आदर्शवादी लोग कभी भी संतुष्ट नहीं होते. वे हमेशा शुद्धतर चीजों पर जोर देते रहते हैं. चर्चिल को याद करें तो लगता है गोया लोकतंत्र पर अब कोई बहस ही नहीं बची. उन्होंने कहा था कि लोकतंत्र बुरा हो सकता है, लेकिन बाकी सब कुछ बदतर ही है. इसके बावजूद 'संपूर्ण लोकतंत्र' की खोज अब भी आदर्शवादियों के बीच जारी है. हो सकता है इसका कोई नतीजा न निकले, संभव है यह भ्रम ही हो. शुद्धता स्वर्ग में ही मिल सकती है, धरती पर तो पतन के गर्त में ले जाने के रास्ते ही हैं.
और अगर ये रास्ते भारत में हों, तो उन पर चलने में बदबू भी आती है. मसलन, एक चुनाव की शुरुआत कुछ यूं होती है कि कोई नेता अपनी मर्जी से प्रत्याशी चुन लेता है. मतदाता को चुने हुए लोगों में से ही चुनना है. यहां योग्यता मायने नहीं रखती, सबसे पहले वफादारी, फिर जाति-क्षेत्र की बाध्यताएं होती हैं. जैसे-जैसे यह रास्ता विशेष लोगों के लिए आरक्षित जगह राष्ट्रपति भवन की ओर बढ़ता है, जटिलताएं बढ़ती जाती हैं. बस एक बात का सुख है कि चुनाव की प्रक्रिया अपने आप में एक दिलचस्प दास्तान बनकर उभर आती है.
चुनने वाला जितना तंगदिमाग होगा, चुनाव भी उतने ही तंग होंगे. अगर भारत के लोग अपना राष्ट्रपति चुन रहे होते तो तस्वीर बिलकुल साफ होती-सत्ता पक्ष का प्रत्याशी हार जाता. लेकिन यहां वोट सांसदों-विधायकों को डालने हैं और चूंकि पूरा राजनैतिक वर्ग ही अव्यवस्थित है, लिहाजा राष्ट्रपति का चुनाव व्यवस्थित कैसे हो सकता है. किसी के पास संख्या बल नहीं है. कांग्रेस अब भी खामखयाली में है कि वह लोगों के गुस्से के पार सुरक्षित रहेगी, हालात अपने नियंत्रण में रखेगी, बस श्रीमती गांधी की जादू की छड़ी घूमने की देरी है. मुलायम सिंह यादव और ममता बनर्जी ने दरअसल इस छड़ी से जादू छीन लिया है. उन्होंने कांग्रेस को यह जता दिया है कि असीमित शक्ति देवताओं के मामले में सही हो सकती है, लेकिन पर इनसानी मामलों में ऐसा नहीं होता.
सियासत में हादसे नहीं होते. राष्ट्रपति अब्दुल कलाम का नाम अचानक नहीं उछला है. इसे उछालने वाले जानते थे कि एनडीए कलाम को दोबारा लाना चाहता था लेकिन उसमें इसकी क्षमता नहीं थी, लिहाजा रणनीति के तहत चुप्पी साधे था. उन्होंने यूपीए के सिंहासन के नीचे डायनामाइड लगा दिया है. मुलायम के पास इस डायनामाइड का फ्यूज है और ममता के हाथ में तीली. कांग्रेस किसी कीमत पर उन्हें स्वीकार नहीं कर सकती.
उनकी दलील भी काफी शालीन है. कलाम पर आम राय भी बनती है और राष्ट्रपति पद की गरिमा भी बच जाती है. यूपीए की महत्वपूर्ण सहयोगी द्रमुक भुला नहीं सकती कि कलाम तमिल हैं, ठीक वैसे ही जैसे पांच साल पहले शिवसेना ने मराठी प्रतिभा पाटील को स्वीकारा था. शरद पवार लगातार आम राय पर जोर दे रहे थे. लेकिन ध्यान रहे कि सहमति का मतलब एकमत होना नहीं होता.
कांग्रेस ने मुगालते में हकीकत को देखने से इनकार कर दिया. सत्ता में आठ साल का वक्त काफी लंबा होता है. उसे तो यह समझने में भी वक्त लगा कि मुलायम-ममता ने मनमोहन का नाम क्यों लिया. सोनिया को कुछ राहत मिल पाती, उससे पहले ही कुछ घंटों के भीतर प्रधानमंत्री ने खुद इस विकल्प को ठुकरा दिया. यह उनका अपना फैसला था.
लेकिन तब तक मुलायम के प्रवक्ता देश को टीवी पर बता चुके थे कि वे मनमोहन को इसलिए ऊपर की कुर्सी पर भेजना चाहते थे ताकि कोई काबिल आदमी प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठ सके. उन्होंने अजीम प्रेमजी का हवाला दिया जिन्होंने यूपीए को नेताविहीन करार दिया था. संकेत साफ हैं. सपा और तृणमूल कांग्रेस अब संसद में मनमोहन सरकार के साथ खड़े नहीं होने वाले-बशर्ते अगला सत्र हम देख पाएं.
कांग्रेस सियासत की कानाफूसियों से भी बेखबर रही. यह जो तमाशा हम देख रहे हैं, एक नहीं दो चुनावों के लिए हो रहा है. दो रणनीतियां समानांतर चल रही हैं और कभी भी एक-दूसरे को काट सकती हैं. दूसरी रणनीति ज्यादा अहम है-अगले आम चुनाव की रणनीति. मुलायम की चाल पूरी तरह पारदर्शी है.
लोकसभा क्षेत्रों के सपा प्रत्याशी चुनने के लिए वे संसदीय बोर्ड की बैठक कर चुके हैं. वे जल्दी चुनाव चाहते हैं. वे जानते हैं कि वक्त के साथ उनकी संभावनाएं कम हो जाएंगी. अगर यूपीए अपने प्रत्याशी को राष्ट्रपति नहीं बनवा पाई, तो सरकार गिर जाएगी.
देश की राजनीति पर मुलायम-ममता की साझेदारी के असर का यह पहला नजारा है. उनका पहला उद्देश्य कांग्रेस को पीछे धकेल देना है और दूसरा 2013 के चुनावों में 60 से 70 के बीच सीटें लाना ताकि छोटे दलों के साथ मिलकर 100 या उससे ज्यादा सांसदों का एक धड़ा बनाया जा सके. अगले गठबंधन में इससे उनकी सौदेबाजी की ताकत बढ़ जाएगी.
मुलायम लखनऊ को अखिलेश के भरोसे बुढ़ापे के कारण नहीं छोड़ आए हैं. दरअसल उनकी नजर दिल्ली पर है.
यूपीए इस तमाशे को सामान्य घटनाओं का नाम देकर अपनी शिकन छुपा सकती है, प्रधानमंत्री दुनिया की बची-खुची खूबसूरत जगहों पर 10 दिन की और सैर कर सकते हैं. लेकिन उनकी सरकार का हाल अब कांग्रेस के समर्थन के बगैर देवेगौड़ा या गुजराल वाली सरकारों जैसा नाजुक हो गया है. जब लोकतंत्र भ्रम की गंगा में हिचकोले खाने लगे, तो समझिए एक ही इलाज है- और लोकतंत्र. यानी चुनाव का वक्त आ गया है.

