
16 साल की दिल्ली की स्कूली छात्रा अनन्या मेहरा (बदला हुआ नाम) कभी-कभी बिना किसी दूसरे व्यक्ति से बात किए अपने दिन के बारे में एक घंटे तक बातचीत करती हैं.
बातचीत किसी असाइनमेंट से शुरू हो सकती है, लेकिन जल्द ही किसी दोस्त के साथ हुई घटना, घर में हुए विवाद या उस लड़के तक पहुंच जाती है, जिसने उनके मैसेज का जवाब नहीं दिया.
लेकिन उनकी बात सुनने वाला कोई इंसान नहीं है. अनन्या कहती हैं, "मुझे लोगों से बात करना ज्यादा मुश्किल लगता है. अपने सबसे करीबी दोस्तों के साथ भी मैं सोचती रहती हूं कि क्या मैं जरूरत से ज्यादा प्रतिक्रिया दे रही हूं? क्या मैं उन्हें यह बात पहले बता चुकी हूं? क्या वे मुझे जज करेंगे? AI के साथ मैं ठीक वही लिख सकती हूं, जो मेरे दिमाग में चल रहा है, भले ही वह सुनने में कितना भी अजीब क्यों न लगे. मुझे खुद को रोकने या बदलने की जरूरत नहीं पड़ती."
जैसे-जैसे ‘कनवर्सेशनल AI’ (बातचीत करने वाला AI) सवालों के जवाब देने से आगे बढ़कर कहीं ज्यादा निजी दायरे में पहुंच रहा है. मनोवैज्ञानिकों की दिलचस्पी भी इस व्यवहार में बढ़ रही है.
2026 में भारत में किया गया एक अध्ययन एक्टा साइकोलॉजिका जर्नल में प्रकाशित हुआ. इसमें 233 युवाओं, जिनकी उम्र 18 से 30 साल के बीच थी, के बीच बातचीत करने वाले AI के इस्तेमाल और अकेलेपन, सामाजिक चिंता तथा जीवन की गुणवत्ता के बीच संबंधों का अध्ययन किया गया.

जयपुर स्थित मणिपाल यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं के सामने एक जटिल तस्वीर आई. जिन लोगों ने ज्यादा अकेलापन महसूस करने की बात कही, वे बातचीत करने वाले AI का इस्तेमाल भी ज्यादा करते थे. वहीं AI के ज्यादा इस्तेमाल का अकेलेपन और एंजायटी से मामूली संबंध भी पाया गया, हालांकि ये संबंध सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण नहीं थे.
इस शोध से यह साबित नहीं होता कि AI अकेले लोगों का अकेलापन कम करता है. अध्ययन में प्रतिभागियों को एक ही समय पर देखा गया था इसलिए यह पता नहीं चल सकता कि लोग अकेलेपन के कारण AI की ओर रुख करते हैं, AI से बातचीत के बाद उन्हें कुछ राहत मिलती है या दोनों बातें एक साथ हो रही हैं.
हालांकि शोध से यह संकेत जरूर मिलता है कि AI लोगों के लिए एक तरह के साथी या भावनात्मक सहारे की भूमिका निभाने लगा है. अध्ययन में अकेलेपन का सामाजिक चिंता से महत्वपूर्ण संबंध पाया गया. इसका संबंध शारीरिक, मानसिक, सामाजिक और पर्यावरणीय पहलुओं में जीवन की खराब बताई गई गुणवत्ता से भी था.
युवाओं के लिए AI की एक खासियत शायद यह है कि उसके साथ बातचीत में सामाजिक नतीजों का डर नहीं होता. ग्रेटर नोएडा की बाल परामर्शदाता डॉ. रकिता बेल कहती हैं, "युवा ब्रेकअप, किसी शर्मिंदगी, परिवार में हुए झगड़े या अपनी किसी असुरक्षा के बारे में AI को इसलिए बता सकते हैं क्योंकि उन्हें किसी दूसरे व्यक्ति के जज करने, ठुकराने या गलत समझने का डर होता है. उन्हें यह भी चिंता हो सकती है कि दोस्त उनकी बात दूसरों को बता देंगे या बार-बार एक ही समस्या पर बात करके वे किसी पर बोझ बन रहे हैं. AI के साथ वे किसी दूसरे व्यक्ति की प्रतिक्रिया संभालने की जरूरत के बिना अपनी मुश्किल भावनाएं जाहिर कर सकते हैं. इससे उन्हें पूरी तरह ईमानदार होना ज्यादा सुरक्षित और आसान लग सकता है."
अनन्या भी इस अंतर को समझती हैं. पिछले साल जब उनकी एक दोस्ती खत्म हुई तो वह कहती हैं कि शुरुआत में उन्होंने अपने दोस्तों की तुलना में AI को काफी ज्यादा बातें बताईं.
वे कहती हैं, "किसी इंसान से बात करते हुए एक समय ऐसा आता है जब आप सोचते हैं कि मैं इस बारे में काफी बात कर चुकी हूं और अब वह परेशान हो रहा होगा. AI मुझे ऐसा महसूस नहीं कराता. रात के दो बजे भी मैं कह सकती हूं, 'मुझे पता है कि मैंने कल भी यह पूछा था, लेकिन तुम्हें क्या लगता है कि उसने ऐसा क्यों किया?' और AI फिर भी जवाब देगा."
AI की यह उपलब्धता उसके आकर्षण का एक हिस्सा है. उसे जागते रहने की जरूरत नहीं होती, वह अधीर नहीं होता और यूजर एक ही बात को दोबारा शुरू कर सकता है, उसे अलग तरीके से लिख सकता है या उसी चिंता पर बार-बार लौट सकता है.
लेकिन विशेषज्ञ सावधान करते हैं कि यही खूबियां इस रिश्ते को जरूरत से ज्यादा सहज भी बना सकती हैं. AI का जवाब सहानुभूतिपूर्ण लग सकता है लेकिन यह इंसानी समझ, पेशेवर परामर्श या किसी वास्तविक रिश्ते में होने वाली आपसी समझ और संवाद का विकल्प नहीं है.
डॉ. बेल कहती हैं, "AI कभी-कभी किसी युवा के लिए अपने विचारों को समझने और उन्हें व्यवस्थित करने की शुरुआती जगह बन सकता है, खासकर तब जब वह सीधे किसी से बात करने में शर्मिंदगी, चिंता या झिझक महसूस करता हो. लेकिन चिंता तब शुरू होती है, जब AI इंसानी रिश्तों का विकल्प बनने लगे. जब कोई बच्चा या युवा मुश्किल बातचीत से सिर्फ इसलिए बचने लगे क्योंकि AI उसे कभी चुनौती नहीं देता, उसे ठुकराता नहीं और उसकी एक ही चिंता को बार-बार सुनकर थकता नहीं. वास्तविक रिश्तों में असहजता, असहमति और अपनी कमजोरियों के साथ जीना सीखना पड़ता है. सिर्फ दिलासा मिलने से ये कौशल विकसित नहीं हो सकते."
मणिपाल के शोधकर्ताओं ने भी बातचीत करने वाले AI को संभावित रूप से भावनात्मक सहयोग का एक अतिरिक्त माध्यम बताया है, न कि इंसानी रिश्तों या मानसिक स्वास्थ्य देखभाल के सिद्ध विकल्प के रूप में.
दूसरे शब्दों में, कभी-कभी लोगों को अपनी समस्या का समाधान करने के लिए किसी की जरूरत नहीं होती. वे बस अपनी बात का सबसे बेझिझक और बिना किसी रोक-टोक वाला रूप किसी से कहना चाहते हैं.

