पहले बाहर खाना किसी खास मौके पर ही होता था. जैसे शुक्रवार की रात दोस्तों के साथ पार्टी या जन्मदिन का जश्न, जहां कैलोरी की ज्यादा परवाह नहीं की जाती थी लेकिन अब यह तस्वीर बदल रही है.
खासकर Gen Z के लिए कैफे और रेस्टोरेंट अब रोज की जिंदगी का हिस्सा बन गए हैं. बिजनेस मीटिंग से लेकर दोस्तों के साथ मुलाकात, काम पर जाने से पहले नाश्ता या बस कुछ देर सुकून के लिए लोग आते हैं. युवा अब पिछली पीढ़ियों के मुकाबले ज्यादा बार बाहर खाना खा रहे हैं. ऐसे में रेस्टोरेंट के मेन्यू से उनकी उम्मीदें भी बदल रही हैं.
स्वाद अब भी मायने रखता है लेकिन प्रोटीन, फाइबर, हेल्दी फैट और ऐसे सामान भी मायने रखते हैं जिन्हें खाने के बाद उन्हें अच्छा महसूस हो,गिल्ट नहीं. नई दिल्ली के धनमिल कंपाउंड में पुराने जमाने के अंदाज वाले कैफे बॉम्बे क्लब की संस्थापक और हॉस्पिटैलिटी कारोबार से जुड़ी अमांडा भंडारी कहती हैं, "युवा अब सिर्फ खुद को ट्रीट देने के लिए कैफे नहीं आते. वे अपना ख्याल रखने के लिए आते हैं. जब कोई हफ्ते में चार या पांच बार बाहर खाना खाता है तो हर खाना किसी खास मौके की चीज के बजाय उसकी आदत बन जाता है. इसी वजह से रेस्टोरेंट भी अब खाने को नए तरीके से देख रहे हैं.."
खाने-पीने की दुनिया में यह बदलाव साफ नजर आ रहा है. अब मेन्यू में प्रोटीन से भरपूर डिश, सॉरडो, मिलेट, फर्मेंटेड फूड और मौसम के हिसाब से मिलने वाली चीजें शामिल की जा रही हैं. यहां तक कि रोजमर्रा के पसंदीदा खाने को भी बेहतर सामग्री और ज्यादा संतुलित पोषण के साथ नए तरीके से बनाया जा रहा है.
भंडारी का मानना है कि रेस्टोरेंट और कैफे अब ऐसे व्यंजन तैयार कर रहे हैं जिन्हें लोग बार-बार खा सकें, न कि सोशल मीडिया के कुछ समय के ट्रेंड के पीछे भाग रहे हैं. भंडारी कहती हैं, "पहले हर कोई अगली वायरल मिठाई चाहता था. अब चुनौती ऐसा खाना बनाने की है जिसे लोग पोषण से समझौता किए बिना नियमित रूप से खा सकें. यह कहीं ज्यादा मुश्किल और बहुत ज्यादा दिलचस्प काम है."
बॉम्बे क्लब में, जहां अलग-अलग इलाकों के भारतीय स्वाद और मुंबई के स्ट्रीट फूड को खास जगह दी जाती है, यही सोच हर डिश में दिखाई देती है. स्ट्रीट फूड के पसंदीदा व्यंजनों को सिर्फ उसी तरह दोहराने के बजाय, वहां की किचन टीम उनके स्वाद को बनाए रखते हुए उन्हें संतुलित बनाने के तरीके खोजती है. इसलिए मेन्यू में एक ऐसा अप्पम भी है, जिसे एवोकाडो, पोच्ड एग और मैंगो-चिली सॉस के साथ परोसा जाता है. इसमें एक ही प्लेट में कार्बोहाइड्रेट, हेल्दी फैट, प्रोटीन और फाइबर मिलते हैं.
भंडारी कहती हैं, "हम नहीं मानते कि हेल्दी खाना बोरिंग होना चाहिए. हमारे मेन्यू की हर डिश में प्रोटीन, हैल्दी फैट, फाइबर और कार्बोहाइड्रेट का सही संतुलन है. मकसद है कि खाना खाने के बाद आपका पेट भरा हुआ महसूस हो, सुस्ती नहीं."
खाने में पोषण पर बढ़ता ध्यान सिर्फ रेस्टोरेंट तक सीमित नहीं है. युवा ग्राहक भी अब मेन्यू को अलग तरीके से देख रहे हैं. पहले प्रोटीन की चिंता काफी हद तक फिटनेस में दिलचस्पी रखने वाले लोगों तक सीमित थी लेकिन अब यह आम बातचीत का हिस्सा बन गया है. यहां तक कि शाकाहारी लोग भी ऐसे खाने की तलाश कर रहे हैं, जिसमें पर्याप्त प्रोटीन मिले. यह जागरूकता बदलती जीवनशैली से आई है. पहले ज्यादातर लोग पूरे हफ्ते घर का बना खाना खाते थे, इसलिए पोषण का ख्याल काफी हद तक अपने आप रखा जाता था. आज जब बाहर खाना रोज की आदत बन रहा है तो लोग स्वाभाविक रूप से इस बात को लेकर जागरूक हो गए हैं कि वे क्या ऑर्डर कर रहे हैं.
खाने की सजावट अब भी खास भूमिका निभाती है, खासकर उस पीढ़ी के लिए जो खाना चखने से पहले अक्सर उसे फोन की स्क्रीन पर देखती है. भंडारी कहती हैं, "आप सबसे पहले आंखों से खाना खाते हैं. प्लेट में खाना किस तरह सजाया गया है, यह भी अनुभव का हिस्सा है. यही कैफे के खाने को घर पर बने खाने से अलग बनाता है."
शायद सबसे अच्छी बात यह है कि खाने को फिर से अहमियत मिलने लगी है. और युवा ग्राहकों के लिए भंडारी की सलाह भी बहुत मुश्किल नहीं है : कैलोरी को लेकर जरूरत से ज्यादा चिंता न करें. वे कहती हैं, "खाने से पहले सलाद ऑर्डर करें, अपनी प्लेट में कुछ प्रोटीन जरूर रखें और फिर खाने का आनंद लें. मक्खन और चीज दुश्मन नहीं हैं. संतुलन जरूरी है."
नई डाइनिंग संस्कृति को इससे बेहतर तरीके से शायद ही समझाया जा सकता है. Gen Z के लिए अब बाहर खाना स्वाद और सेहत में से किसी एक को चुनने का सवाल नहीं है. उम्मीद यही है कि एक अच्छा खाना स्वाद और सेहत, दोनों का ख्याल रखे.

