कोई अमेरिका को बताए कि पख्तून लोग कभी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किसी जिहाद के हिस्से नहीं रहे हैं लेकिन अगर उन पर अमेरिकी हमले इसी तरह बढ़ते गए तो वे खुशी-खुशी अल क़ायदा के साथ हो जाएंगे.
जबरदस्त अफरातफरी में फंसा मेरा मुल्क नाकामी की गिरफ्त में फंसता जा रहा है.
तमाम गुजारिशों के बावजूद अमेरिकी द्रोनों के हमले थमे नहीं हैं और इनके चलते फौज और कबायली लड़ाकों के बीच तनाव का माहौल है. नतीजतन, देश भर में आर्थिक, सामाजिक, सियासी अटकलों का बाजार गरम है. इस हालात का मेरे पास सीधा-सा उपाय है- आमद के सारे रास्ते बंद कर दिए जाएं. अमेरिकी प्रशासन ने हमलों पर रोक लगाने की संभावना से इनकार कर दिया है.
अंतिम हमले में उत्तरी वजीरिस्तान के पहाड़ी इलाके में औरतों और बच्चों समेत 25 लोग मारे गए. 24 अप्रैल को खबैर दर्रे को कुछ समय के लिए बंद कर दिया गया क्योंकि हमलों के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हजारों लोगों ने प्रमुख हाइवे को जाम कर दिया था. पाकिस्तान में हजारों ऐसे लोग हैं जो द्रोन हमलों के खिलाफ हैं. और उनकी तादाद बढ़ती ही जा रही है.
इन हमलों को तुरंत बंद किए जाने की मांग करने वाला मैं कोई पहला आदमी नहीं हूं. सीआइए में नेशनल इंटेलिजेंस काउंसिल के पूर्व उपाध्यक्ष और एशिया के कुछ समस्याग्रस्त क्षेत्रों के गहरे जानकार ग्राहम ई. फुलर ने कहा है कि अमेरिकी और नाटो फौजों की पूरी वापसी से ही पाकिस्तान में कट्टरपंथी भावनाओं के उभार को रोका जा सकता है. इस्लामाबाद को पख्तून शासकों के घर पश्चिमोत्तर सीमावर्ती सूबे से अपनी फौजें निकालने की नीति बनानी चाहिए. वहां करीब 1,48,000 पाकिस्तानी फौजें तैनात हैं.
उस इलाके के लोग बाहरी हमलावरों को हमेशा से नफरत करते रहे हैं. पाकिस्तान से जाने वाले रास्तों से अफगानिस्तान में तैनात नाटो फौजों के लिए 40 प्रतिशत साजो सामान जाता है. पाकिस्तान के खैबर दर्रे से करीब 300 ट्रक और तेल के टैंकर रोज सीमा पार करते हैं. और रोज करीब इतने ही वाहन दक्षिण-पश्चिमी बलूचिस्तान सूबे की चमन सीमा से पार करते हैं.
इन सबका क्या असर पड़ रहा है, यह जगजाहिर है. मुल्क एक के बाद दूसरी सियासी मुसीबत में फंसता जा रहा है. सबसे ताजा मामला सीआइए के एक ठेकेदार रेमंड डेविस का है, जिसने लाहौर में उन दो स्थानीय लोगों को गोली मार दी जिनके बारे में उसका दावा है कि वे उसे लूटना चाहते थे. डेविस को तब रिहा किया गया जब उसने मारे गए लोगों के परिवारों को 23 लाख डॉलर का मुआवजा अदा किया. जैसी कि उम्मीद थी, सरकार इस सवाल पर साफ फैसला न कर पाई कि डेविस राजनयिक रियायत का हकदार था या नहीं. कई लोगों का मानना है कि इस मामले में इस्लामाबाद और वाशिंगटन के बीच सौदा हुआ. ये लोग सही ही मानते हैं कि यह देश की संप्रभुता का मामला था.
पाकिस्तान की कोई विदेश नीति नहीं नजर आती, वह अमेरिका का परोक्ष समर्थन करता रहता है और अमेरिका है कि पाकिस्तानी इलाकों पर द्रोन हमले करता रहता है. ये तमाम बातें मुझे भारी चिंता में डाल देती हैं. यह सब खतरनाक है क्योंकि हमारे पढ़े-लिखे युवा इस्लामी वर्चस्व और अमेरिका विरोध के अस्पष्ट विचारों से प्रेरणा लेते रहते हैं.पाकिस्तान बड़ी तेजी से पतन की ओर जा रहा है और ढंग से काम करने की अपनी क्षमता खोता जा रहा है.
यह सब बदलना चाहिए. हिंसा बंद होनी चाहिए. पाकिस्तानी फौज को यह समझ लेना चाहिए कि पश्चिमोत्तर सूबे का अपना खास सामाजिक मानसिक चरित्र है जिसे हमलों या लड़ाई से कतई नहीं बदला जा सकता बल्कि इससे उलटे इस्लामाबाद के लिए परेशानियां बढ़ेंगी ही.
अगर कबायली लोग और पाकिस्तानी फौज हमेशा टकराव की मुद्रा में रहेंगे तो हम भी उसी तबाही के रास्ते पर होंगे जिस पर पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश थे. राष्ट्रपति बराक ओबामा को अगर पाकिस्तान की जमीनी हकीकतों का पता है तो उन्हें अमेरिकी सोच में तुरंत बुनियादी बदलाव लाना चाहिए. उन्हें एहसास होना चाहिए कि अल क़ायदा की जड़ें पाकिस्तान में नहीं हैं हालांकि कई लोग ओसामा बिन लादेन को मुस्लिम जगत की उन हस्तियों में शुमार करते हैं जो अमेरिकी साम्राज्यवादी मंसूबों का विरोध कर सकती हैं.
कोई अमेरिका को बताए कि पख्तून लोग कभी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किसी जिहाद के हिस्से नहीं रहे हैं, लेकिन उन पर हमले इसी तरह बढ़ते गए तो वे खुशी-खुशी अल क़ायदा के साथ हो जाएंगे. अधिकतर पख्तून तालिबान को पख्तून सत्ता (जो अफगानिस्तान में 2001 में खो गई थी) के प्रमुख औजार के रूप में देखते हैं. अफगानिस्तान के 1.3 करोड़ पख्तूनों के संघर्ष ने पाकिस्तान के 2.8 करोड़ पख्तूनों को परेशान कर दिया है.
अफगानिस्तान की सीमा पर लड़ाई के चलते हालात विस्फोटक हो गए हैं. इसका असर पाकिस्तान के सीमवर्ती इलाकों में महसूस किया जा रहा है, जहां निरंतर अमेरिकी दखल, द्रोन हमलों और हत्याओं के कारण कबायली लोग तबाह हैं. इस बात पर तो किसी ने ध्यान ही नहीं दिया है कि कट्टरपंथियों ने सैकड़ों उलमाओं की हत्या कर दी है. सो, 'मेड इन वाशिंगटन' समझौता नहीं चलेगा. अगर अमेरिका पीछे नहीं हटता तो पाकिस्तान में भी वैसा ही कुछ हो सकता है जैसा मिस्र में हुआ.
(इमरान खान तहरीक़-ए-इंसाफ पार्टी के अध्यक्ष हैं. यह लेख उनसे डिप्टी एडिटर शांतनु गुहाराय की बातचीत पर आधारित है)

