scorecardresearch
डार्क मोड

स्टाइलिश्ड पड़ोसी-सी शक्ल वाला विलेन का चलन

फिल्मों का बुरा आदमी अब न तो जंगलों में रहता है न ही घोड़े दौड़ाता है. वह हमारे आपके बीच का है.

प्रकाश राज
प्रकाश राज
अपडेटेड 27 मई , 2012

सरगना सेठ धर्म दयाल तेजा के किरदार को अनुभवी अभिनेता अजीत अमर कर चुके हैं. क्लासिक फिल्म जंजीर  के ये तेजा सेठ सिर से पांव तक सफेद कपड़े पहने, पाइप पीते हुए और वैट 69 से भरे गिलास की चुस्कियां लेते एकदम धांसू नजर आते हैं. चालीस साल बाद, भारत के सबसे लोकप्रिय विलेन प्रकाश राज इस फिल्म के रीमेक में इस किरदार को निभाने के लिए पूरी तरह तैयार हैं. अजीत की शैली सत्तर के दशक के अनुकूल थी. लेकिन आज उससे काम नहीं चलने वाला.

राज कहते हैं, ''आज नफासत का आइडिया पूरी तरह बदल चुका है-सफेद-सूट और वैट 69 चलन से बाहर नजर आते हैं. इसकी बजाए, आज का विलेन सिंगल माल्ट शराब पीता है और अरमानी के कपड़े पहनता है.''

वे दिन गए, जब शक्ति कपूर और गुलशन ग्रोवर के चेहरों पर कई निशान होते थे और वे संदिग्ध हरकतें करते थे. आज के विलेन ईमानदार नजर आने वाले आइबी प्रमुख भास्करन हैं, जो कोलकाता मेट्रो पर आंतकी हमला करवाते हैं (कहानी), आइएसआइ का दुष्ट कर्नल है, जो लातविया से एक परमाणु बम तस्करी करके लाता है (एजेंट विनोद), नेता जयकांत शिर्के है जो एक पुलिस वाले-सिंघम को जमीन पर लाने के लिए सब कुछ करता है (सिंघम) या हीरा व्यापारी धर्मेश झवेरी है, जो अवैध हथियारों का डीलर भी है और जिसे ईमानदारी से खास दुश्मनी है (ब्लड मनी).

मिलिए, भारतीय सिनेमा के नए दौर के विलेन से. एक आंख पर कपड़ा बांधे घपलेबाजों की बजाए, इन विलेनों के पास दिमाग होता है. वे आपको रिझाते हैं, अपने मोहपाश में फांसते हैं, उन पर भरोसा करने का आपको मौका देते हैं और फिर मौका आने पर आपको गच्चा दे जाते हैं.Prakash Raj

आज की असली जिंदगी के खलनायकों का अक्स दिखाते हुए, बॉलीवुड के विलेन जाहिर तौर पर वे आम लोग हैं जो बैंक घपले करते हैं, डॉन हैं, मनी लॉन्डरर हैं, बदमाश पुलिसवाले हैं, भ्रष्ट नेता हैं और डबल एजेंट जासूस हैं-वे सब होशियार, सौम्य सफव्दपोश अपराधी हैं, जिनके बारे में हम अकसर खबरों में सुनते रहते हैं.

फिल्म निर्माता महेश भट्ट कहते हैं, ''वास्तविक जीवन में अच्छे और बुरे के बीच का अंतर धुंधला पड़ गया है और अब इसी का असर फिल्मी दुनिया पर पड़ रहा है, जिससे ऐसे असरदार और चौंकाने वाले किरदार गढ़े जा रहे हैं, जिनसे फिल्म की कहानी आगे बढ़ाने में मदद मिलती है.'' और ये सारे विलेन खांटी पेशेवर होते हैं-यानी फिल्म में उनका एकमात्र उद्देश्य मारना, लूटना और शैतानी ढंग से हंसना ही नहीं होता. वे हीरो को चुनौती देते हैं, (सिर्फ शारीरिक रूप से नहीं), किसी की भी हड्डियों तक को कंपा देते हैं और सरासर असली लगते हैं.

निर्देशकों को विलेन की भूमिका के महत्व का एहसास हो चुका है, और ज्‍यादातर विलेन को परदे पर उतना ही मौका मिलता है, जितना हीरो को. 66 वर्षीय बांग्ला अभिनेता धृतिमान चटर्जी एजेंट विनोद में आंतकी संगठनों के साथ काम करने वाले आधे-अधूरे ब्रिटिश लहजे वाले व्यापारी जगदीश्वर मेटला बने हैं.

वे कहते हैं, ''ठीक वैसे ही जैसे फिल्म की मेल लीड को 'हीरो' न कहकर अब मुख्य अभिनेता कहा जाता है, वैसे ही उसके विरोधी को अब विलेन की बजाए 'नकारात्मक किरदार' कहा जाता है, जो बुराई के रंग में रंगा होता है.''

आज के बॉलीवुड के विलेनों में नया नाम जन्नत-2 के मंगल सिंह तोमर नाम के किरदार का है, जिसे 43 वर्षीय मनीष चौधरी ने निभाया है. तोमर धार्मिक हरियाणवी अनाज निर्यातक है और परदे के पीछे अवैध हथियारों का डीलर है. अपने कर्मचारियों को इत्मीनान से गोलियों से उड़ा देने के बाद वह भगवान का नाम ('जय मां युद्धेश्वरी') लेता है और अपनी सुबह की पूजा जारी रखता है.

फिल्म निर्माता सुजॉय घोष, जिन्होंने अपनी थ्रिलर फिल्म कहानी में आइबी प्रमुख भास्करन (यह किरदार भी चटर्जी ने निभाया है) का किरदार रचा, कहते हैं कि इस किरदार को रचने में कोई रॉकेट साइंस का सहारा नहीं लिया गया, क्योंकि उनकी कोशिश इसे यथासंभव यथार्थ  के करीब रखने की थी.

वे कहते हैं, ''जब विलेन की बात आती है, तो यह कारगर होता है कि वह एवरेज, मिडिल क्लास या अपर मिडिल क्लास का व्यक्ति हो जो किसी को नुकसान न पहुंचाने वाला नजर आता हो, लेकिन नफीस व्यक्तित्व का एक काला पक्ष होता हो. ये वे लोग होते हैं, जो ऊंचे स्तर पर जाकर बहुत डरावना खेल खेलते हैं.''

एजेंट विनोद में दुष्ट कर्नल की भूमिका निभाने वाले 49 वर्षीय अभिनेता आदिल हुसैन मानते हैं कि किरदार गढ़ने के मामले में भारतीय पटकथा लेखक और फिल्म निर्माता अब पश्चिमी फिल्म निर्माताओं की तरह सोचने लगे हैं. वे कहते हैं, ''मोटे तौर पर यह (रूसी फिल्मकार) ली स्ट्रासबर्ग के ऐक्टिंग स्कूल का नजरिया है, जो फिल्म निर्माण की यथार्थवादी शैली से जुड़ा है.''

हुसैन का कर्नल किरदार एक पायलट के भेस में होता है और वह दुष्ट आइएसआइ कर्नलों के एक समूह के लिए काम करता  है, जो भारत पर हमले की योजना बना रहे होते हैं. ऐसे जटिल किरदार गढ़ने में यह  बात अहम हो जाती है कि उस भूमिका को निभाएगा कौन. फिल्म निर्माता अब ऐसे अभिनेताओं की खोज में हैं, जिनके चेहरे मुख्यधारा के सिनेमा में खास जाने-पहचाने न हों.

जन्नत-2 के निर्देशक कुणाल देशमुख कहते हैं, ''मैंने मंगल सिंह की भूमिका के लिए मनीष चौधरी का चयन उनके अभिनय के बूते पर किया, न कि ग्लैमर के आधार पर.''

तरीका यह है कि किरदार के लिए कम लोकप्रिय अभिनेता को चुना जाए ताकि अभिनेता से ज्‍यादा लोकप्रियता किरदार की हो. घोष बताते हैं, ''मैंने भास्करन के तौर पर धृतिमान को चुना, क्योंकि परदे पर उनकी छवि बुराई का बोझ लादे हुए शख्स की नहीं है. दर्शकों में से कई लोग उन्हें नहीं जानते थे और इस वजह से फिल्म अंत तक रोमांचक बनी रही.''

चटर्जी को यह बात बड़ी खुशगवार लगती है कि अब धीरे-धीरे ही सही, लेकिन ठोस ढंग से भारतीय फिल्में सफलता के लिए किसी 'स्टार' पर निर्भर रहने की आदत से बाहर निकल रही हैं. किसी फिल्म में अब उसकी कहानी और इसके चरित्र ज्‍यादा अहम हो रहे हैं. रॉकेट सिंह क्वसेल्समैन ऑफ द ईयर में एक बुरे बॉस की अपनी भूमिका के लिए चौधरी एहसानमंद हैं, क्योंकि इसके बूते उन्हें फिल्म ब्लड मनी में अपने सपनों का रोल मिला.

कुछ अभिनेता ऐसे भी हैं, जो खतरनाक खलनायक की भूमिका अदा करके खुद-ब-खुद बड़े स्टार बने. 47 वर्षीय राज तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और अभी हाल ही में, हिंदी फिल्मों में विलेन का रोल निभा चुके हैं. खबरें तो यह भी हैं कि वे देश के सबसे ज्‍यादा पैसे लेने वाले विलेन हैं. एक कन्नड़ फिल्म में भूमिका के लिए उन्हें 40 लाख रु. दिए गए. ऐसा लगता है कि रा.वन जैसी फिल्मों के हर चीज को सफेद और सियाह में बांटने वाले प्रतिद्वंद्वियों की बजाए जटिल विलेन दर्शकों को ज्‍यादा भाते हैं. वे ऐसे किरदारों से अपने आपको को आसानी से जोड़ पाते हैं क्योंकि हो सकता है, उन्हें अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में ऐसे किरदारों से सामना करना पड़ा हो.

1995 में हुसैन को तिहाड़ जेल के कैदियों के साथ एक ऐक्टिंग वर्कशॉप के लिए बुलाया गया था. इस अनुभव के बारे में वे कहते हैं, ''इन अपराधियों से मिलने के बाद आपको एहसास होता है कि वे कितने सामान्य और सौम्य हैं. लेकिन उनके व्यक्तित्व का एक सियाह पक्ष होता है, जो उन्हें जघन्य अपराध की ओर ले जाता है.''

तो नए जमाने के बुरे आदमी के लिए खुद को तैयार कर लीजिए, जिसके पास किसी अच्छे आदमी से कहने के लिए सिर्फ एक ही आसान सी बात होती है, ''क्या चाहिए तुम्हें, सच या खुशी?''

ADVERTISEMENT
Advertisement