मार्च के अंत में बजट सत्र के दौरान जैसे ही संसद का पारंपरिक अवकाश शुरू हुआ, राहुल गांधी ने अपना बैग उठाया और भारत से बाहर जाने वाली उड़ान पकड़ ली. सूचना के अधिकार के लिए उनकी घोषित प्रतिबद्धता को झुठलाते हुए उनकी यात्रा की योजनाएं हमेशा गोपनीयता की चहारदीवारी से घिरी होती हैं. हालांकि औपचारिक तौर पर कोई कुछ भी कहने के लिए तैयार नहीं है, ऐसा लगता है कि पार्टी के युवराज दक्षिण-पूर्व एशिया या यूरोप के किसी स्थान पर छुट्टियां मनाने गए हुए थे. अपने पद की पहचान भी जाहिर करने के लिए तैयार न होने वाले एक सूत्र का कहना है, 'वे शायद थाईलैंड या सिंगापुर गए थे.'
यह मार्च में उनकी कोई पहली छुट्टी नहीं थी. 6 मार्च को पांच विधानसभाओं के चुनाव परिणामों की घोषणा के तुरंत बाद राहुल एक और अघोषित छुट्टी पर निकल गए थे. कांग्रेसी स्वीकार करते हैं कि उन्हें उनके पते-ठिकाने की कोई जानकारी नहीं है. पार्टी के एक सांसद मजाक में कहते हैं, 'उनके ट्रैवल प्लान की जानकारी के लिए हम सुब्रमण्यन स्वामी के ट्वीट देखा करते हैं.' स्वामी के ट्वीटों ने उन्हें पहले फ्रांस के तटीय शहर नाइस और फिर थाईलैंड में खोज निकाला.
हफ्तेभर बाद राहुल 15 मार्च को भारत लौटे जबकि संसद का बजट सत्र शुरू हुए तीन दिन बीत चुके थे. वे 12 मार्च को संसद में राष्ट्रपति के अभिभाषण के दौरान सदन में मौजूद नहीं थे. 13 मार्च को यूपीए के सहयोगियों के लिए प्रधानमंत्री ओर से आयोजित भोज और 14 मार्च को रेल बजट पेश किए जाने के दौरान भी वे सदन में मौजूद नहीं थे. मगर प्रणब मुखर्जी के बजट भाषण के लिए वे समय से पहुंच गए जिसके बाद उन्होंने कहा कि यह 'अच्छा बजट' है, लेकिन विस्तृत व्याख्या करने से इनकार कर दिया. उसके बाद तो उन्होंने तभी दर्शन दिया जब पार्टी की ओर से व्हिप जारी किए जाने के कारण उनकी उपस्थिति अनिवार्य थी, जैसे बजट पर मुखर्जी के प्रतिउत्तर के समय, रेल बजट पर मतदान के समय और राष्ट्रपति के अभिभाषण के जवाब के समय.
उन लोगों को निराशा हुई जिन्होंने उत्तर प्रदेश चुनावों के बाद तौर-तरीके में सुधार की उम्मीद की थी. संसद में भी राहुल सदन प्रबंधन की देखरेख सोनिया गांधी और मुखर्जी के भरोसे छोड़ पिछली बेंचों तक ही सीमित रहे. लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण के जवाबी भाषण के दौरान सोनिया को संसदीय कार्यमंत्री पवन बंसल को निर्देश देते हुए देखा गया जिसके बाद बंसल ने समाजवादी पार्टी के सांसदों से बात की और उन्होंने सरकार के पक्ष में मतदान किया.
संसद के अंदर हो या बाहर, अपनी बीमारी के बावजूद असली नेतृत्व सोनिया ही कर रही हैं. उत्तराखंड संकट का निबटारा भी 10 जनपथ के प्रबंधकों ने ही किया. बीमारी के बाद सोनिया को उम्मीद थी कि राहुल जिम्मेदारी संभालेंगे और उन्हें आराम करने का मौका मिलेगा. मगर ऐसा लगता है कि कांग्रेस अध्यक्ष को अपनी सेवानिवृत्ति की योजना टालनी पड़ेगी.
पार्टी के एक सचिव कहते हैं, 'आपको तो पता ही है कि राहुल कैसे काम करते हैं, चुनिंदा लोगों की टोली में पूरी गोपनीयता के साथ. हमें उनकी यात्रा-योजनाओं की कोई जानकारी नहीं है और सच पूछा जाए तो वे देश में रहें या बाहर, इससे हमें कोई फर्क नहीं पड़ता. वे पूरी पार्टी को शामिल नहीं करते.' उत्तर प्रदेश के चुनाव परिणामों की समीक्षा के लिए मार्च के अंत में होने वाली बैठक को राहुल ने 6 और 7 अप्रैल तक के लिए टाल दिया और बाहर चले गए. हालांकि उन्होंने स्वदेश लौटने के बाद 5 अप्रैल को उत्तर प्रदेश में हार के कारणों का पता लगाने की कोशिश की और 2014 के चुनाव को लक्ष्य बताया.
निराश कांग्रेसियों का कहना है कि टीम राहुल में कोई खास पछतावा नहीं दिखता. एक कांग्रेसी सांसद का कहना है, 'कनिष्क (प्रमुख सहयोगी) ऐंड कंपनी को यह नहीं लगता कि पार्टी को पराजय का सामना करना पड़ा है. वे यह बात करते हैं कि कैसे सहारनपुर में पिछले विधानसभा चुनाव के मुकाबले तीन गुना अधिक वोट मिले और लगभग 150 सीटों पर पार्टी को 20,000 से अधिक वोट मिले हैं.' राहुल के विश्वस्त सहयोगी लैपटॉपधारी कनिष्क सिंह उन तक पहुंचने के रास्ते को नियंत्रित करते हैं.
उत्तर प्रदेश चुनाव में पराजित प्रत्याशियों को हार के कारणों की व्याख्या करने के लिए एक प्रश्नावली दी गई. वह कांग्रेसी शिकायती लहजे में कहता है, 'राहुल ने कोई सबक नहीं सीखा है. ये लैपटॉपी समाधान कोई हल नहीं हैं. मुझे अपनी हार की वजह पता है. कोई विश्वसनीय स्थानीय नेता ही नहीं था.'
इस समय उत्तर प्रदेश में बड़े जनाधार वाला कोई नेता नहीं है. राहुल को एक नया चेहरा तैयार करना पड़ेगा. मगर उसके लिए उन्हें थाईलैंड की बजाए लखनऊ में होना चाहिए.

