आम तौर पर विश्वविद्यालय में जाने को समय की बर्बादी मानने वाले लोग विरले ही होते हैं. अक्तूबर, 2011 में अपनी अकाल मृत्यु से पहले एप्पल को दुनिया की 10 खरब डॉलर की पहली कंपनी बनाने वाले उत्कृष्ट सीईओ स्टीव जॉब्स ग्रेजुएशन की पढ़ाई के लिए सिर्फ छह महीने तक ही कॉलेज गए थे. दुनिया के दूसरे सबसे अमीर और माइक्रोसॉफ्ट के संस्थापक बिल गेट्स ने हार्वर्ड में इससे थोड़ा-सा ज्यादा वक्त गुजारा था.
अपने देश में देखें तो दिग्गज कारोबारी धीरूभाई अंबानी को किसी विश्वविद्यालय में दाखिले का मौका तक नहीं मिला. वे भारत के सबसे अमीर शख्स बने. गौतम अडाणी ने भी बीच में ही कॉलेज छोड़ दिया और अंबानी की तरह अरबपति बने. बेहद कामयाब उद्यमियों के ऐसे कई और भी उदाहरण हैं जिन्होंने विश्वविद्यालय की पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी थी.
बदकिस्मती से ज्यादातर लोग अपवाद नहीं होते और न ही वे जबरदस्त प्रतिभावान ही होते हैं, साथ ही उनमें उद्यम क्षमता का भी अभाव होता है. अधिकतर लोगों के लिए किसी विश्वविद्यालय की अच्छी शिक्षा ही सफलता का पासपोर्ट होती है. आप पूछ सकते हैं कि ऐसी पोस्ट ग्रेजुएट डिग्रियों (एमए, एमएससी, एमकॉम और एमफिल, पीएचडी) का क्या फायदा है जो एमबीए की तरह नौकरी दिलाने वाली पेशेवर योग्यता से लैस न कर सके? जवाब है, इसके काफी फायदे हैं.
यही वजह है कि इंडिया टुडे ने कला, वाणिज्य और विज्ञान में पोस्ट ग्रेजुएट डिग्री कराने वाले भारत के विश्वविद्यालयों की गुणवत्ता आंकने के लिए 2010 में एक खास विश्वविद्यालय सर्वे और रैंकिंग कराने का फैसला किया.
अपने तीसरे संस्करण में इंडिया टुडे-नीलसन सर्वे भारत के 50 शीर्ष विश्वविद्यालयों (सर्वे किए गए 160 में से) की रैंकिंग कर रहा है. हमारे हाथोंहाथ लिए जाने वाले कॉलेज सर्वे की तरह ही यह रैंकिंग भी देशभर में छात्रों, अभिभावकों और शिक्षा जगत से जुड़े लोगों के लिए जादुई पैमाने की तरह उभरकर सामने आई है. इस साल पहली बार हम पांच सबसे तेजी से उभरते और पांच सबसे बड़े पिछड़ों की सूची भी अलग से दे रहे हैं. हमने क्षेत्र के हिसाब से भी पांच शीर्ष विश्वविद्यालयों की सूची दी है.
पश्चिम की विकसित अर्थव्यवस्थाओं में विश्वविद्यालय की ग्रेजुएशन की डिग्री आम तौर पर अच्छी नौकरी पाने के लिए काफी है. भारत में ग्रेजुएशन की डिग्री शायद ही कभी आकर्षक नौकरी दिला पाने में पर्याप्त होती है. हो सकता है कि जाने-माने विश्वविद्यालयों के गिने-चुने नामी कॉलेज नौकरी दिला पाने में मददगार होते हों.
लेकिन ऐसे में पोस्टग्रेजुएशन की डिग्री रंग दिखा सकती है. यह इसलिए नहीं कि एमए या एमएससी की पढ़ाई कर लेने से भावी नियोक्ता की नजर में संभावित कर्मचारी की उत्पादकता बढ़ जाती हो. लेकिन व्यक्ति के पास अतिरिक्त डिग्री उसके ज्यादा काबिल होने की ओर इशारा करती है.
अमेरिकी अर्थशास्त्री माइकल स्पेंस को अपने इन विचारों के लिए नोबल पुरस्कार मिल चुका है. यही वजह है कि शीर्ष रैंक वाले विश्वविद्यालयों के छात्रों को निचले रैंक वाले विश्वविद्यालयों की तुलना में बेहतर नौकरियां मिलती हैं. इसलिए नहीं कि उन्होंने अधिक या बेहतर गुणवत्ता वाली पढ़ाई की है, बल्कि इसलिए कि उन्होंने (दूसरों की तुलना में) शीर्ष रैंक वाले विश्वविद्यालय में अतिरिक्त डिग्री के लिए एडमिशन लेकर अपनी उच्च क्षमता को दर्शाया है.
प्रतिष्ठा अकसर नजर नहीं आती है और न ही इसका अंदाजा लगाया जा सकता है. नीलसन के साथ साझेदारी में इंडिया टुडे के श्रेष्ठ विश्वविद्यालयों के सर्वे में भारत के श्रेष्ठ विश्वविद्यालयों की रेटिंग के लिए व्यापक फील्डवर्क और आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया है. इसमें व्यक्तिपरक मापदंड (जैसे देशभर के शीर्ष शिक्षाविदों की राय) और वस्तुपरक मापदंड (शिक्षक-छात्र अनुपात, कराए जाने वाले कोर्स आदि) को शामिल किया गया है.
2011 की ही तरह दिल्ली विश्वविद्यालय इस बार भी शीर्ष पर है. इसके बाद बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, कलकत्ता विश्वविद्यालय और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय का नंबर आता है. ये सभी विश्वविद्यालय पिछले साल भी शीर्ष 5 में शामिल थे. उनके रैंक में थोड़ा सा बदलाव जरूर आया है लेकिन अपनी प्रतिष्ठा बनाने और नीचे से ऊपर तक पहुंचने में उन्होंने लंबा सफर तय किया है.
शीर्ष पांच में नया नाम अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) का है. कुछ हद तक इसकी एक वजह यह भी रही है कि मुंबई, आइआइएससी-बंगलुरु और पुणे जैसे कुछ विश्वविद्यालय अपनी कुछ बाध्यताओं के कारण तथ्यपरक आंकड़े उपलब्ध नहीं करा सके, जिसकी वजह से वे हमारे सर्वेक्षण में शामिल नहीं हो सके. लेकिन यह भी सही है कि एएमयू का इस तरह आगे आना यह दर्शाता है कि यह विश्वविद्यालय अपनी पुरानी प्रतिष्ठा फिर से हासिल करने की जद्दोजहद में है. यह संभव है कि विभिन्न विश्वविद्यालयों की रैंक को लेकर थोड़ी बहुत टीका-टिप्पणी हो लेकिन इसके समूचे रुझन पर शायद ही कोई सवाल उठाएगा.
विकसित अर्थव्यवस्थाओं में आम तौर पर लोग उस समय ही पोस्टग्रेजुएट डिग्री का रुख करते हैं जब उन्हें शोध या शिक्षण से जुड़े करियर में जाना होता है. भारत में भी विश्वविद्यालयों के लिए बहुत सारे शिक्षकों की जरूरत है. केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल के मुताबिक, भारत की 2017 तक 200 नए विश्वविद्यालय स्थापित करने की योजना है. मानव संसाधन विकास मंत्री सिब्बल चाहते हैं कि देश में हाइस्कूल से विश्वविद्यालय जाने वाले छात्रों के प्रतिशत को मौजूदा 15 से बढ़ाकर 30 फीसदी पर पहुंचाया जाए. लिहाजा, भारत में मास्टर डिग्री और पीएचडी को प्रोत्साहन दिए जाने की जरूरत है.
निजी क्षेत्र भारत की विश्वविद्यालय स्तरीय प्रणाली के विस्तार में पहले ही महती भूमिका निभा रहे हैं. आगे इसकी भूमिका बढ़ेगी ही क्योंकि सरकार अकेले अपने दम पर तेजी से बढ़ती उच्च शिक्षा की मांग को पूरा नहीं कर सकती. दुर्भाग्य से 2000 के दशक के मध्य में एक दौर ऐसा भी आया जब रातोंरात कुछ ऐसे संस्थान पैदा हो गए जिन्होंने गुणवत्ता के उच्चतम मानक पूरे किए बगैर ही डीम्ड विश्वविद्यालय का दर्जा हासिल कर लिया था.
सौभाग्य से उस दौर को हम पीछे छोड़ आए हैं. अब देश के कुछ दिग्गज उद्योगपति विश्वविद्यालयों में निवेश कर रहे हैं और उनका मकसद उन्हें उत्कृष्टता के वैश्विक ठिकानों में बदलना है.
बंगलुरू में अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय, ग्रेटर नोएडा में शिव नाडर विश्वविद्यालय और सोनीपत में ओ.पी. जिंदल विश्वविद्यालय के लिए इस रैंकिंग में स्थान बनाना अभी बहुत जल्दबाजी होगी. लेकिन भविष्य उन्हीं का है न कि चरमराते सरकारी विश्वविद्यालयों या रातोरात गायब हो जाने वाले ऑपरेटरों का.
देश में दिग्गज उद्योगपतियों की ओर से उत्कृष्ट विश्वविद्यालयों को धन उपलब्ध कराने की परंपरा रही है. पिलानी स्थित बिऱला इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी ऐंड साइंसेज इंडिया टुडे की रैंकिंग में लगातार अपनी मौजूदगी दर्ज कराए हुए है. इसकी स्थापना जी.डी. बिरला ने एक विश्वविद्यालय के रूप में की थी. विश्वविद्यालय के वर्तमान चांसलर कुमार मंगलम बिरला हैं जो 1,75,000 करोड़ रु. के आदित्य बिरला समूह के प्रमुख हैं.
भारतीय विश्वविद्यालयों को वैश्विक प्रतिष्ठा की सीढ़ी चढ़ने के लिए अभी काफी लंबा सफर तय करना है. अकसर, आइआइटी और आइआइएम ही सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालयों की अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग में स्थान हासिल कर पाते हैं. विश्वविद्यालयों के बीच प्रतिस्पर्धा से उत्कृष्टता हासिल करने में मदद मिल सकती है. और कुछ नहीं तो इस तरह की रैंकिंग भारत के करीब 300 विश्वविद्यालयों को अपना स्तर सुधारने के लिए खूब प्रेरित करेगी. और इस तरह भारत को ही फायदा होगा.
तरीका: कैसे अंजाम दी गई रैंकिंग
इंडिया टुडे का नीलसन कंपनी के साथ कला, विज्ञान और वाणिज्य विषयों के भारत के श्रेष्ठ विश्वविद्यालयों की पहचान के लिए यह तीसरा सर्वे है. सिर्फ उन्हीं विश्वविद्यालयों को इसमें तरजीह दी गई है जहां कला, विज्ञान और वाणिज्य में पोस्टग्रेजुएट कोर्सेज कराए जाते हैं. इस सर्वेक्षण में राष्ट्रीय महत्व के उन संस्थानों को शामिल नहीं किया गया है जो किसी एक क्षेत्र जैसे इंजीनियरिंग, मेडिसिन, लॉ या पत्रकारिता आदि में विशेषज्ञता रखते हैं.
इसी वजह से इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (आइआइटी), ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (एम्स) या नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एनआइटी) को सूची से बाहर रखा गया है. रैंक का पता लगाने के लिए अवधारणात्मक स्कोर (अकादमिक विशेषज्ञों से लिए गए गहन साक्षात्कार) और वस्तुपरक स्कोर (विश्वविद्यालयों द्वारा मुहैया कराए गए तथ्यात्मक आंकड़े) को मिलाकर बनाए गए एक फ ॉर्मूले की मदद ली गई.
चरण 1: विशेषज्ञों के साथ गहन साक्षात्कार किए गए ताकि अध्ययन के अंत में उन मानकों की पुष्टि की जा सके जिन पर विश्वविद्यालयों का आकलन किया जाना है. इन मानकों में प्रतिष्ठा, अकादमिक संसाधन, फैकल्टी, शोध प्रकाशन/परियोजनाएं, बुनियादी ढांचा, प्लेसमेंट के अवसर और उच्च शिक्षा के लिए पंजीकरण शामिल हैं.
चरण 2: सर्वेक्षण के लिए विश्वविद्यालयों की सूची प्राप्त करने के लिए डेस्क रिसर्च की गई. इंटरनेट, प्रकाशित रिपोर्ट और एसोसिएशन फॉर इंडियन यूनिवर्सिटीज की हैंडबुक जैसे गौण स्त्रोतों का इस्तेमाल भी किया गया. इसके बाद 160 से ज्यादा विश्वविद्यालयों की एक समग्र सूची तैयार की गई.
चरण 3: इन 160 विश्वविद्यालयों की सूची 337 विशेषज्ञों (डीन, रजिस्ट्रार, रीडर और प्रोफेसर) के सामने रखी गई और घोषित मानकों के आधार पर उनसे इनकी रेटिंग करने के लिए कहा गया. इन विशेषज्ञों से अपने विश्वविद्यालय को रेटिंग देने से मना किया गया था. उन्हें दिए गए मानकों के आधार पर विश्वविद्यालयों को 100 अंक बांटने के लिए कहा गया. हर मानक को अतिरिक्त महत्व दिया गया था जो विशेषज्ञों द्वारा दिए गए औसत रेटिंग के आधार पर तय किया गया था. इस तरह सबसे अहम मानक को सबसे ज्यादा महत्व और सबसे कम अहम मानक को सबसे कम महत्व दिया गया था. अहमियत के आधार पर पांच प्रमुख मानकों को विशेषज्ञों द्वारा दी गई रेटिंग के आधार पर किसी विश्वविद्यालय का कुल अवधारणात्मक स्कोर तय किया गया. इस कवायद के अंत में शीर्ष 75 विश्वविद्यालयों की एक सूची निकलकर आई.
चरण 4: इन शीर्ष 75 विश्वविद्यालयों से हमने तथ्यात्मक जानकारी जुटाई. इनमें से 50 ने अपने आंकड़े हमसे साझ किए. ये आंकड़े बुनियादी ढांचे, प्लेसमेंट, अकादमिक संसाधन, शोध और प्रकाशन तथा फैकल्टी से जुड़े थे. आखिरी रैंकिंग प्रक्रिया में उन विश्वविद्यालयों को शामिल नहीं किया जिन्होंने अपने आंकड़े मुहैया नहीं कराए थे.
चरण 5: चरण 3 में विशेषज्ञों की राय लेने के बाद हमने अवधारणात्मक और तथ्यात्मक सूचना का वेटेज निकाला. कुल स्कोर पाने के लिए अवधारणात्मक स्कोर को 50 फीसदी और तथ्यात्मक स्कोर को भी 50 फीसदी वेटेज दिया गया. इन वेटेज को आंकने के बाद स्कोर को 100 अंकों के आधार पर सूचीबद्ध किया गया. इस तरह प्रत्येक विश्वविद्यालय की समग्र तस्वीर उभरकर सामने आई.

