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सर्वेक्षण क्‍यों होते हैं फेल: राजनीति और बाजार में फर्क

बसपा के बारे में पूर्वानुमान और एक्जिट पोल क्यों फेल हो जाते हैं, यह समझना मुश्किल नहीं है. जाति, उपजाति, मजहब और भाषायी जटिलताओं से ग्रस्त भारत जैसे देश में किसी भी सर्वेक्षण की सफलता उसकी अपनाई गई पद्धति और लिए गए नमूने पर निर्भर करती है.

अपडेटेड 25 फ़रवरी , 2012

बसपा के बारे में पूर्वानुमान और एक्जिट पोल क्यों फेल हो जाते हैं, यह समझना मुश्किल नहीं है. जाति, उपजाति, मजहब और भाषायी जटिलताओं से ग्रस्त भारत जैसे देश में किसी भी सर्वेक्षण की सफलता उसकी अपनाई गई पद्धति और लिए गए नमूने पर निर्भर करती है. भारत में चुनावी सर्वे करने वाली कंपनियों के पास विशेषज्ञता, विशिष्ट पद्धति और प्रशिक्षित पेशेवरों का अभाव है.

आम तौर पर यह देखा गया है कि भारत में जो कंपनी बाजार का सर्वे करती है, वही राजनीतिक सर्वेक्षण भी करती है. हालांकि कुछ कंपनियां हैं, जिन्होंने अमेरिका और यूरोप से कुछ पद्धतियां अपनाई हैं. बाजार का सर्वे मुख्य तौर से किसी खास उत्पाद के लिए होता है, जिसमें लोग अपनी क्रय शक्ति के साथ-साथ गुणात्मक और मात्रात्मक तौर पर राय देते हैं. सरकार चयन के मामले में जनता की पसंद अलग होती है. यही वजह है कि ये कंपनियां भारतीय समाज की जटिलता समझ नहीं पातीं और बसपा के वोटरों और उसके मतदान पैटर्न को समझने में नाकाम रहती हैं.

पहले तो सभी कंपनियां छोटा नमूना लेती है, जो सही प्रतिनिधित्व नहीं दर्शाता, लिहाजा उससे प्रामाणिक निष्कर्ष नहीं निकलते. दूसरे, इन कंपनियों के पास प्रशिक्षित और मतदाताओं की प्रवृत्ति समझने वाले लोग नहीं होते. जबकि एक प्रभावी नमूना लेने और विश्लेषण के लिए बसपा के उन वोटरों-समर्थकों के बारे में समझना जरूरी है, जो निरक्षर, खामोश और मलिन बस्तियों में रहते हैं. आंकड़े इकट्ठे करने से पहले इस तरह के उत्तरदाताओं से बेहतर संपर्क बनाने की जरूरत है. शहरी, अप्रशिक्षित, मशीन की तरह आंकड़े जुटाने वाला व्यक्ति अपनी जाति के प्रति जागरूक रहता है, ऐसे में संपर्क बनाने की बात तो दूर, सामूहिक रूप से इस रवैए की परवाह नहीं करता.

तीसरी बात यह है कि सर्वेक्षणकर्ताओं के पास ऐसी कोई पद्धति नहीं है कि वे बसपा के उन खामोश वोटरों की प्रतिक्रिया भांप सकें, जो खासकर ग्रामीण इलाके में अपने विरोधियों के डर से चुप रहते हैं. चौथी बात, सर्वे करने वाले प्रायः जातियों के वर्गीकरण और उनकी पसंद-नापसंद से बिलकुल अनजान होते हैं. उदाहरण के तौर पर, यूपी में 66 अनुसूचित जाति, पिछड़े वर्ग की 79 जातियां हैं और मुसलमानों में भी दर्जन भर जातियां हैं. जबकि अन्य में तीन वर्ण ब्राह्मण, राजपूत और वैश्य में भी कई जातियां है. सबसे बड़ी चुनौती इन जातियों में से नमूना लेने की है. ऐसा नमूना लेने की विशेषज्ञता आखिर किसके पास है?

सर्वे करने वाले ज्यादा से ज्यादा शहरी, मुखर और राय व्यक्त करने के लिए सहजता से उपलब्ध होने वाले तीन वर्णों पर ही जोर देते हैं. इन्हीं पूर्वाग्रहों की वजह से चुनाव के पूर्वानुमान और एक्जिट पोल के निष्कर्षों में उन गलतियों को नहीं जोड़ा जाता. जिससे सटीक नतीजे तो नहीं मिलते, आंकड़े भी विश्वसनीय नहीं लगते.

संतोष कुमार से बातचीत के आधार पर. लेखक डॉ. विवेक कुमार (समाजशास्त्री) कोलंबिया युनिवर्सिटी में विजिटिंग एसोसिएट प्रोफेसर हैं.

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