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कहानी संग्रह: असफल दायरों में प्यार

समाज ने चाहे जितना प्रतिबंधित किया हो प्रेम को पर साहित्य ने इसे बहुत उदारता से अपनाया है. हिंदी में भी आदिकाल से लेकर समकालीन साहित्य तक प्रेम की उपस्थिति देखी जा सकती है.

अपडेटेड 2 अप्रैल , 2012

पाप-पुण्य से परे
राजेंद्र राव
किताबघर प्रकाशन,
दरियागंज,
दिल्ली-2,
कीमतः 225 रु.
समाज ने चाहे जितना प्रतिबंधित किया हो प्रेम को पर साहित्य ने इसे बहुत उदारता से अपनाया है. हिंदी में भी आदिकाल से लेकर समकालीन साहित्य तक प्रेम की उपस्थिति देखी जा सकती है. जहां तक हिंदी कहानी की बात है, इसके आरंभिक काल में ही उसने कहा था जैसी श्रेष्ठ प्रेम कहानी लिखी गई है.

आगे भी अनेकानेक प्रेम कहानियां लिखी गईं. ज्‍यादातर असफल प्रेम पर लिखीं ये कहानियां दिखलाती हैं कि हमारा समाज प्रेम के प्रति कितना असहिष्णु रहा है. राजेंद्र राव की प्रेम कहानियों को भी इस संदर्भ की जरूरी कड़ी के रूप में देखा जाना चाहिए.

इन कहानियों में एक तरफ उद्दाम प्रेम में डूबते-उतराते प्रेमी-प्रेमिकाओं को देखा जा सकता है तो दूसरी तरफ परिवार और समाज के आगे हारते-घुटने टेकते और प्रेम को कुर्बान करते प्रेमी-प्रेमिका भी हैं.

बार-बार हारने और अपने प्रेम को कुर्बान करने वाले प्रेमी-प्रेमिकाओं के कारण ही राव की ये कहानियां कुछ पुरानी-सी लगती हैं क्योंकि आज जाति-धर्म-समाज-परिवार के बंधन को तोड़कर प्रेम करने वाले लोगों की बड़ी तादाद दिखाई दे जाती है. काश! हारे और टूटे हुए प्रेमियों के साथ-साथ प्रेम में जीते हुए लोगों पर भी कहानियां लिखी जातीं. तब प्रेम करने और सामाजिक रूढ़ियों को तोड़ने वाले लोगों की संख्या में जरूर इजाफा होता.

राव की ये कहानियां अस्सी के दशक में लिखी गई हैं. वह समय भी कोई बहुत पिछड़ा समय नहीं था. उससे पहले कई कथाकार क्रांतिकारी प्रेमियों को चित्रित कर चुके थे. फिर क्या वजह है कि राव के प्रेमी-प्रेमिका घर-परिवार और समाज के बंधन को तोड़ने की हिम्मत नहीं कर पाते? हां, राव के ज्‍यादातर प्रेमी इस मायने में क्रांतिकारी जरूर हैं कि शादीशुदा होने के बावजूद वे दूसरे मर्द या दूसरी औरत से प्रेम करते हैं. पाप-पुण्य से परे ये प्रेमी नैतिकता को जहन्नुम में भेजकर प्रेम करते हैं.

इस तरह समाज के एक बंधन को तोड़ते हैं. लेकिन अंततः वे समाज के दबाव में टूटते और बस इंतजार करते रह जाते हैं-'शायद वह आ जाए.' कोई स्त्री तो परिवार के दबाव में अपने प्रेम को कुर्बान कर 'अगले जन्म में...मौत के बाद' प्रेमी को पाने की प्रतीक्षा करती दिखाई देने लगती है. और कोई प्रेमी-प्रेमिका लंबे भटकाव के बाद अगर एक-दूसरे को पाते भी हैं तो वे एक दूसरे रूप में.

सच पूछें तो जीवन की यह विडंबना आहत करती है. प्रेमी को बार-बार पाने-खोने की विडंबना से उपजी पाप-पुण्य से परे  इसी विडंबना को और गहराई से दिखलाने वाली कहानी है. अपनी मर्जी से विवाह करने वाली कोई स्त्री भी दूसरे पुरुष से आकर्षित होकर जिस द्वंद्व और खिंचाव में जिंदगी जीती है, उससे निकलना उसके लिए आसान नहीं होता और अंत उसकी विक्षिप्ति के रूप में सामने आता है.

राजेंद्र राव की इन कहानियों में प्रेम के साथ शरीर की उपस्थिति अनिवार्य रूप से देखी जा सकती है. विवाह हो या न हो, इन कहानियों में प्रेमी-प्रेमिका शरीर पर जरूर उतर आते हैं. यही वजह है कि इन कहानियों में प्रेमी-प्रेमिकाओं की त्रासदियां चाहे जितनी दिखाई पड़ती हों, प्रेम की उदात्तता .जरा भी नजर नहीं आती. कहने का एक जैसा ढंग और भाषा की स्थूलता भी इन कहानियों की बड़ी कमी कही जा सकती है. क्लासिक कहानियां बनने से कोसों दूर रह जाती हैं ये.

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