी आखिरी उम्र में खिन्न हो जाते थे. उनका कहना था कि इस एक घटना के चक्कर में लोग उनकी उस दशकों की मेहनत को भूल जाते हैं, जो उन्होंने क्रिकेट की भव्य दुनिया को रचने में लगाई थी.

कप्तानी का बोझ और रोडेशिया का सच

सर फ्रैंक वोरेल के चले जाने के बाद सोबर्स ने 1965 में वेस्टइंडीज की कप्तानी संभाली. वे 1960-61 के ऑस्ट्रेलिया दौरे से ही टीम के मुख्य रणनीतिकार बन चुके थे. उस दौरे पर ब्रिस्बेन का ऐतिहासिक टाई टेस्ट खेला गया था, जिसमें सोबर्स ने 132 रनों की बेमिसाल पारी खेली थी. जब उन्होंने कमान संभाली, तब कैरेबियन क्रिकेट अपने सबसे नाजुक मोड़ पर था. बदलाव दस्तक दे रहा था. व्यक्तिगत सफलताएं तो मिलीं, लेकिन अलग-अलग द्वीपों के खिलाड़ियों के आंतरिक अंतर्विरोधों को संभालना आसान नहीं था. सोबर्स अपनी अंतःप्रेरणा से खेलते थे. वे अपने बाकी साथियों से भी उसी असाधारण प्रतिभा की उम्मीद करने लगते थे, जो उन्हें कुदरत से मिली थी. इसी वजह से क्रिकेट बोर्ड और कुछ खिलाड़ियों के साथ उनके रिश्तों में तनाव आया.

दुनिया के हर बड़े नायक की तरह सोबर्स भी गलतियों से मुक्त नहीं थे. 1970 में उन्होंने रंगभेदी शासन के दौरान रोडेशिया में एक मैच खेलने का निमंत्रण स्वीकार कर लिया. इस फैसले ने पूरे कैरिबियन और दुनिया भर के संगठनों में गहरी नाराजगी पैदा कर दी. एक पल के लिए लगा कि उनका पूरा नैतिक आभामंडल बिखर गया है. लेकिन सोबर्स ने कोई चालाकी नहीं दिखाई और अपने लोगों के दुख का सम्मान किया. उन्होंने इस भूल के लिए सार्वजनिक रूप से माफी मांगी और गहरा खेद व्यक्त किया. इसके बाद उन्होंने दक्षिण अफ्रीका से मिलने वाले तमाम आकर्षक प्रस्तावों को ठुकरा दिया. इस तरह उन्होंने दोबारा अपने लोगों के दिलों में अपनी जगह बनाई.

एक राष्ट्रीय नायक की सांझ

1974 में क्रिकेट से विदा लेने के बाद सोबर्स को दुनिया भर में सम्मान मिले. 1975 में महारानी एलिजाबेथ द्वितीय ने बारबाडोस के एक समुद्र तट पर उन्हें नाइटहुड की उपाधि दी. यह एक बेहद उल्लेखनीय दृश्य था, जहां पुराना साम्राज्य एक नए स्वतंत्र राष्ट्र के नायक का सम्मान कर रहा था. 1998 में बारबाडोस की संसद ने उन्हें देश के ग्यारह राष्ट्रीय नायकों में शामिल कर 'द राइट एक्सीलेंट' की उपाधि दी. वे लगभग तीन दशकों तक अपने देश के एकमात्र जीवित राष्ट्रीय नायक रहे.

अपने आखिरी सालों में, जब शरीर साथ नहीं दे रहा था, सोबर्स नियमित रूप से केंसिंग्टन ओवल के मैदान पर दिख जाते थे. उनके नाम पर बने पवेलियन में उन्हें चुपचाप बैठे देखना भावुक करने वाला था. वे उस दौर के गवाह थे जब क्रिकेट भारी बल्ले, निडर दिल और बिना किसी खौफ के खेला जाता था. उनके बेटे डैनियल सोबर्स ने बताया कि आखिरी वक्त में भी इस बूढ़े योद्धा ने बीमारी से अपनी चिरपरिचित जिजीविषा के साथ एक आखिरी लड़ाई लड़ी और फिर खामोशी से विदा हो गए.

सर गैरी सोबर्स के जाने के साथ ही क्रिकेट के इतिहास की एक बेमिसाल पारी का अंत हो गया है. आज का खेल फ्रेंचाइजी लीगों, तकनीकी आंकड़ों और अति-विशेषज्ञता के दौर में है. इस नए और बाजारू माहौल में सोबर्स जैसे बहुआयामी, स्वतंत्र और गहरे रूमानी जीनियस के लिए अब वैसी जगह नहीं बची है. हम फिर कभी किसी एक इंसान को एक साथ दुनिया का सबसे बेहतरीन बल्लेबाज, तीन अलग-अलग शैलियों का गेंदबाज और मैदान का सबसे फुर्तीला फील्डर बनते नहीं देख पाएंगे.

सोबर्स उस दौर के नायक थे जब क्रिकेट का मतलब सिर्फ रन बटोरना नहीं था, बल्कि आम लोगों की गरिमा और पहचान की लड़ाई लड़ना था. उनके आंकड़े भले ही कल कोई पार कर ले, लेकिन खेल को लेकर उनकी जो भव्य कल्पनाशीलता थी, उसे छू पाना नामुमकिन होगा. कैरिबियन ने अपना आखिरी मिथक खो दिया है. क्रिकेट ने अपना सबसे मुकम्मल चेहरा और इतिहास ने अपने सबसे चमकदार नक्षत्र को विदा कर दिया है.

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