पीपल के फूल
चरणसिंह पथिक
अरु पब्लिकेशंस, नई दिल्ली,
कीमतः 175 रु.
गांवों का प्रामाणिक चितेराः
चरणसिंह पथिक
चरणसिंह पथिक का दूसरा कहानी संग्रह है पीपल के फूल. अपने पहले संग्रह के साथ ही उन्होंने कहानी के समकालीन परिदृश्य में एक ऐसे युवा कथाकार की छवि बनाई थी जो रोज-ब-रोज बदल रहे गांव की प्रामाणिक तस्वीर अपनी कहानियों में बताता है. दूसरा संग्रह इस छवि को पुष्ट करता है क्योंकि इन कहानियों में उनके सरोकार अधिक पुख्ता हुए हैं. उनका कहानी लेखन अभ्यास नहीं, उपलब्धि बनने का प्रयास करता हुआ है. ग्यारह कहानियों का यह संग्रह भूमंडलीकरण के दिनों में भारतीय गांव का रोचक और भीतरी चित्र प्रस्तुत करता है.
ये कहानियां गांवों में व्याप्त जाति-वर्ण, भ्रष्टाचार और सामाजिक संबंधों में आ रहे बदलावों को लक्षित करने वाली रचनाएं हैं. विकास की मुख्यधारा से छिटक रहे भारतीय ग्रामीण जीवन की असमानता का ढांचा बरकरार रखने को उतारू शक्तियां एक ओर हैं तो अपने ही दबावों से चरमरा रहे संबंधों की परिणतियां दूसरी ओर. इनकी कथात्मक प्रस्तुति पथिक की कहानियों की बुनियादी संकल्पना है. दलितों के साथ हो रहे अन्याय अपमान का बोध कराते हुए वे चौकी जैसी कहानी लिखते हैं तो मीणा-गुर्जर समुदायों के आपसी संघर्ष पर मूछें जैसी बढ़िया कहानी भी.
कभी कहानियों से मुस्लिम पात्रों के अलोप होते जाने पर चिंता जताई गई थी. पथिक की कहानियों में मुस्लिम पात्रों की आवाजाही इतने सामान्य नामालूम ढंग से हुई है कि लगता नहीं कि ये पात्र कहां थे. वे कहानी गढ़ने की बजाए अपने आसपास के परिवेश-घटनाओं को बीच में रखकर कि सी व्यापक सचाइर् से उसका वृतांत रचते हैं. इस प्रक्रिया में उनकी कहानियां अक्सर देखी, सुनी और भरोसेमंद लगती हैं. उनकी निजी प्रविधि की दो कहानियां संग्रह में हैं. फिरने वालियां देहात में शोक प्रसंग के साथ भी आती जा रही प्रदर्शनप्रियता और कृत्रिमता को इस अंदाज से बताती है कि पाठक मुस्कराए बिना नहीं रह सकता.
पथित दलित नहीं हैं और अस्मितापरक विमर्शवाद से उनकी सहमति भी नहीं दिखाई देती. कलुआ एक दलित स्त्री की कहानी है जो अस्मिताई विमर्श की सीमा बताती है. गांवों में दलित उत्पीड़न की घटनाएं प्रायः रचना जगत में आई हैं. यहां दलित स्त्री एक अनोखा काम करती हैः अपनी भैंस के नर शिशु को पाढ़ा बनाती है ताकि गांव की भैंसों के गर्भाधान के लिए दबंगों की खुशामद न करनी पड़े. पंचायत का फैसला है कि भैंसें कोली पाढ़े से गाभिन है तो भद्द न कुट जाएगी?
कलावती का उत्तर हैः ''पंचों का फैसला पंचों के ही माथे... कलुआ गांववाई न सही लेकिन इस बस्ती की कोई भी भैंस हो या दूसरी बस्ती की भैंस...कलावती के कलुआ के पास ले आना, कलावती एक धेला भी नहीं लेगी.''
पीपल के फूल शीर्षक कहानी में पथिक ने कोशिश की है कि भूमंडलीकरण का प्रति-आख्यान गांव के प्रतीक-पहचान से रचा जाए. वे असफल तो नहीं हुए तथापि कहानी वैसी सहज-सुगम नहीं बन सकी. राजस्थान की बोलियों, लोक जीवन, खेती-धंधों से जुड़ी भाषा-कहावतों का प्रयोग हिंदी कहानी के लिए शुभ है. पथिक विचार और साहित्य के द्वैत को जरूरी नहीं मानते. इधर युवा शोर में उनका स्वर संयत, गहरा और अर्थवान है.

