जनादेश 2019/ उत्तर प्रदेश
जैसे-जैसे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव के पहले चरण का चुनाव पास आता जा रहा है गुर्जर सियासत भी गर्मी पकड़ने लगी है. आगरा में समाजवादी पार्टी सपा के वरिष्ठ गुर्जर नेता और पूर्व राज्यमंत्री रामसकल गुर्जर के भाजपा में शामिल होने के बाद गुर्जर सियासत में मची होड़ और तेज हो गई है. पश्चिमी यूपी में गुर्जर मतदाताओं की खासी संख्या है. यहां गाजियाबाद, नोएडा, बिजनौर, संभल, मेरठ, सहारनपुर, कैराना संसदीय सीटों पर गुर्जर मतदाताओं की संख्या प्रत्येक में एक लाख से अधिक है और अपने इसी संख्या बल से ये मतदाता इन सीटों पर निर्णायक हैं.
पश्चिमी यूपी में जाटों से बराबरी रखने वाले गुर्जर समाज के सबसे बड़े और सर्वमान्य नेता भाजपा के हुकुम सिंह थे. हुकुम सिंह की मृत्यु के बाद बने शून्य को भरने के लिए पिछले वर्ष हुए कैराना उपचुनाव में भाजपा ने इनकी बेटी मृगांका सिंह को टिकट थमाया लेकिन वह राष्ट्रीय लोकदल की प्रत्याशी तबस्सुम हसन से नजदीकी मुकाबले में हार गईं. तबस्सुम हसन, मुस्लिम गुर्जर समुदाय से आती हैं इस वजह से उनकी पूरे गुर्जर समाज में कोई स्वीकार्यता नहीं है.
सपा ने भी नोएडा के व्यवसायी और गुर्जर नेता सुरेंद्र नागर को राज्यसभा सदस्य बनाया लेकिन वह भी पश्चिमी यूपी में गुर्जरों के सर्वमान्य नेता नहीं बन पाए. कैराना के वरिष्ठ किसान नेता अंगद सिंह बताते हैं “वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में गुर्जर मतदाताओं ने भाजपा को एकतरफा वोट दिया था. चुनाव के बाद इन्हें निराशा हाथ लगी जब प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार में एक भी गुर्जर को मंत्री नहीं बनाया गया था.”
गुर्जर समुदाय में बढ़ रहे असंतोष को उस वक्त हवा मिली जब फरवरी माह में कांग्रेस की नवनियुक्त राष्ट्रीय महासचिव और पूर्वी यूपी की प्रभारी प्रियंका गांधी अपने साथी प्श्चिमी यूपी के प्रभारी ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ पहली बार लखनऊ के दौरे पर पहुंची थीं. कांग्रेस ने पश्चिमी यूपी के प्रभावी गुर्जर नेता और मुजफ्फरनगर के मीरापुर विधानसभा सीट से भाजपा विधायक अवतार सिंह बड़ाना को पार्टी में शामिल कर गुर्जर सियासत में भगवा दबदबे को चुनौती दी. बड़ाना की भरपाई के लिए भाजपा ने सात बार विधायक रहे गुर्जर नेता चौधरी वीरेंद्र सिंह को पार्टी में शामिल कर सपा-बसपा गठबंधन को बड़ा झटका दे दिया.
गुर्जर नेता वीरेंद्र सिंह सपा से विधान परिषद सदस्य हैं. इनके बेटे मनीष सिंह भी शामली के जिला पंचायत अध्यक्ष हैं. गुर्जर समाज में भरपूर प्रभाव रखने वाले विजेंद्र और मनीष की जोड़ी सहारनपुर, कैराना लोकसभा चुनाव में भाजपा को काफी मदद पहुंचा सकती है. गुर्जर मतदाताओं पर पकड़ ढीली न होने पाए इसके लिए भाजपा ने मेरठ के अश्विनी त्यागी को विधान परिषद सदस्य बनाया तो कैराना विधानसभा सीट से विधायक प्रदीप चौधरी को कैराना लोकसभा क्षेत्र से उम्मीदवार बनाकर गुर्जर समाज में एक नया नेतृत्व सामने लाने की कोशिश की है.
साफ सुथरी छवि वाले प्रदीप चौधरी हुकुम सिंह के रुतबे के सामने कहीं भी नहीं टिकते हैं. गुर्जर मतदाताओं की टीस यह भी है कि जाट से बराबरी रखने के बावजूद उनके समाज से कोई भी नेता राष्ट्रीय फलक पर अपनी पहचान नहीं बना पाया है. कैराना के वयोवृद्ध वकील राजपाल सिंह कहते हैं “हुकुम सिंह के बाद गुर्जर सियासत दिशाहीन हो चुकी है. पश्चिमी यूपी में कई गुर्जर नेता है वह सभी अपने स्थानीय क्षेत्रों तक ही सीमित रह गए हैं. जाट बिरादरी की तरह गुर्जर बिरादरी में एकता नहीं है. यही वजह है कि गुर्जर नेताओं का सरकार में प्रतिनिधित्व न के बराबर है.”
भाजपा के प्रति गुर्जर समुदाय की नाराजगी को उभारने के लिए कांग्रेस ने पड़ोसी राज्य राजस्थान के उप-मुख्यमंत्री सचिन पायटल को पहले और दूसरे चरण के चुनाव के लिए पश्चिमी यूपी के प्रचार अभियान में उतारने की तैयारी की है. कैराना से भाजपा उम्मीदवार प्रदीप चौधरी, बिजनौर से बसपा उम्मीदवार मलूक नागर जैसे गुर्जर नेता लोकसभा चुनाव में अपनी किस्मत आजमा रहे हैं. देखना है कि गुर्जर किस तरह से अपना सियासी वजूद राष्ट्रीय फलक पर चमका पाते हैं?
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