पहाड़ के बारे में कभी प्रचलित रही कहावत कि 'सूर्य अस्त पहाड़ मस्त' अब कुछ इलाकों में गुजरे वक्त की बात होती जा रही है. पहले शादी-ब्याह और सार्वजनिक आयोजनों के मौके बिना शराब के कल्पना से परे थे, लेकिन अब शराब के खिलाफ महिलाओं के आंदोलन ने इसे सच कर दिखाया है. उत्तरकाशी में भटवाड़ी से लेकर चमोली में बदरीनाथ के समीप पांडुकेश्वर और भ्यूडार के कई छोटे-बड़े इलाकों में इस तरह के स्वप्रेरित अभियान तेजी से पैर पसार रहे हैं. इस आंदोलन की शुरुआत महिलाओं ने की, पुरुष भी इसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं क्योंकि शराब के दुष्प्रभाव और उससे जुड़े गंभीर हादसों को वे अतीत में झेल चुके हैं.
चमोली में केदारनाथ और बदरीनाथ के बीच मंडल घाटी में दर्जनों गांवों में शराब पर प्रतिबंध है. शादी, मुंडन, भागवत, पूजा-पाठ और स्थानीय स्तर की रामलीला के दौरान शराब के सार्वजनिक उपयोग पर पाबंदी है. यह पाबंदी मंडल, खल्ला कोटसीर, बड़द्वारा, सिरोली, कुनकुली, बैरागना से लेकर देवलधार आदि गांवों में लागू है.
इस आंदोलन की अगुआ मंडल महिला समूह से जुड़ी लक्ष्मी देवी कहती हैं, ‘आयोजन के दौरान दारू न बंटे, इसकी जिम्मेदारी मेजबान को सौंपी गई है. किसी भी गांव में सार्वजनिक तौर पर शराब बांटने या पीने पर पहले जुर्माना और फिर सामाजिक बहिष्कार का डर पैदा किया गया है.’ मंडल में पिछले साल 25 सितंबर से पाबंदी लागू है.
मंडल क्षेत्र में इस कार्य को आगे बढ़ाने में दशोली के प्रमुख भगत सिंह बिष्ट समेत पंचायत प्रतिनिधि भी साथ दे रहे हैं. बदरीनाथ के रास्ते पर पांडुकेश्वर गांव में एक हफ्ते पहले ग्रामवासियों ने संकल्प लिया.
पांडुकेश्वर में संकल्प लेने के तीसरे दिन 4 फरवरी को गुड्डू मेहता के बेटे के मुंडन संस्कार में पहली बार लोगों ने बिना शराब और बिना डीजे के पार्टी देखी. इसके बाद पांडुकेश्वर में महिलाओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने बैठक की और सार्वजनिक आयोजनों में शराब के साथ-साथ डीजे को भी सामूहिक रूप से प्रतिबंधित कर दिया.
पांडुकेश्वर के करीब भ्यूडार गांव से आए मेहमानों को यह निर्णय इतना भाया कि दूसरे दिन ही भ्यूडार के पुलना गांव में भी इन चीजों पर पाबंदी लगा दी गई. भ्यूडार की महिला मंडल दल की अध्यक्ष शशि चौहान के नेतृत्व में 7 फरवरी को ग्रामीणों के एक समूह ने जोशीमठ में उपजिला अधिकारी को इसकी सूचना देते हुए इस कार्य में मदद की मांग करते हुए ज्ञापन भी दिया. भ्यूडार के बबलू चौहान कहते हैं कि पांडुकेश्वर में इस तरह के फैसले का जीता-जागता उदाहरण हमारे गांव के लोगों को भी प्रभावित कर गया है.
चमोली में मंडल से पहले गौचर और उससे पहले गैरसैंण के प्यूरा व छिमटा गांवों में ये प्रयोग सफल हो चुके हैं. छिमटा में छह महीने से शराब पूरी तरह बंद है. प्यूरा के जनता हाईस्कूल के प्रधानाध्यापक बचन सिंह कहते हैं, ‘मांग न होने से शराब की अवैध भट्ठियां बंद हो गई हैं.
टिहरी में पिछले 20 सालों से जल, जंगल और जमीन के मुद्दों को लेकर जन-जागरण में जुटे सुरेश भाई कहते हैं, ‘इन आंदोलनों के मूल में सामाजिक जनचेतना फैला रहे सक्रिय लोग हैं. ये प्रयोग बहुत लाभकारी और प्रभावी हैं.’ जखोली में चार गांवों की इस मुहिम में महिलाओं का साथ दे रहे शिक्षाविद् एवं राजनैतिक कार्यकर्ता ललिता प्रसाद भट्ट इसे और भी बड़े स्तर पर फैलाने की बात करते हैं.
उत्तराखंड ओपन विवि में निदेशक व उत्तराखंड में शराब के विभिन्न पह्नों पर शोध कर चुके प्रो. गिरिजा पांडे कहते हैं, ‘इन आंदोलनों से फौरी तौर पर राहत तो मिल सकती है, पर समस्या का निदान राजनैतिक हल में छुपा है. शराब के सामाजिक, सांस्कृतिक पक्षों को समझने की जरूरत है.’
यह आंदोलन पहले भी कई इलाकों में चला पर व्यवस्थित रूप नहीं ले सका है. लेकिन इसकी प्रासंगिकता और क्रियान्वयन में सरलता के कारण यह व्यक्तियों और अखबारों के जरिए एक गांव से दूसरे गांव में फैल रहा है.

