स्मोकिंग के कथित सुरक्षित विकल्प वेपिंग के बारे में गाहे-बगाहे दावे किए जाते रहे हैं कि यह उतनी सुरक्षित भी नहीं जितना इसे बताया जाता है. एक हालिया रिसर्च ने एक बार फिर यही साबित किया है. ई-सिगरेट को अक्सर पारंपरिक सिगरेट से कम नुकसानदेह बताकर प्रचारित किया जाता है. लेकिन ICMR ने 2025 की एक मेटा-एनालिसिस का हवाला देते हुए बताया कि ई-सिगरेट का इस्तेमाल करने वालों में, इसका इस्तेमाल न करने वालों की तुलना में हार्ट अटैक और स्ट्रोक का खतरा ज्यादा था.
मेटा-एनालिसिस (Meta-analysis) एक ऐसी रिसर्च प्रोसेस है जिसमें किसी एक विषय पर पहले से प्रकाशित कई अलग-अलग अध्ययनों के नतीजों का एक साथ विश्लेषण किया जाता है. इसका उद्देश्य उपलब्ध सभी वैज्ञानिक प्रमाणों को मिलाकर अधिक भरोसेमंद और व्यापक निष्कर्ष तक पहुंचना होता है.
शोधकर्ता अब हार्ट और कार्डियोवस्कुलर सिस्टम में होने वाले मॉलीक्यूलर बदलावों का भी पता लगा रहे हैं. जून 2026 में जर्नल ‘फ्रंटियर्स इन ऑन्कोलॉजी’ में प्रकाशित एक अध्ययन में यह सामने आया. यह अध्ययन केक स्कूल ऑफ मेडिसिन ऑफ दि सदर्न कैलिफोर्निया के शोधकर्ताओं ने किया था. इसमें पाया गया कि नियमित रूप से ई-सिगरेट का इस्तेमाल करने वाले लोगों में, इसका इस्तेमाल न करने वालों की तुलना में 3,124 जीन की गतिविधि में बदलाव देखा गया. प्रभावित जीनों में से कई ऐसे थे, जिनका संबंध कैंसर, हृदय रोग और अन्य पुरानी बीमारियों से जुड़ी जैविक प्रक्रियाओं से था.
83 प्रतिभागियों के मुंह की कोशिकाओं का विश्लेषण करने वाले इस अध्ययन में यह भी पाया गया कि वेपिंग कितनी बार की गई, उससे ज्यादा असर इस्तेमाल किए गए फ्लेवर और डिवाइस का था. मिश्रित फ्लेवर और फलों के स्वाद वाले वेपिंग उत्पादों का इस्तेमाल करने वालों में शरीर की कोशिकाओं के भीतर जीनों के काम करने के तरीके में सबसे ज्यादा बदलाव देखे गए.
भारत में स्वास्थ्य विशेषज्ञ खास तौर पर इस बात को लेकर चिंतित हैं कि वेपिंग किशोरों और युवाओं के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रही है. हालांकि ई-सिगरेट में तंबाकू नहीं जलता, लेकिन कई अध्ययनों में इसके इस्तेमाल को खांसी, सांस लेते समय सीटी जैसी आवाज या वीजिंग और सांस की नलियों में सूजन जैसी समस्याओं से जोड़ा गया है.
किशोरावस्था में निकोटीन के संपर्क में आने से बच्चों और किशोरों का ध्यान केंद्रित करने में दिक्कत हो सकती है. उन्हें नई चीजें सीखने में परेशानी आ सकती है और वे अपनी भावनाओं व व्यवहार पर नियंत्रण रखने में भी कमजोर पड़ सकते हैं.

