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क्या सबरीमाला मुद्दे का सीएम विजयन के चुनाव अभियान पर असर पड़ेगा?

सबरीमाला मंदिर के मुद्दे पर लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ) के एक मंत्री के बयान के बाद भाजपा और कांग्रेस इस मुद्दे को हवा देने की कोशिश कर रहे हैं.

मीडिया से मुखातिब केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन (जैसन जी)
मीडिया से मुखातिब केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन (जैसन जी)
अपडेटेड 22 मार्च , 2021

कोविड महामारी से केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन को न केवल सार्वजनिक स्वास्थ्य पर आए संकट से निपटने में सरकार की कार्यकुशलता दिखाने का अवसर मिला बल्कि 2 जनवरी 2019 को सबरीमाला मंदिर में दो महिलाओं के प्रवेश के बाद से सुलग रहे राजनीतिक विवाद से ध्यान हटाने में भी कामयाबी मिली. सितंबर 2018 में सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद कि मंदिर मे सभी आयुवर्ग की महिलाएं जा सकती हैं, पुलिस की मदद से दो महिलाओं ने यहां प्रवेश किया था.  

बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 2019 में सात जजों की बेंच से यह तय करने को कहा था कि सिर्फ वर्षों पुरानी परंपरा का हवाला देकर क्या पूजास्थलों में प्रवेश से महिलाओं को वंचित किया जा सकता है. कई लोग मानते हैं कि सुप्रीम कोर्ट के 2018 को लागू करने क्रम में पुलिस के दो महिलाओं को अपने संरक्षण में वहां प्रवेश कराने के प्लान को मंजूर देकर विजयन ने रणनीतिक भूल कर दी थी. तब चालीस के आसपाप की उम्र की बिंदु अम्मिनी और कनक दुर्गा को पुलिस संरक्षण में मंदिर के भीतर प्रवेश कराया गया था.  

हालांकि इस कदम का महिला कार्यकर्ताओं ने स्वागत किया लेकिन यह लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ) की सरकार के लिए उल्टा पड़ गया. भाजपा और संघ परिवार ने इसके खिलाफ जबर्दस्त प्रदर्शन किया था. कांग्रेस समेत विपक्षी पार्टियों ने इस अवसर को भुनाते हुए पिनराई सरकार पर हिंदू मान्यताओं और परंपराओं के लिए खतरा पैदा करने का आरोप लगाया था. 

भाजपा ने सबरीमाला का मुद्दा 2019 के लोकसभा चुनाव में उछाला था लेकिन वह राज्य की 20 सीटों में से एक भी जीतने में कामयाब नहीं रही. यहां तक कि पथनमथिट्टा सीट जिसे कांग्रेस के एंटो एंटोनी ने जीता वहां भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष के. सुरेंद्रन 29 प्रतिशत मतों के साथ तीसरे स्थान पर रहे.

एलडीएफ को भी लोकसभा चुनाव में घनघोर पराजय का सामना करना पड़ा जब कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट ने 19 सीटें जीत लीं. माकपा के उत्तर केरल के हिंदू वोटबैंक में जबर्दस्त सेंधमारी हुई. हार के बाद पार्टी ने कॉडर को शांत करने के लिए घर-घर का दौरा किया और उन परिस्थितियों की जानकारी मांगी जिनमें दो महिलाओं को सबरीमाला जाने की अनुमति दी गई.    

पिछले साल जैसे ही महामारी की चुनौती पेश हुई पिनराई सरकार ने संक्रमण रोकने के लिए ताबड़तोड़ कदम उठाए और दूसरे राज्यों के लिए मिसाल पेश कर दी. कोविड-19 ने प्रवासियों की वापसी की चुनौती भी पेश की. करीब पांच लाख केरल के लोग खाड़ी देश से गृहराज्य लौटे. पिनराई सरकार ने उनके पुनर्वास की बेहतरीन रणनीति बनाई. उनकी राजनीतिक अहमियत बढ़ी और संदेश ये निकला कि एलडीएफ बिना किसी बाधा के सत्ता में वापस लौट आएगा. कुछेक सर्वे में भी एलडीएफ के पक्ष में माहौल होने का अनुमान जाहिर किया गया. दिसंबर में हुए स्थानीय निकाय चुनाव में सबरीमाला विवाद कोई मसला नहीं रहा. इसमें एलडीएफ ने कांग्रेस को पराजित किया और भाजपा ने भी कुछ जगहों पर मामूली कामयाबी हासिल की.  

कझकूट्टम से विधानसभा चुनाव लड़ रहे देवस्वम और पर्यटन मंत्री कडकमपल्ली सुरेंद्रन ने इस साल 11 मार्च को सबरीमाला में पुलिस के संरक्षण में महिलाओं के प्रवेश की घटना पर खेद व्यक्त किया. पिनराई के वफादार 66 साल के सुरेंद्रन ने कहा, “सबरीमाला की घटना ने हम सभी को दुखी किया है. यह नहीं होना चाहिए था.” उन्होंने ऐलान किया कि जब सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला आएगा तो सरकार उस पर धर्मावलंबियों और राजनीतिक दलों से मशविरा करेगी.  

सुरेंद्रन के वक्तव्य ने भाजपा, कांग्रेस और ऊंची जाति के नायर समुदाय के हितों की रक्षा के लिए बनी नायर सर्विस सोसायटी को सबरीमाला मसले को चुनावी एजेंडा बनाने का मौका दे दिया. 17 मार्च को वरिष्ठ माकपा नेता सीताराम येचुरी ने सुरेंद्रन को आड़े हाथ लेते हुए कहा कि सबरीमाला पर उनका बयान पार्टी के नजरिये के खिलाफ है, पार्टी मंदिर में महिलाओं के प्रवेश की समर्थक है. 18 मार्च को हालांकि पिनराई खुद इस बहस में कूद गए और सुरेंद्रन का समर्थन करते हुए उन्होंने कहा कि कोर्ट के फैसले के बाद इस मसले पर आम सहमति बनाने के प्रयास होंगे. शायद सुरेंद्रन ने अपने रुख में यह बदलाव इसलिए किया क्योंकि सबरीमाला पर विरोध प्रदर्शनों का नेतृत्व करने वाली शोभा सुरेंद्रन को भाजपा कझकूट्टम से अपना प्रत्याशी बना सकती है.   

यह पूछने पर कि सबरीमाला मुद्दे का चुनाव पर क्या असर होगा संविधान विशेषज्ञ और पूर्व एरणाकुलम के पूर्व सांसद डॉ. सेबेस्टियन पॉल कहते हैं, “मुझे नहीं लगता कि सबरीमाला इस विधानसभा चुनाव में कोई मुद्दा होगा. लेकिन जिस मुद्दे को लोग भूल चुके थे उस पर खेद जताकर कडकमपल्ली सुरेंद्रन ने भारी भूल कर दी है. अब कांग्रेस और भाजपा इसे फिर से जिंदा करने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन यह भी व्यर्थ हो सकता है. ”  

भाजपा सबरीमाला मुद्दे पर इसलिए ध्यान लगा रही है क्योंकि वह कझकूट्टम और कोन्नी समेत नायर समुदाय के वोट ए श्रेणी की सभी 25 विधानसभा सीटों पर बटोरना चाहती है. कझकूट्टम में नायर समुदाय के 22 प्रतिशत वोट हैं और आबादी के लिहाज से वे दूसरे सबसे बड़े समुदाय हैं. कोन्नी में जहां से भाजपा अध्यक्ष के. सुरेंद्रन लड़ रहे हैं, नायर आबादी 28 प्रतिशत है. त्रिसूर में जहां से राज्यसभा सदस्य और अभिनेता सुरेश गोपी मैदान में हैं, 16.7 प्रतिशत नायर आबादी है. 2016 के विधानसभा चुनाव में इन सभी सीटों पर एलडीएफ ने जीत हासिल की थी. सबरीमाला पर राजनीतिक खेल खत्म होता नहीं दिख रहा है. देखने लायक यह होगा कि यह मसला पिनराई के भविष्य पर किस तरह असर डालता है.

अनुवादः मनीष दीक्षित

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