
वाराणसी की 23 वर्षीय सेल्स इंटर्न प्रीति पांडे के लिए बीमार होने पर ली गई छुट्टी भी चिंता लेकर आती है. आराम करने के बजाय उन्हें डर सताता है कि कहीं वे काम में पीछे न रह जाएं. उन्हें यह भी चिंता रहती है कि कहीं उनके को-वर्कर उन्हें कामचोर न समझ लें.
शरीर ने काम करना बंद कर दिया है लेकिन दिमाग अब भी उसी में उलझा है. यह ऐसा एहसास है जिसे बहुत से लोग पहचान सकते हैं. अब इसका एक नाम भी है. 'स्ट्रेसलैक्सिंग' आजकल खूब चर्चा में है. इसका मतलब उस अजीब बेचैनी या अपराधबोध से है जो तब महसूस होता है जब कोई व्यक्ति आराम करने की कोशिश करता है.
आधुनिक जीवन ने खुद को काम से अलग करना खास तौर पर मुश्किल बना दिया है. काम के संदेश, अधूरे काम, किराने की सूची, परिवार की जिम्मेदारियां, बिल, अपॉइंटमेंट और दर्जनों छोटे-छोटे लंबित काम ऑफिस का समय खत्म होने के बाद भी दिमाग में चलते रहते हैं. यहां तक कि आराम और मनोरंजन भी दूसरी जिम्मेदारियों के बीच फिट की जाने वाली किसी और जरूरत जैसा लगने लगता है.
बेंगलुरु में कॉरपोरेट काउंसलर के तौर पर काम करने वाले फ्रीलांसर कार्तिक आर. कहते हैं, "आराम करना इसलिए मुश्किल हो गया है क्योंकि आज के समय में दिमाग में बहुत सारे काम एक साथ चलते रहते हैं. आराम करने से पहले अक्सर ऐसा लगता है कि पहले सब कुछ खत्म करना जरूरी है.”
कार्तिक के मुताबिक एक व्यवहारिक तरीका यह हो सकता है कि उन कामों की सूची बना लें, जिन्हें आराम करने से पहले हर हाल में पूरा करना है. जिंदगी के सारे काम खत्म नहीं किए जा सकते. लेकिन जरूरी काम पूरे हो जाएं तो कम से कम थोड़ी राहत मिलती है और खुद को आराम करने की इजाजत देना आसान हो जाता है.

हाल की एक रिसर्च भी काम और आराम के बीच धुंधली होती सीमा की ओर इशारा करती है. 2026 में पूरे भारत के 3,987 विश्वविद्यालयों के शिक्षकों पर किए गए एक राष्ट्रीय अध्ययन में पाया गया कि ज्यादा समय तक स्क्रीन देखने, लंबे समय तक काम करने और खराब नींद का संबंध बर्नआउट से था.
प्रतिभागी रोज औसतन करीब पांच घंटे स्क्रीन पर बिताते थे. उन्होंने औसतन खराब नींद की भी जानकारी दी. शोधकर्ताओं ने पाया कि स्क्रीन पर ज्यादा समय बिताने का संबंध लंबे कामकाजी घंटों से था जबकि ज्यादा नींद बर्नआउट से बचाने में मदद करती दिखी.
दिल्ली की 38 वर्षीय मार्केटिंग मैनेजर सुमन द्विवेदी के लिए भी काम से दूर रहने वाले दिन में यह समस्या खत्म नहीं होती. उनका दिमाग तुरंत इस बारे में सोचने लगता है कि खाना क्या बनाना है, किराने का सामान आया या नहीं और घर में और क्या-क्या व्यवस्थित करना है. आधिकारिक तौर पर काम का दिन खत्म हो गया है लेकिन उसकी जगह एक दूसरी मानसिक सूची ले लेती है.
यह मानसिक बोझ महिलाओं के लिए खास तौर पर ज्यादा हो सकता है. 2025 में भारत में उन कामकाजी महिलाओं पर एक अध्ययन किया गया, जिनके बच्चे अभी छोटे हैं. इसमें सामने आया कि घर और बच्चों की देखभाल की जिम्मेदारियों से जुड़ा अदृश्य काम मानसिक बोझ और बर्नआउट दोनों बढ़ाता है.
शोधकर्ताओं का कहना था कि घर की जिम्मेदारियों का लगातार हिसाब रखना और उन्हें याद रखना भी मानसिक रूप से थका देने वाला हो सकता है.
मनोवैज्ञानिक अक्सर इसे लगातार सतर्क रहने की स्थिति से बाहर न निकल पाने के तौर पर देखते हैं. अगर कोई व्यक्ति वर्षों से काम और उत्पादकता को जिम्मेदारी, उपलब्धि या यहां तक कि अपनी अहमियत से जोड़कर देखता रहा हो, तो कुछ न करना भी उसे असहज लगने लगता है.
ऐसे में खाली दोपहर सुकून देने के बजाय ऐसे विचार ला सकती है, "मुझे कुछ करना चाहिए", "मैं समय बर्बाद कर रहा हूं" या "मैं पीछे छूट रहा हूं."
तकनीक ने काम और निजी जिंदगी के बीच की यह सीमा और पतली कर दी है. पहले ऑफिस से निकलने का मतलब काम को वहीं छोड़ देना होता था. अब वॉट्सएप ग्रुप, ईमेल और नोटिफिकेशन घर तक साथ आते हैं. कोई व्यक्ति मैसेज का जवाब न भी दे तो सिर्फ उसे देख लेना ही काम को फिर से दिमाग में ले आता है.
इसका हल यह भी नहीं है कि आराम करना एक और काम की तरह पूरी तरह से सीख लिया जाए. अलग-अलग एक्टिविटीज से भरी छुट्टी, बहुत सख्त तरीके से तय की गई वेलनेस रूटीन या यहां तक कि एक लक्ष्य की तरह किया जाने वाला मेडिटेशन भी आराम को दूसरी तरह की उपलब्धि में बदल सकती है.
शायद ज्यादा उपयोगी बदलाव यह है कि कुछ कामों को अधूरा छोड़ना भी सीखा जाए. हमेशा कोई न कोई ईमेल, काम या घरेलू जिम्मेदारी बाकी रहेगी. असली चुनौती कई बार यह स्वीकार करना होती है कि दिमाग को रुकने की इजाजत देने से पहले दिन के हर काम को पूरी तरह निपटाना जरूरी नहीं है.

