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12 साल पहले ‘गायब’ हुई मूर्ति मिलने पर क्यों जश्न मना रहा कोलकाता?

शानू लाहिड़ी की बनाई विशाल मूर्ति ‘परोमा’ 12 साल पहले कोलकाता के एक प्रमुख चौराहे से हटा दी गई थी. अब इसके फिर मिलने से दुर्गा पूजा के जरिए कलाकार की कला और विरासत को याद करने का मौका मिला है

भवानीपुर अबसार में इस साल की दुर्गा प्रतिमा; इसके आसपास शानू लाहिड़ी की बनाई प्रतिमाओं की प्रतिकृतियां
अपडेटेड 13 अक्टूबर , 2026

कोलकाता की सार्वजनिक कला की प्रथम महिला कही जाने वाली शानू लाहिड़ी के निधन के 13 साल बाद उनकी कला की एक तरह से फिर खोज हो रही है. शहर में दुर्गा पूजा की तैयारियों के बीच एक मोहल्ले का पूजा आयोजन इस कलाकार और उनके असाधारण कला संसार को सामने ला रहा है. 

इसी बीच लाहिड़ी की सबसे चर्चित कृतियों में से एक जो शहर के एक प्रमुख चौराहे से गायब हो गई थी, 12 साल तक लोगों की नजरों से दूर रहने के बाद फिर सामने आई है. इन दोनों घटनाओं ने लाहिड़ी की कलात्मक विरासत को फिर चर्चा में ला दिया है. साथ ही इस सवाल पर भी बहस शुरू हुई है कि ऐसे शहर में सार्वजनिक कला की क्या जगह है जहां बदलती राजनीतिक सरकारों के साथ कई पहचान बन चुके स्थलों का स्वरूप बदल दिया गया, उन्हें हटा दिया गया या लोग उन्हें भूल गए.

भवानीपुर अबसर सार्वजनिक दुर्गा पूजा में शानू की कृति ‘परोमा’ को दोबारा बनाकर उन्हें श्रद्धांजलि दी जाएगी. यह विशाल मूर्ति कभी ईस्टर्न मेट्रोपॉलिटन बाइपास पर साइंस सिटी चौराहे पर खड़ी थी. लाहिड़ी की परिकल्पना पर बनी इस मूर्ति को उन्होंने दूसरे कलाकारों के साथ मिलकर तैयार किया था. 24 नवंबर, 2014 की रात तृणमूल कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में इसे तोड़कर हटा दिया गया था.

शानू लाहिड़ी की बनाई गई 'परोमा' का चेहरा
शानू लाहिड़ी की बनाई गई 'परोमा' का चेहरा

इस मूर्ति के गायब होने से शहर के लोग हैरान थे कि उनकी जानी-पहचानी पहचान अचानक कैसे गायब हो सकती है. हालांकि कोलकाता के ज्यादातर लोगों को पता नहीं था कि यह मूर्ति बच गई थी. कोलकाता के चीनी समुदाय के सदस्य और कला प्रेमी हुई हाओ हॉवर्ड ली को यह पूर्वी कोलकाता वेटलैंड्स इलाके के चौबागा में फेंकी हुई मिली. उन्होंने इसे बचाया और टांगरा में ली परिवार की पुरानी चमड़ा फैक्ट्री में रख लिया.

ली याद करते हैं, "2014 में जब मुझे पता चला कि मूर्ति हटा दी गई है तब मैं टूट गया था. शानू दी के निधन को अभी एक साल ही हुआ था." वे आगे कहते हैं, "जब मैं इसका कुछ हिस्सा बचा पाया तो मैंने भगवान का शुक्रिया अदा किया."

जिस रात गायब हो गई ‘परोमा’

1987 में स्थापित ‘परोमा’ ईस्टर्न मेट्रोपॉलिटन बाइपास के एक प्रमुख गोलचक्कर पर इतनी मशहूर हो गई थी कि उस चौराहे को ही परोमा आइलैंड कहा जाने लगा. करीब 31 फीट ऊंची यह मूर्ति कोलकाता के शहरी लैंडस्केप की एक अलग पहचान थी. रोजमर्रा के काम से आने-जाने वाले लोग इसे देखते थे.

लेकिन 24 नवंबर, 2014 की रात इसे तोड़कर हटा दिया गया. सुबह तक वहां सिर्फ मलबा बचा था. अचानक इस तरह गायब हुई मूर्ति को लेकर सवाल उठे कि इतनी बड़ी कलाकृति को बिना कोई निशान छोड़े कैसे हटा दिया गया. 

बाद में एक न्यूज रिपोर्ट में इस कार्रवाई के लिए कोलकाता महानगर विकास प्राधिकरण (KMDA) को जिम्मेदार बताया गया. आरोप था कि प्राधिकरण ने तत्कालीन तृणमूल कांग्रेस सरकार में मंत्री रहे फिरहाद हकीम के निर्देश पर यह कार्रवाई की थी. हकीम बाद में कोलकाता के मेयर बने. रिपोर्ट के मुताबिक हकीम ने कहा था कि मूर्ति को दूसरी जगह ले जाया जा रहा था और गलती से टूट गई.

हुई हाओ हॉवर्ड ली के बचपन की फोटो, जब वे 'परोमा' के सामने खड़े थे
हुई हाओ हॉवर्ड ली के बचपन की फोटो, जब वे 'परोमा' के सामने खड़े थे

इस सफाई से कोलकाता के कला जगत की बेचैनी दूर नहीं हुई. ‘परोमा’ को हटाए जाने के कुछ ही समय बाद उस चौराहे पर बंगाली अक्षर ''  वाला एक विशाल धातु का ग्लोब लगा दिया गया. यह तृणमूल कांग्रेस सरकार की विश्व बांग्ला ब्रांडिंग से जुड़ा था. इस बदलाव ने साझा सार्वजनिक पहचान के रूप में बनाई गई एक कलाकृति और सरकार से जुड़ी एक स्थापना के बीच अंतर को और स्पष्ट कर दिया.

कला जगत के लिए इस कृति का खोना अस्वीकार्य था. सार्वजनिक कला के रूप में परोमा इस कोशिश का प्रतीक थी कि कला को दीर्घाओं और संग्रहालयों से बाहर निकालकर लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बनाया जाए. लेकिन जब कोलकाता के लोग यह सोच रहे थे कि मूर्ति का क्या हुआ, तब तक वह बचाई जा चुकी थी.

संयोग से मिली मूर्ति

मूर्ति को बचाने की कहानी पूर्वी कोलकाता वेटलैंड्स इलाके के चौबागा स्थित एक चीनी मंदिर की यात्रा से शुरू हुई. ली की सास यू जुंग यांग मंदिर जाने के लिए इस इलाके में गई थीं. वहां उन्हें फेंकी हुई मूर्ति जैसी कोई चीज दिखाई दी. उन्होंने ली को इसकी जानकारी दी. ली उसे खुद देखने के लिए तुरंत चौबागा पहुंचे.

वहां उन्होंने उस जानी-पहचानी मूर्ति को जमीन पर पड़ा देखा. पास ही कुछ स्थानीय लड़के खेल रहे थे. जब उन लड़कों ने फेंके गए हिस्सों पर अपना हक जताने की कोशिश की तो ली ने मूर्ति को अपने पास रखने के लिए उन्हें कुछ पैसे दिए. फिर उसे सुरक्षित रखने के लिए एक ट्रक से ली परिवार की पुरानी चमड़ा फैक्ट्री पहुंचाने का इंतजाम किया.

ली याद करते हैं, "मैं बहुत खुश था और मुझे राहत मिली थी. मैंने भगवान का शुक्रिया अदा किया कि मूर्ति का जो भी हिस्सा बचा था, मैं उसे बचा सका. मैंने लड़कों से बाकी हिस्सों को भी ढूंढने के लिए कहा."

मूर्ति को काफी नुकसान पहुंचा था. इसके बचे हुए हिस्से की निचली तरफ से करीब पांच फीट का हिस्सा गायब था. इस वजह से वह अब सीधी खड़ी नहीं हो सकती थी. मूल मूर्ति ईंट और गारे से बने करीब 14 फीट ऊंचे चबूतरे पर स्थापित थी. चबूतरे को तोड़ा जा सकता था, लेकिन फाइबरग्लास से बनी मूर्ति बच गई थी.

हुई हाओ हॉवर्ड ली और उनकी फैक्ट्री में रखी मूर्ति
हुई हाओ हॉवर्ड ली और उनकी फैक्ट्री में रखी मूर्ति

ली मूर्ति को अपनी पुरानी चमड़ा फैक्ट्री ले आए और इमारत के विशाल फर्श पर रख दिया. करीब 12 साल तक उन्हें इसके बारे में सार्वजनिक रूप से बात करने की हिम्मत नहीं हुई. उनके करीबी लोगों में से कुछ को ही इसके बारे में पता था. हाल ही में इसकी मौजूदगी की खबर कला जगत के बड़े दायरे तक पहुंचनी शुरू हुई.

टांगरा में पले-बढ़े ली का मूर्ति से निजी जुड़ाव था. लाहिड़ी की कलात्मक सोच के बारे में जानने से बहुत पहले ही वे इससे परिचित थे. उनके पास बचपन की एक तस्वीर भी है जिसमें वे ‘परोमा’ के सामने खड़े हैं. उस समय मूर्ति बनाई जा रही थी. ली ने बताया था, "हमारे पास मूर्ति पर खिंचवाई गई तस्वीरें थीं." उन्हें याद है कि बचपन में वे और उनके भाई मूर्ति के घुमावदार आधार पर चढ़ जाया करते थे.

ली को पता था कि उन्होंने कितनी अहम चीज बचाई है. उन्होंने अपने दोस्त रीना कटारिया के दिवंगत पिता दिलीप ठक्कर के बारे में भी सुना था, जिन्होंने लाहिड़ी की एक पेंटिंग प्रदर्शित की हुई थी. ‘परोमा’ से उनका लगाव इस वजह से भी था कि वे उसके साथ बड़े हुए थे.

‘परोमा’ की बरामदगी से कोलकाता की सांस्कृतिक स्मृतियों का एक खोया हुआ हिस्सा वापस सामने आया है. हाल ही में ली की मुलाकात लाहिड़ी की बेटी दमयंती से हुई. यह मुलाकात उनकी पत्नी मिमी की दोस्त मलिका जालान के जरिए हुई. 

दमयंती ली की चमड़ा फैक्ट्री पहुंचीं ताकि देख सकें कि यह वास्तव में ‘परोमा’ ही है या नहीं. वहां पहुंचकर वह भावुक हो गईं. दमयंती कहती हैं, "वह पल किसी सपने जैसा था. मेरे रोंगटे खड़े हो गए थे."

शानू लाहिड़ी की वापसी

अब दुर्गा पूजा के मौके पर लाहिड़ी की कला से एक बार फिर लोगों का सामना होगा. इस बार जोर सिर्फ ‘परोमा’ को याद करने पर नहीं बल्कि लोगों की जिंदगी में कला को शामिल करने की उनकी व्यापक सोच को सामने लाने पर भी होगा.

साल 1996 के दौरान बाकुलबागान में एक मूर्ति के निर्माण में जुटीं शानू लाहिड़ी
साल 1996 के दौरान बाकुलबागान में एक मूर्ति के निर्माण में जुटीं शानू लाहिड़ी

भवानीपुर अबसर में तीन सदस्यों का समूह ‘थिंकर्स’ पूजा की कलात्मक थीम पर काम कर रहा है. समूह के सदस्य शुभ्रोदीप पाल बताते हैं कि भवानीपुर इलाके में लाहिड़ी की अहम कलात्मक पहचान थी. इसलिए उन्हें थीम के लिए चुनना स्वाभाविक था. पाल के साथ सोमनाथ सील और ऑरित्र मुखर्जी भी काम कर रहे हैं. दुर्गा की प्रतिमा अरिघ्ना साहा बना रहे हैं जो थिंकर्स के साथ काम करते हैं.

पाल कहते हैं, "शानू लाहिड़ी और उनके काम का दायरा इतना बड़ा है कि उसे पूरी तरह समेटना संभव नहीं है. लेकिन हमने कोशिश की है." यह श्रद्धांजलि एक दूसरे मोहल्ले की दुर्गा पूजा से लाहिड़ी के जुड़ाव को भी याद करती है. 1982 और 1996 में उन्होंने कालीघाट-भवानीपुर इलाके के बाकुलबागान सार्वजनिक दुर्गा पूजा में दुर्गा प्रतिमा पर काम किया था. 

इस तरह, मोहल्ले की दृश्य कला संस्कृति में उनका योगदान सिर्फ अलग-अलग मूर्तियों और भित्ति चित्रों तक सीमित नहीं था. उन्होंने कोलकाता की उन मौसमी कलात्मक परंपराओं में भी योगदान दिया जो शहर की सांस्कृतिक जिंदगी को जीवंत बनाती हैं.

अबसर पूजा का मुख्य आकर्षण ‘परोमा’ की प्रतिकृति होगी. यह करीब 18 फीट ऊंची होगी. मूल मूर्ति से छोटी होने के बावजूद इसे उसकी विशिष्ट उपस्थिति का एहसास कराने के लिए बनाया जा रहा है. इसके साथ लक्ष्मी, सरस्वती, गणेश और कार्तिक की प्रतिमाएं भी होंगी. ये 3D प्रतिकृतियां होंगी और 1982 की बाकुलबागान पूजा के लिए लाहिड़ी द्वारा बनाई गई सहायक आकृतियों जैसी दिखेंगी.

पाल बताते हैं कि समूह ने सार्वजनिक कला में युवा कलाकारों को शामिल करने और उनके काम के जरिए उन्हें आजीविका कमाने में मदद करने के बारे में लाहिड़ी के विचारों का अध्ययन किया है. समूह ने कोलकाता की दुर्गा पूजा पर उनके विचारों को भी समझने की कोशिश की है. दुर्गा पूजा शहर की ऐसी सांस्कृतिक परंपरा है, जहां लंबे समय से कलात्मक प्रयोगों को सार्वजनिक मंच मिलता रहा है.

इस श्रद्धांजलि का मकसद लाहिड़ी की कला के पीछे की सोच को फिर सामने लाना भी है. वे सार्वजनिक जगहों को ऐसी जगहों के रूप में देखती थीं जहां लोग बिना किसी औपचारिक परिचय या कला दीर्घा की सीमाओं के स्वाभाविक रूप से कला से जुड़ सकें.

लाहिड़ी की सोच मूल ‘परोमा’ में भी दिखाई देती थी. यह मूर्ति बंगाल की लोक कला में प्रचलित ‘दीवाली पुतुल’ नाम की आकृति से प्रेरित थी. इसमें एक महिला या मां की छवि को दीपक के साथ दिखाया जाता है. 

मूर्ति एक ऐसी रक्षक आकृति का प्रतीक थी जो रोशनी लेकर चलती है. इसकी लोकप्रियता की एक वजह यह भी थी कि यह लोगों के जीवन का हिस्सा बन गई थी. बच्चे इसके आधार पर चढ़ते थे पक्षी इस पर घोंसले बनाते थे और आने-जाने वाली कई पीढ़ियों के लिए यह शहर की पहचान बन गई थी.

इस परियोजना के लिए बोरोलीन बनाने वाली कंपनी जी.डी. फार्मास्युटिकल्स ने पैसा दिया था. यह सरकारी धन से बनाए गए स्मारक के बजाय आपसी सहयोग से तैयार सार्वजनिक कला का उदाहरण थी. 

इस इतिहास के कारण मूर्ति का गायब होना और फिर उसका मिलना खास तौर पर भावुक करने वाला है. आगामी दुर्गा पूजा इस स्मृति को अधिक लोगों तक पहुंचाने का अवसर भी देगी. दमयंती के 13 अक्टूबर को ली और उनकी पत्नी के साथ अबसर पूजा में आने की उम्मीद है.

भवानीपुर में ‘परोमा’ नए रूप में लौट रही है. इसके साथ लाहिड़ी की विरासत भी शहर में अपनी जगह फिर बना रही है. एक बचाई गई मूर्ति, दुर्गा पूजा के पंडाल और कोलकाता की कला को याद रखने के तरीके पर नए सिरे से शुरू हुई चर्चा के जरिए यह विरासत सामने आ रही है. लेकिन मूल ‘परोमा’ का अब क्या होगा?

दमयंती का मानना है कि ‘परोमा’ सार्वजनिक कला है इसलिए उसके भविष्य पर शहर के लोगों को चर्चा करनी चाहिए. वे कहती हैं, "मेरे वकीलों ने मुझे बताया था कि इस पर मेरे कुछ बौद्धिक संपदा अधिकार हो सकते हैं. लेकिन मैंने इस मामले को आगे नहीं बढ़ाया. लोगों को सोचना चाहिए कि परोमा या किसी भी सार्वजनिक कला के साथ क्या किया जाना चाहिए."

ली का मानना है कि परोमा को शहर के किसी प्रमुख चौराहे पर फिर से स्थापित किया जाना चाहिए. हालांकि इसके लिए उन्हें इस बात की गारंटी चाहिए कि इसे दोबारा नष्ट नहीं किया जाएगा.

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