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जोगेन चौधरी : बंगाल शैली का उत्तर राग

भारतीय आधुनिक कला के विशिष्ट चित्रकार जोगेन चौधरी का 25 अक्टूबर को निधन हो गया. उनकी आकृतियां अपने समय, स्थान और पहचान से मुक्त होकर भी अपने भीतर समय की बेचैनी और दबाव को दर्ज करती हैं

जोगेन चौधरी
जोगेन चौधरी (फाइल फोटो- इंडिया टुडे समूह)
अपडेटेड 26 अक्टूबर , 2026

पूर्ण चित्रकार, कुछ कवि और राज्यसभा के सदस्य रहे जोगेन चौधरी की उकेरी सघन रेखाओं में मनुष्य की स्थिति, उस पर पड़ने वाले दबाव और मनुष्यों के बीच का अलगाव दिखाई देता है. देश-काल से मुक्त उनकी आकृतियां भावावेग के साथ एक बौद्धिक तनाव रचती हैं. अपनी कला में परम्परा से सर्जनात्मक संवाद करने और आधुनिकता का अपना विशिष्ट रूप रचने वाले जोगेन चौधरी के कला-संसार और व्यक्तित्व को समझने के लिए पढ़िए कवि-आलोचक-संस्कृतिकर्मी अशोक वाजपेयी से पीयूष दईया की बातचीत के संपादित अंश ः

जोगेन चौधरी, एक तरह से, बंगाल शैली के उत्तर राग हैं—इस अर्थ में कि वे बांग्ला ललित कला में विकसित हुई गीतात्मक किस्म की रेखा व लालित्य को बीहड़ साधारण रूपों की ओर ले गये. उनके बहुत सारे पोट्रेटनुमा चित्र जिन व्यक्तियों के हैं, उनकी देहाकृतियां विचित्र हैं. कई बार वे विचित्र बनायी गयी हैं और कई बार अपने आप में विचित्र हैं. एक तरह का बीहड़पन है—साधारण मनुष्यों की देहयष्टि कैसे अलग-अलग किस्म की होती है और कैसे उसमें इसी कारण एक विशिष्ट किस्म की चारित्रिकता भी आती है—वक्राकार से और लिपटे हुए से, यकायक कहीं बहुत ही थुलथुल शरीर हैं, लेकिन उसमें एक अजब किस्म की नमनीयता भी है.

इसका मतलब यह भी है कि वह साधारण मनुष्यों की आकृतियों, उनकी देहयष्टि के कारण बनती रहती हैं : इसकी बड़ी पकड़ जोगेन को रही है—यह उनका बहुत सूक्ष्मावलोकन रहा है; उन्होंने इसमें महारथ हासिल की है.

फोटो : इंडिया टुडे समूह

अपने समय की एक चित्रगाथा

जोगेन के यहां चेहरों और मानवाकृतियों की बहुलता, एक तरह से, अपने समय की एक चित्रगाथा जैसी है—वह कोई कहानी नहीं कह रहे हैं, हरेक कहानी अपने आप बन रही है. ऐसी आकृतियां—पुरुष, स्त्रियां, अधिक अतिरंजित शरीर वाली स्त्रियां, अतिरंजित शरीर वाले सेठ-साहूकार भी नजर आते हैं—तरह-तरह से सब मिलकर एक तरह की गाथा बनती है, जिसमें इस अर्थ में कहानी नहीं है कि अमुक के बाद ये हुआ, उसके बाद ये हुआ.

कहानी इस अर्थ में है कि ये पात्र मौजूद हैं और सिलसिला चलता रहता है. वे इतने सारे हैं—और यह दिलचस्प है—लेकिन उनको एक साथ देखने से कभी ऊब नहीं होती है, कि लगे कि ये तो वही-वही है.

रेखा पर इसरार

वह बारीकियां पैदा करते हैं, और रेखाओं का बहुत सघन ढंग से इस्तेमाल करते हैं. रूपाकारों के अन्दर की बारीकियां कई तरह से अलग-अलग ढंग की होती हैं. वह किसी तरह के रंग के इसरार के चित्रकार नहीं हैं, वह रेखा के इसरार के चित्रकार हैं. इस अर्थ में वह अपने समवयसियों और समकालीनों से अलग हैं कि उनके यहां रेखा लगभग केंद्रीय है.

चित्रगाथा और बौद्धिक समझ

जोगेन के चित्रों के सारे विषय, चेहरे और शरीर अज्ञातकुलशील हैं—इस अर्थ में कि इनमें से किसी के नाम का कोई पता नहीं है, न उनके स्थान का कोई पता है. वे ऐसे चित्र हैं जो अपने को देश-काल के संदर्भ से मुक्त रखते हैं. इस अर्थ में वे कहीं भी हो सकते हैं, कभी भी हो सकते हैं. सिवाय इसके कि जब वे वेशभूषा इत्यादि को भी चित्रित करते हैं, तब यह समझ में आता है कि ये भारतीय हैं—ये बंगाल के हैं या जहां के भी हैं. सिर्फ इस अर्थ में थोड़ी स्थानीयता है, लेकिन बाकी वे कहां रहते हैं, क्या करते हैं, कौन हैं, इसका कुछ अता-पता नहीं है.

एक अर्थ में यह भी कहा जा सकता है कि यह ऐसी चित्रगाथा है जो देश-काल मुक्त गाथा है—इस अर्थ में वह अनोखी है, क्योंकि ज्यादातर गाथाएं प्रथमतः और अन्ततः देश-काल में ही अवस्थित होती हैं, उसी से उनकी पहचान बनती है. जोगेन के यहां उससे बिल्कुल अलग कुछ हो रहा है.

उनकी आकृतियों में एक तरह की मरोड़ है, लेकिन यह अपने आप स्वतःस्फूर्त ढंग से नहीं हुआ है. कुछ न कुछ बाहर ऐसा है जो शरीर के बाहर है, जो उस आकृति के बाहर है, जिसके दबाव में ऐसा हुआ है. इसलिए वह दबाव सोचना और याद करना होगा—इस अर्थ में वह एक तरह का संदर्भ बन जायेगा.

उसको सिर्फ भावना कहना सम्भवतः पर्याप्त नहीं होगा—भावावेग है, लेकिन वह भावावेग पूरी तरह से एक तरह के बौद्धिक तनाव से मुक्त या अलग नहीं है. इस अर्थ में कि मनुष्य की स्थिति—ह्यूमन कंडीशन—में मनुष्य कितने तरह के दबावों से रूपाकृत, विकृत, विद्रूप और सुरूप होता रहता है : यह उनके चित्रों का एक दूसरा पक्ष है. इसलिए इसको सिर्फ भाव-दशा कहना उचित नहीं होगा, इसमें बौद्धिक समझ भी भूमिका निभा रही है.

फोटो : इंडिया टुडे समूह

आधुनिक चरित्र

कभी-कभी जब जोगेन चौधरी ने अपने दूसरे किस्म के चित्र बनाये हैं, तो काले रंग का बहुत प्रयोग किया है. उनके यहां रंग उतने ही जरूरी हैं जितना उस आकृति या रूपाकार को कुछेक उभार-सा देने, कैनवस पर उभार-सा देने के लिए, जरूरी हो. बाकी वह एक धूसर संसार को देख पाते हैं.

यह भी कह सकते हैं कि उन्होंने जानबूझकर अपनी कला-दृष्टि में यह तय किया है कि यह संसार जितना रंगों से बना है उतना ही धूसरता भी उसमें है—वह उनका ज्यादा बड़ा लक्ष्य है बजाय दुनिया के रंग-बिरंगेपन के. जो कि हुसेन से बिल्कुल उलट है. हुसेन के यहां रंगारंग दुनिया है.

दूसरी तरफ, यह उन्हें नसरीन मोहम्मदी जैसी रेखाओं के निकट ले जाते हैं. एक अर्थ में हम यह कह सकते हैं कि जोगेन अलगाव के चित्रकार हैं—मनुष्यों के बीच के सहकार, सान्निध्य या पड़ोसीपन के नहीं, बल्कि उनके बीच के अलगाव के चित्रकार हैं. यह उनकी कला को आधुनिक चरित्र प्रदान करता है. इसीलिए वह संदर्भ नहीं देते हैं—जिसके लिए मैंने पहले कहा था कि वह देश और काल से मुक्त रखते हैं.

देश-काल से मुक्त रखने का भाव भी एक तरह के अलगाव की ही अभिव्यक्ति है, कि मनुष्य का जो कुछ होता है—मनुष्य की स्थिति और मनुष्याकृतियों का—उसका सब कुछ अनिवार्यतः देश-काल से जुड़ा हुआ नहीं होता, उसमें कुछ न कुछ जरूर ऐसा है जो इससे अलग होता है और यह अलग जो है, यह जो अलगाव है, जैसे कि वही जोगेन चौधरी का लक्ष्य है.

परम्परा से सर्जनात्मक संवाद

ललित कला में भारतीय आधुनिकता ने अपने सबसे सघन और सबसे श्रेष्ठ क्षणों में एक तरह की बद्धमूलता अर्जित की है—उससे अपने को प्रामाणिक बनाया है और तथाकथित वर्चस्वशाली पश्चिमी कला से अलग भी किया है.

आधुनिक कलाकारों ने लघुचित्र कला या बंगाल की लोक शैलियों या किन्हीं और रूपों से भी अपने को समृद्ध किया है—यह सिर्फ नवाचार की जिद में किया गया उद्यम नहीं है, उसकी कोई गहरी जरूरत है—इस बहुत ही उच्छल आधुनिकता को जैसे थोड़े ठहराव की जरूरत है, अपने सारे अलगावों के बावजूद उसको कुछ लगाव की जरूरत है—वह जरूरत, ठहराव और लगाव अपनी परम्परा से ही मिल सकता है.

इसके कारण, अपनी परम्परा से सर्जनात्मक संवाद कर पाने के कारण, ललित कला की आधुनिकता सत्यापित भी होती है. जैसे, जोगेन की कला भी.

अब यह विचित्र बात है कि आम दर्शकों की और परम्परा की हमारी पहचान बहुत ही सतही है कि हम एक तरह के यथार्थवादी चित्रण को ही अपनी परम्परा मान बैठे हैं. चूंकि परम्परा की पहचान ही सतही है, आधुनिक कला के प्रति हमारी प्रतिक्रिया भी सतही होती है—अक्सर यह देखने-सुनने को मिलता है कि यह हमारी समझ में नहीं आता, यह हमारी परम्परा में नहीं है, यह सिर्फ नकल है.

इस पर कुछ लोगों ने इसरार किया है, जिनमें रजा भी थे, जो इस पर बराबर जोर देते रहे कि भारतीय आधुनिकता, पश्चिमी आधुनिकता से अलग, एक दूसरे किस्म की आधुनिकता है—आधुनिकता के कुछ सार्वभौम पक्ष व गुण उसमें हैं, लेकिन ऐसी चीजें भी हैं जो कि उसको पश्चिम से अलग करतीं और विशिष्ट बनाती हैं.

फोटो : इंडिया टुडे समूह

रिल्के की याद

मेरे ख्याल से आम पश्चिमी दर्शक भी चित्र को देखकर यह समझ सकेगा कि ये एक विशिष्ट परम्परा से आये चित्र हैं. हमारे श्रेष्ठ चित्रकारों पर यह लागू होगा. रंग लगाने के तरीक़े में, विषय-वस्तु में, अन्तर्वस्तु में, इन सबमें सांस्कृतिक विशिष्टता है, जो हम प्रायः अलक्षित करते हैं क्योंकि वह हमको हस्बेमामूल जान पड़ती है, उसको अलग से देखना हमारे लिए जरूरी नहीं है, अक्सर वैसा करते भी नहीं हैं. लेकिन जब कोई विदेशी देखता है तब वह पहचान लेता है.

जैसे, मुझे अपनी कविताओं के विदेशी भाषाओं में अनुवाद कई बार सुनने का मौक़ा मिला और उसके बाद लोगों ने जो टिप्पणियां कीं, लगभग उन सबमें, यह था कि यह भारतीय कविता है, कि भारत का कवि ही ऐसे कह सकता है. यह समझ है, कि कुछ है ऐसा. लेकिन वह हमारी समझ में नहीं आता कि ‘हम किस अर्थ में भारतीय हैं?’ हमको समझने की जरूरत ही नहीं है—हम भारतीय हैं सो हैं, उसका बौद्धिक विवेचन (विश्लेषण) क्यों करें.

कई बार प्रतिक्रिया ऐसी भी हो सकती है, जैसे, क्राकॉ में मेरा पोलिश लेखक संघ में एक ‘मेटाफौरी’ नाम के एक छोटे-से संग्रह का लोकार्पण हुआ. रेनाता चेकालस्का ने मेरी कविताओं का पोलिश में अनुवाद किया था. मैंने उसमें से कुछ कविताएं पढ़ीं फिर पोलिश अनुवाद पढ़ा गया.

अध्यक्ष ने अपनी टिप्पणी में कहा कि ये कविताएं लगतीं तो बहुत भारतीय हैं, लेकिन रिल्के की याद भी दिलाती हैं. अब यह बात किसी और ने कभी नहीं कही. वे दोनों बातें एक साथ थीं. मैं इससे थोड़ा चकित भी हुआ. मैंने रेनाता से पूछा. उन्होंने कहा, ‘‘उन्होंने बिल्कुल ठीक कहा. तुम पर रिल्के का प्रभाव है. दूसरी तरफ, उस प्रभाव के बावजूद तुम्हारी कविताएं भारतीय हैं.’’ 

रेनाता चेकालस्का ने फिर मेरी कविताओं पर एक पूरी पुस्तक ही लिखी, जो एक तरह से उसी का विस्तार है. यह याद रखना चाहिए कि हमारी आधुनिकता, एक अर्थ में, ज्यादा समावेशी आधुनिकता है. हमने पश्चिम को भी, एक तरह से, अपना उत्तराधिकार माना है और अपनी विशिष्ट परम्परा को भी. दोनों के किसी संयोजन व संगुम्फन से हमारी संस्कृति-विशिष्ट आधुनिकता विकसित हुई है.

फोटो : इंडिया टुडे समूह

राज्यसभा सदस्य की भूमिका में

जोगेन चौधरी राज्यसभा के सदस्य रहे, हुसेन और कुछ दूसरे कलाकार-लेखक भी. वहां उनमें से लगभग कोई भी अपना प्रभाव नहीं छोड़ सका, तो इसके पीछे कुछ कारण हैं. राज्यसभा के नामजद सदस्यों को बोलने का समय बहुत कम मिलता है, क्योंकि समय का बंटवारा होता है. राज्यसभा में भी बोलने के समय का बंटवारा इस पर टिका होता है कि सम्बन्धित पार्टी के कितने सदस्य हैं—वह पार्टी के अनुसार होता है. इनकी तो कोई पार्टी होती नहीं, इसलिए, यह एक बड़ा भारी व संरचनात्मक कारण है.

दूसरा, इन कलाकारों को संसद में होने के कारण सार्वजनिक जीवन में बोलने का अधिक मौक़ा मिल सकता था. अगर वे किसी विषय पर कुछ बोलना चाहते हैं, जिसके लिए उनको, मान लीजिए, राज्यसभा में समय नहीं मिल रहा है या उनकी बात अनसुनी जा रही है तो वे बाहर प्रेस क्लब में एक प्रेस कान्फ्रेंस बुला सकते हैं कि जोगेन चौधरी, राज्यसभा सदस्य ने अपनी बात रखने के लिए बुलाया है, तो लोग आएंगे और सुनेंगे.

उनके लिए मीडिया भी प्रस्तुत रहता है. लेकिन, दुर्भाग्य से, ऐसा किसी ने नहीं किया. शायद इसका कारण यह है कि जिस तरह का राजनैतिक माहौल बना है, उसमें राजनीति के अलावा किसी और चीज की बात की ही नहीं जा सकती. दूसरी बात यह है कि इन सबकी (कलाकारों की) राजनीतिक दृष्टि—अगर कोई है—कभी बहुत स्पष्ट नहीं हुई कि क्या है.

उनकी कला-दृष्टि ही, एक तरह से, राजनैतिक दृष्टि भी है. चार-पांच सदस्य होते हैं—अब धीरे-धीरे उनकी संख्या बहुत घट रही है—चूंकि उनको किसी एक विशेष सत्ता के दौरान नामजद किया गया है—जिस पार्टी की सरकार होती है—उसके प्रति कुछ अकारण चुप रहकर, एक तरह की, वफादारी निभाते हैं. जबकि इसका इस्तेमाल आखिरकार उनके लिए क्या होने वाला है—राज्यसभा की सदस्यता के बाद ऐसा क्या होने वाला है? और राज्यसभा के सदस्य होने के कारण उनकी कला को कोई विशेष लाभ मिला हो, ऐसा भी नहीं होता.

ऐसा भी नहीं होता कि इन लोगों को उसकी जरूरत है! जोगेन चौधरी एक मान्य कलाकार हैं : उनको राज्यसभा की वजह से कोई खास अवसर नहीं मिला, न हुसेन को मिला. हां, सोनल मानसिंह को मिला होगा क्योंकि वह इस मामले में ज्यादा स्वार्थी हैं, राजनीति का लाभ लेने में अधिक सक्रिय हैं.

बुद्ध ने कहा था, अज्ञान अक्षम्य पाप है. अगर नामजद कलाकार यह कहते हैं कि हमको समझ में नहीं आता, कुछ पता नहीं है—फिर आप राज्यसभा के सदस्य क्यों बने? अगर आपको राजनीतिक ढांचा पता नहीं है, और ऐसे वक्त पर जब राजनीतिक घमासान इतना निर्णायक है, आप चुप हैं या निष्क्रिय हैं? राज्यसभा में भी निष्क्रिय हैं और अपनी सदस्यता का जो उपयोग बाहर कर सकते थे, वह करने का भी आपने कभी सोचा नहीं.

सरकार से पोषित हमारी कला सम्बन्धी सार्वजनिक संस्थाओं की क्या हालत है, इसी पर—संसद के बाहर—एक बयान दे देते, पर ऐसा किसी ने नहीं किया.

फोटो : इंडिया टुडे समूह

कविता

मैंने जोगेन के लेख और उनकी कुछ कविताएं पढ़ी हैं. चित्रकारों ने दो किस्म से कविताएं लिखी हैं; और किस्म की भी हो सकती हैं. पिकासो की कविताएं बेहद जटिल उलझाव की कविताएं हैं और शिल्प के स्तर पर बड़ा नवाचार है. पिकासो अपनी कविता में भी वही करना चाहते हैं जो वह करीब-करीब अपनी कला में करते हैं.

दूसरी तरह के कलाकार अपनी कविता में वह करने का प्रयास करते हैं जो वे कला में नहीं कर पाये या नहीं कर सके. जोगेन चौधरी इस दूसरी कोटि के कवि हैं. वह जो कला में करते हैं उससे अलग कविता में करते हैं. यह मुझे थोड़ा निराश करता है. अपनी कला में लालित्य और बीहड़ को जोड़ने का जो हुनर उनके पास है, वह उनकी कविता में नहीं है.

बांग्ला परिवेश

जोगेन चौधरी बंगाली हैं—अपने व्यवहार और पहनावे-पोशाक में भी. इस मामले में बंगाली कलाकारों की तारीफ करनी चाहिए कि वे बंगाली रहते हैं और दिखते हैं. यों जोगेन भौतिक रूप से एक बांग्ला परिवेश के ही हिस्से हैं. बांग्ला परिवेश में अन्य भाषी-भाषी परिवेशों के मुकाबले कलाओं और साहित्य आदि में अधिक परस्परता रही है. आज है; पहले भी रही है. रवीन्द्रनाथ टैगोर के जमाने से रही है. टैगोर स्वयं उसका सबसे बड़ा उदाहरण थे.

जबकि बाकी जगहों पर, जो कला के बड़े केन्द्र हैं, परस्परता खंडित हुई है—मुंबई, दिल्ली आदि. तो बंगाल का यह गुण रहा है. यह संसार भर में स्वयं आधुनिकता का एक अनिवार्य पक्ष रहा है. अति यथार्थवाद सिर्फ चित्रकला में नहीं था, उसके मुख्य प्रणेता कवि थे—यह फैशन, रंगमंच और बहुत सारे क्षेत्रों में गया. आधुनिकता ने इस तरह के संवाद को लगभग हर जगह अपने ढंग से सम्भव किया और पोसा. लेकिन, दुर्भाग्य से, भारत में ज्यादातर खंडित व बाधित रहा.

सार्वजनिक प्रयत्न

ज्यादातर आधुनिक कलाकार शुरू में किसी डिजाइन केन्द्र में या उनके साथ सम्बद्ध रहे तो इसका एक कारण कमलादेवी चट्टोपाध्याय और पुपुल जयकर की अपनी दृष्टियां रहीं. इन दृष्टियों के दो पक्ष थे. एक पक्ष यह था कि भारत में अपार हस्तशिल्प की विविधता को जीवित रखने के उपाय किये जायें, उस पर फिर से ध्यान दिया जाये, उसको जरूरी तौर पर दृश्य व प्रकट रूप से, हमारी परम्परा का हिस्सा माना जाए.

हस्तशिल्प की परम्परा को पुनर्नवा करने के लिए नवाचार किया जाये और नये चित्रकार नवाचार करने का माध्यम बने, जिनमें जोगेन चौधरी भी रहे हैं. इसका एक पक्ष यह भी था कि इस बहाने हमारे आधुनिक कलाकारों का जड़ों में धंसी-फैली हुई एक बड़ी हस्तशिल्प परम्परा से सर्जनात्मक संवाद हो जायेगा. यह कमलादेवी के मन में था और पुपुल जयकर के मन में भी. एक और स्थिति यह थी कि उस समय भारत में—अब स्थिति थोड़ी बदली है—आधुनिक कला के खरीदार अत्यल्प थे.

ज्यादातर कलाकार कहीं न कहीं, कुछ न कुछ काम करके अपनी जीविका अर्जित करते थे, कला से तो जीविका सम्भव नहीं थी. उस समय इन्होंने यह महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी. ठीक उसी तरह से शास्त्रीय संगीत में यह भूमिका आकाशवाणी ने निभायी. रविशंकर, अली अकबर खां, ध्रुपद और खयालिये कलाकार आदि बड़ी संख्या में आकाशवाणी में काम करते थे. एक सार्वजनिक प्रयत्न जरूरी था.

संगीत के क्षेत्र में इसलिए जरूरी था कि तथाकथित राजकीय तन्त्र से राज्याश्रय समाप्त हो गया था. उसकी जगह दूसरे किस्म के राज्याश्रय, अधिक लोकतांत्रिक राज्याश्रय ने ली.

फोटो : सुबीर हलदर/इंडिया टुडे

दो केन्द्र

जोगेन से मुलाकात होती रहती है. वे उन थोड़े से कलाकारों में हैं जिन्होंने अपनी कुछ अर्जित धनराशि का उपयोग दूसरों के लिए किया है. उन्होंने दो केन्द्र बनाये हैं. एक शान्ति निकेतन के पास ही और दूसरा सम्भवतः कोलकाता में बनाया है. जब शान्ति निकेतन का केन्द्र बन रहा था, तब मुझे बुलाया था. मैं गया था. जब वे शान्ति निकेतन में आयोजन करते हैं तो वह थोड़ा अलग किस्म का होता है. अक्सर वह हमें याद करते हैं, तो हम रजा फाउंडेशन से उनकी मदद करते हैं. जैसे, अभी के.जी. सुब्रमण्यन पर एक ‘शताब्दी परिसंवाद’ आयोजित कर रहे हैं.

बंगाल में जो ललित कला अकादेमी है, वह मृतप्राय थी, कुछ खास करती नहीं थी; वह उसके अध्यक्ष बने तो उन्होंने मुझे एक व्याख्यान देने बुलाया था. मैंने ‘अमूर्तन’ पर एक व्याख्यान दिया था. जोगेन से एक तरह की यारबाशी है.

(पीयूष दईया कवि-लेखक और संपादक हैं)

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