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डार्क मोड

कामकाज और नींद पर भारी पड़ रही रील्स की लत छूटती क्यों नहीं?

PGIMER चंडीगढ़ की रिसर्च बताती है कि ऑटोप्ले, लगातार स्क्रॉलिंग और पसंद के मुताबिक कंटेंट दिखाने वाले एल्गोरिदम युवाओं को रील्स में उलझाए रखते हैं, जिससे उनकी पढ़ाई और नींद प्रभावित हो रही है

Impact of Reels on brain
रील्स का डिजाइन लोगों में इनकी लत की वजह है (सांकेतिक तस्वीर)
अपडेटेड 30 अक्टूबर , 2026

22 साल के अभिरूप तिवारी दिल्ली में कॉमर्स के छात्र हैं. वे कभी-कभी इंस्टाग्राम खोलते हैं और सोचते हैं कि वहां एक घंटा बिताएंगे. इसकी शुरुआत अक्सर दो क्लास के बीच या सोने से पहले एक रील देखने से होती है. वे कहते हैं, "आप एक रील देखते हैं फिर दूसरी रील सामने आ जाती है जो बिल्कुल आपकी पसंद की होती है. जब तक मुझे एहसास होता है, 40 मिनट बीत चुके होते हैं. ऐसा कोई मौका ही नहीं आता जब लगे कि अब देखने के लिए कुछ बाकी नहीं है."

शायद यही बात इस समस्या की एक वजह हो सकती है कि रील देखने का कोई अंत नहीं होता. चंडीगढ़ के पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च (PGIMER) की एक रिसर्च में यह देखा गया है कि शॉर्ट वीडियो प्लेटफॉर्म का डिजाइन युवाओं के व्यवहार को किस तरह प्रभावित करता है.

इस स्टडी में 119 लोगों से सवाल किए गए. इनमें ज्यादातर 18 से 24 साल की उम्र के कॉलेज छात्र थे. एक चौथाई से ज्यादा लोगों ने कहा कि उन्हें रील देखना बंद करने में मुश्किल होती है. 31 फीसदी लोगों ने बताया कि उन्हें समय बीतने का पता ही नहीं चलता. करीब एक तिहाई लोगों ने कहा कि रील देखने की वजह से उनकी पढ़ाई पर असर पड़ता है. करीब हर चार में से एक व्यक्ति ने कहा कि रील के बिना उन्हें बोरियत महसूस होती है.

रिसर्च करने वाले एक अहम फर्क बताते हैं. रील देखना सिर्फ टीवी देखने जैसा नहीं है. टीवी के कार्यक्रमों का एक तय समय होता है और वे खत्म हो जाते हैं. उनके बीच विज्ञापन भी आते हैं. ये ऐसे मौके होते हैं, जब दर्शक टीवी देखना बंद कर सकता है लेकिन रील में ऐसी ज्यादातर सीमाएं नहीं होतीं.

लगातार स्क्रॉल करते रहने की सुविधा से वीडियो देखते रहना एक आम बात बन जाती है. ऑटोप्ले की वजह से यूजर को अगला वीडियो चुनने की जरूरत नहीं पड़ती. पर्सनलाइज्ड एल्गोरिदम यह समझ लेते हैं कि यूजर किस तरह के कंटेंट पर ज्यादा समय बिताता है और फिर उसे उसी तरह के और वीडियो दिखाते हैं. क्योंकि हर स्वाइप (स्क्रीन पर उंगली चलाना) कुछ मजेदार, चौंकाने वाला, काम का या बिल्कुल बेकार वीडियो सामने आ सकता है. ऐसे में यूजर को पता ही नहीं होता कि अगला दिलचस्प वीडियो कब मिलेगा.

PGIMER चंडीगढ़ के बाल रोग विभाग की डॉ. भवनीत भारती इसे "स्वाइप-रिवॉर्ड-अगेन" यानी स्क्रीन पर उंगली चलाने, कुछ नया मिलने और फिर ऐसा ही करते रहने का एक सिलसिला बताती हैं. उनके मुताबिक, यह सिलसिला कुछ हद तक ऐसे इनाम मिलने से चलता है, जिनका अंदाजा नहीं लगाया जा सकता. बोरियत या नोटिफिकेशन जैसे संकेत भी इसमें भूमिका निभाते हैं.

बेंगलुरु में रहने वाली 27 साल की सॉफ्टवेयर इंजीनियर निशा वर्मा (बदला हुआ नाम) के लिए यह समस्या रात में सबसे ज्यादा सामने आती है. वे रात में करीब 11.30 बजे सोने जाती हैं लेकिन अक्सर रात 1 बजे के बाद तक फोन चलाती रहती हैं. वे कहती हैं, "मैं ऐसा कुछ भी नहीं देख रही होती जिसे खास तौर पर देखना चाहती हूं. यही तो अजीब बात है. मैं स्क्रॉल करती रहती हूं क्योंकि हो सकता है कि अगला वीडियो दिलचस्प हो."

जून में यूरोपियन चाइल्ड एंड एडोलसेंट साइकियाट्री  में प्रकाशित एक सिस्टमैटिक रिव्यू में भी कहा गया है कि शॉर्ट वीडियो को स्क्रीन के सामान्य इस्तेमाल से अलग रखकर समझने की जरूरत है. इसकी वजह है कि इसका इंटरफेस और तेजी से कंटेंट दिखाने का तरीका पुराने मीडिया से अलग है.

इस रिव्यू में युवाओं के ध्यान, याददाश्त और भावनात्मक सेहत पर इसके असर से जुड़ी नई रिसर्च का जायजा लिया गया है. हालांकि, इसमें यह भी कहा गया है कि इस विषय पर रिसर्च अभी शुरुआती दौर में है और फिलहाल यह साबित नहीं किया जा सकता कि सिर्फ शॉर्ट वीडियो देखने से ही ये समस्याएं होती हैं.

एक्सपर्ट्स का कहना है कि कुछ आसान कदम उठाकर इस आदत को कम किया जा सकता है. जैसे ऑटोप्ले और नोटिफिकेशन बंद करना, ऐप के इस्तेमाल की समय सीमा तय करना, सोते समय फोन को बिस्तर से दूर रखना और स्क्रॉल करने के बजाय खेल या किसी दूसरी गतिविधि में समय बिताना लेकिन बड़ी चिंता अब भी बनी हुई है. आज के डिजिटल प्लेटफॉर्म तेजी से इस तरह बनाए जा रहे हैं कि यूजर को यह सोचने का मौका ही न मिले कि क्या उसे आगे भी वीडियो देखते रहना है.

टीवी पर हर कार्यक्रम खत्म होने के बाद यह सवाल सामने आता है लेकिन लगातार स्क्रॉल करने की सुविधा शायद यूजर से यह सवाल कभी पूछती ही नहीं.

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