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उद्धव और कोश्यारी के बीच अनायास नहीं है छत्तीस का आंकड़ा

उद्धव के लिए इस्तीफा देने की नौबत आ गई थी. तब प्रधानमंत्री के हस्तक्षेप से सुलझा था मामला.

राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी और मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे (फोटोः पीटीआइ/कोलाज)
राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी और मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे (फोटोः पीटीआइ/कोलाज)
अपडेटेड 12 फ़रवरी , 2021

महाराष्ट्र सरकार की तरफ से राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी को उत्तराखंड जाने के लिए विमान देने से मना करने को लेकर सियासी बवाल जारी है. राज भवन और मुख्यमंत्री कार्यालय भले एक-दूसरे की गलती होने की बात कर रहे हैं, लेकिन हकीकत यह है कि सीएम और राज्यपाल के बीच छत्तीस का आंकड़ा सियासी वजह से है. उद्धव के सीएम बनने के बाद दोनों के बीच तकरार का सिलसिला जारी है.

इस सियासी संग्राम की शुरूआत वर्ष 2019 में तब हुई जब उद्धव ने सीएम पद पर दावेदारी ठोंक कर भाजपा के साथ नाता तोड़ लिया था. उद्धव जब तक कांग्रेस और एनसीपी का समर्थन पत्र हासिल करने की जुगत में लगे थे उसी बीच देवेंद्र फड़नवीस ने शरद पवार के भतीजे का समर्थन हासिल कर रातोंरात बाजी पलट दी और मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली थी. उद्धव ने राज्यपाल की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहा था कि राज्यपाल, भाजपा की शह पर काम कर रहे हैं और जिस व्यक्ति ने विधायकों के समर्थन वाला पत्र राज्यपाल को नहीं सौंपा उसे सीएम पद की शपथ दिला दी. खैर, चंद दिनों बाद ही फड़नवीस को पद से इस्तीफा देना पड़ा और उद्धव एनसीपी तथा कांग्रेस के समर्थन से मुख्यमंत्री बनने में कामयाब रहे.

उद्धव सीएम तो बन गए लेकिन छह महीने के अंदर ही उन्हें विधानसभा या विधान परिषद् से चुन कर आने की संवैधानिक जरूरत पूरी करनी थी. कोश्यारी ने यहां अड़ंगा लगा दिया. 28 नवंबर 2019 को सीएम बने उद्धव के लिए 27 मई तक किसी भी सदन से चुनकर आना जरूरी था. विधानपरिषद् की 9 सीटों के लिए चुनाव अप्रैल 2020 में होने थे लेकिन कोरोना की वजह से चुनाव आयोग ने चुनाव टाल दिए. इसके बाद महाराष्ट्र सरकार के मंत्रिमंडल ने दो बार पत्र लिखकर कोश्यारी से आग्रह किया कि वह उद्धव ठाकरे का मनोनयन विधानपरिषद् के लिए करें, लेकिन कोश्यारी इस पत्र पर चुप्पी साधे बैठे रहे. इसके बाद स्थिति यहां तक आ गई कि लगने लगा कि उद्धव छह महीने के अंदर किसी भी सदन के सदस्य नहीं बन पाएंगे और उन्हें इस्तीफा देना होगा. कोश्यारी के इस रुख के बाद उद्धव ने पीएम मोदी से फोन पर बात की और उद्धव विधानपरिषद् के सदस्य बन, अपनी कुर्सी बचा सके.

इस प्रकरण के बाद भी राज्यपाल से उनकी तल्खी कम नहीं हुई. बीते अक्तूबर में राज्यपाल ने तंज भरी चिठ्ठी उद्धव को लिखते हुए अनलॉक में मंदिर नहीं खोलने को लेकर सवाल उठाया. राज्यपाल ने पत्र में लिखा कि अनलॉक में बार-रेस्तरां सब खोले जा रहे हैं लेकिन मंदिर पर ताला जड़ा है, क्या यह सेक्यूलर बनने की कोशिश है. इसको लेकर भी खूब जुबानी जंग हुई थी. बात यही नहीं थमी. राज्य सरकार यह आरोप लगा रही है कि 12 एमएलसी का मनोनयन राज्यपाल जानबूझ कर नहीं कर रहे हैं. कई बार पत्र लिखा गया लेकिन राज्यपाल चुप्पी साधे बैठे हैं. शिवसेना नेता और राज्यसभा सांसद संजय राउत कहते हैं कि राज्यपाल को 15 मिनट विमान में बैठना पड़ा तो अपमान लगता है, लेकिन राज्यपाल कैबिनेट से पारित 12 एमएलसी के नाम पर इतने समय से फैसला नहीं ले रहे हैं, यह भी अपमान है.  

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