बजट पेश हुए अभी चौबीस घंटे भी नहीं बीते कि देश के मजदूर संगठनों ने प्रस्तावित निजीकरण के विरोध का ऐलान कर दिया है. अभी तो यह भी नहीं पता चला था कि निजीकरण किस तरह किया जाएगा? संपत्तियों का मूल्य (प्राइस डिस्कवरी) किस तरह होगी? कोरी घोषणाओं पर ही अगर विरोध के ऐलान होने लगे हैं तो यह स्पष्ट है कि सरकार के लिए आने वाले वित्त वर्ष में यह बड़ी चुनौती बनकर सामने आने वाली है. गौरतलब है कि सरकार ने वित्त वर्ष 2021-22 के बजट में बड़े पैमाने पर सरकारी संपत्तियों को बेचकर राजस्व जुटाने का ऐलान किया है.
ये कर रहे हैं प्रदर्शन
देश के 10 मजदूर संगठनों ने संयुक्त मंच से बजट में प्रस्तावित निजीकरण के खिलाफ देशव्यापी विरोध प्रदर्शन करने का ऐलान किया है. इनमें इंडियन नेशनल ट्रेड यूनियन कांग्रेस (इंटक), ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (एआइटीयूसी), हिंद मजदूर सभा (एचएमएस), सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियन (सीटू), ऑल इंडिया यूनाइटेड ट्रेड यूनियन सेंटर (एआइयूसीयूसी), ट्रेड यूनियन को-ऑर्डिनेशन सेंटर (टीयूसीसी), स्वरोजगार महिला संघ (सेवा), ऑल इंडिया सेंट्रल काउंसिल ऑफ ट्रेड यूनियंस (एआइसीसीटीयू), लेबर प्रोग्रेसिव फेडरेशन (एलपीएफ) और यूनाइटेड ट्रेड यूनियन कांग्रेस (यूटीयूसी) शामिल हैं.
इन दस मजदूर संगठनों के संयुक्त मंच ने एक बयान में कहा, ‘‘केंद्रीय मजदूर संघों और स्वतंत्र क्षेत्रीय महासंघों/ संघों के संयुक्त मंच ने श्रम संहिता और बिजली बिल 2020 को खत्म करने, निजीकरण रोकने और आय समर्थन तथा सभी के लिए भोजन की मांग को लेकर तीन फरवरी को देशव्यापी विरोध प्रदर्शन करने के लिए यूनियनों और कामगार वर्ग से आह्वान किया है." इसके साथ ही संयुक्त मंच ने श्रम संहिताओं को रद्द करने और गरीब मजदूरों को आय तथा खाद्य सुरक्षा देने की मांग भी की है.
संयुक्त मंच ने अपने बयान में कहा कि आम बजट में घोषित नीतियां किसान विरोधी हैं, जिनका वह विरोध करेगा. बयान के मुताबिक, विरोध-प्रदर्शनों के दौरान कार्यस्थलों और औद्योगिक केंद्रों पर बड़ी संख्या में जुटकर सरकारी नीतियों का विरोध किया जाएगा और श्रम संहिता की प्रतियां जलाई जाएंगी.
मजदूर संगठनों ने कहा कि वित्त मंत्री की ओर से पेश किया गया बजट जमीनी हकीकत से बहुत दूर है और आरोप लगाया कि यह राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के लिए पूरी तरह से भ्रामक और विनाशकारी है तथा इससे मेहनतकश लोग बड़े पैमाने पर पीड़ित होंगे.
नहीं है कोई और रास्ता
कोविड के बाद मंदी में धंसी अर्थव्यवस्था को सहारा देने के लिए बड़े पैमाने पर खर्च की जरूरत है. कर के जरिए मिलने वाला राजस्व अर्थव्यवस्था की विकास दर के साथ ही गति पकड़ेगा ऐसे में विनिवेश और सरकारी संपत्तियों के मौद्रीकरण के जरिए ही सरकार संसाधन जुटा सकती है. सरकार ने वित्त वर्ष 2022 के लिए 1.75 लाख करोड़ रुपए के विनिवेश का लक्ष्य रखा है. यह बीते साल के 2.1 लाख करोड़ के लक्ष्य से कम है. कोविड महामारी के कारण सरकार विनिवेश के लक्ष्य को हासिल करने में बुरी तरह पिछड़ी है. अब तक विनिवेश से सरकार करीब 15,000 करोड़ रुपए ही जुटा पाई है. अगले वित्त वर्ष में सरकार ने दो सरकारी बैंक और एक बीमा कंपनी को बेचने का निर्णय लिया है. एलआइसी के आइपीओ की घोषणा बीते वर्ष भी बजट में की गई थी. एयर इंडिया और बीपीसीएल अन्य सरकारी कंपनियां हैं जिनमें सरकार हिस्सेदारी बेचने पर विचार कर रही है.
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