दिल्ली हाइकोर्ट पर 7 सितंबर को हुए आतंकवादी हमले के बाद आए ई मेल की गुत्थी सुलझाने में लगी नेशनल इंटेलिजेंस एजेंसी (एनआईए)के हत्थे 15 सितंबर को हुजी के दो कार्यकर्ता हिलाल अमीन और आमिर अब्बास चढ़ ही गए. इन्हीं दोनों ने किश्तवाड़ के दो स्कूली छात्रों आबिद हुसैन और शारिक अहमद को मेल भेजने के लिए अपना मोहरा बनाया था.
अब देखना यह है कि संदेशा भेजने वालों की गर्दन पकड़ने वाली एनआइए धमाका करने वाले असली हाथों को कब पकड़ पाती है. और क्या एनआइए इंडियन मुजाहिदीन नाम के उस आतंकी साये का कोई चेहरा सामने ला पाएगी जो तमाम गिरफ्तारियों के बावजूद एक के बाद एक आतंकी धमाके करता जा रहा है.
आतंकवादी हमला देश में ही जडें जमा चुके आतंकवादी नेटवर्क का काम है, इस बात को खुद गृह मंत्री पी चिदंबरम भी मान चुके हैं. इस देसी आतंकवादी नेटवर्क को खुफिया एजेंसियां करीब चार साल से इंडियन मुजाहिदीन का नाम देती रही हैं और 2008 में इसके तमाम कथित सरगनाओं की गिरफ्तारी के बाद माहौल बना कि आइएम की कमर टूट गई है. लेकिन मुंबई और दिल्ली में हुए ताजा हमलों ने यही दिखाया कि आइएम नाम का यह जिन्न बोतल में कभी गया ही नहीं था. आइएम पहले से ज्यादा संगठित और ताकतवर है.
यह बात अलग है कि आतंक के इस साये की सही तस्वीर किसी के पास नहीं है. उलटे कई मामले तो ऐसे सामने आए हैं जिनमें आरोप लगे कि बेगुनाह लड़कों को उठाकर पुलिस ने उनके ऊपर आइएम का लेबल चस्पां कर दिया. 
आइएम को लेकर फैली थ्योरियों और गिरफ्तारी-फरारी के सूत्रों के इर्द-गिर्द इंडिया टुडे ने यह पता करने की कोशिश की कि अगर 2008 में प्रतिबंधित स्टुडेंटस इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (सिमी) और आइएम के सफदर नागौरी, अबु बशर काशमी, कयामुद्दीन कपाड़िया और मंसूर पीरभॉय सहित दर्जन भर से अधिक सरगनाओं को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया और रियाज भटकल, यासीन भटकल, आमिर रजा खान, अब्दुल सुभान कुरैशी, शादाब मलिक और मोहसिन चौधरी जैसे शातिर पाकिस्तान भागने में कामयाब रहे, तो अब देश में कौन आइएम की कमान संभाल रहा है और इनकी नई रणनीति क्या है.
खुफिया एजेंसियों का दावा है कि सितंबर 2001 में जब पहली बार सिमी पर प्रतिबंध लगा तो उसके कट्टरपंथी धड़े के कई सदस्यों ने हरकत-उल-जिहाद-ए-इस्लामी (हुजी) और उत्तर प्रदेश के कुछ युवकों के साथ मिलकर आइएम बना लिया, जिसे लश्कर-ए-तैयबा की सरपरस्ती हासिल है. लेकिन 2008 के मुंबई विस्फोटों के बाद सिमी-आइएम के सक्रिय सदस्यों की गिरफ्तारी के बाद आइएम काफी कमजोर हुआ था, पर अब यह फिर सिर उठा रहा है.
आइबी के पूर्व प्रमुख ए. के. डोवल कहते हैं, ''यह गलतफहमी है कि 2008 में आइएम के ज्यादातर लोग गिरफ्तार हो गए. दरअसल जितने लोग गिरफ्तार हुए उससे कहीं ज्यादा लोग फरार हैं. खुफिया एजेंसियों की सख्ती के बावजूद पाकिस्तान भाग गए आतंकवादी न सिर्फ अपने भारतीय मॉड्यूल के संपर्क में हैं, बल्कि चोरी छिपे अलग-अलग रास्तों से भारत आते भी रहते हैं.'' इस दावे की पुष्टि इस साल 26 जून को सिमी के एक पूर्व अध्यक्ष सैयद सलाउद्दीन सालार की गिरफ्तारी से हुई है.
सालार को मध्य प्रदेश एटीएस ने कोच्चि एयरपोर्ट से उस वक्त गिरफ्तार किया, जब वह दुबर्ई की फ्लाइट से यहां उतरा. सांप्रदायिक तनाव फैलाने के एक मामले में लंबे समय से उसकी तलाश थी. इसी साल 5 जून को हुई इकरार शेख की गिरफ्तारी से भी इस बात का खुलासा हुआ कि भारत का आतंकवादी मॉड्यूल पाकिस्तान में छिपे आतंकवादियों के संपर्क में है. इकरार शेख को अहमदाबाद विस्फोट का प्रमुख आरोपी बताया जाता है. पेशे से केमिकल इंजीनियर शेख विस्फोटक सामग्री बनाने का विशेषज्ञ है और आइएम के सरगना अब्दुल सुभान कुरैशी का दायां हाथ है जिसे मुंबई की लोकल ट्रेनों में हुए विस्फोट और अहमदाबाद, दिल्ली तथा बंगलुरू में हुए विस्फोटों का 'दिमाग' माना जाता है. 
इस साल मई और जून में पुलिस के हत्थे चढ़े कुछ आतंकियों से पूछताछ में पहली बात तो यह साफ हुई कि पाकिस्तान भाग गए आतंकवादी वहां रहकर भारत के आतंकवादी नेटवर्क के लिए काम कर रहे हैं. दूसरी बात यह कि 2008 के मुंबई धमाकों के बाद से खामोश नजर आ रहे आइएम ने इस दौरान देश में स्लीपर सेल्स का बड़ा जाल देश में फैलाया है. खुफिया एजेंसियों को इसी साल अब तक 106 स्लीपर सेल और करीब 400 आइएम सदस्यों के देश में सक्रिय होने की जानकारी मिली है.
मध्य प्रदेश एटीएस ने एक कदम आगे बढ़ते हुए ऐसे 5 मामलों का खुलासा किया है, जिनमें फंडिंग के लिए आतंकवादियों ने डकैती की वारदात को अंजाम दिया. प्रदेश के रतलाम, जबलपुर और भोपाल में गिरफ्तार आतंकवादियों ने बताया कि पिछले दो साल में उन्होंने देवास, इटारसी तथा मंदसौर जिले में पीपलिया मंडी और जावरा के बैंकों से 12 लाख रु. से अधिक की लूट की है. उन्होंने अगस्त 2010 में भोपाल में मणप्पुरम गोल्ड फाइनेंस कंपनी से 2 करोड़ रु. के सोने के जेवरात लूटे. आतंकवादियों की निशानदेही पर झारखंड के टाटानगर में 1.25 करोड़ रु. के सोने के आभूषण बरामद भी किए गए. ऐसा नहीं है कि चोरी-डकैती ही फंडिंग का अकेला तरीका बचा हो, डोवल की मानें तो आतंकवादियों को विदेशी संगठनों से भी पैसा मिलने का शक है. इनमें सउदी अरब के कई संगठन, इंटरनेशनल ब्रदरहुड, वर्ल्ड एसेंबली ऑफ मुस्लिम यूथ्स, इंडोनेशिया का अल जमाइया, मोरक्को और फिलिपींस के कुछ संगठन भी शामिल हैं. वहीं खाड़ी देशों में बसे भारतीयों के जरिए भी आतंकवादियों तक पैसा पहुंच रहा है. यानी आइएम आतंकवाद के अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क के संपर्क में है.
आतंक के मॉड्यूल में नए आतंकवादियों को शामिल करने का काम भी अब बहुत सावधानी से हो रहा है. इंस्टीट्यूट फॉर कनफ्लिक्ट मैनेजमेंट के कार्यकारी निदेशक अजय साहनी बताते हैं कि अब किसी मस्जिद की तकरीर के जरिए आतंकवादियों की भर्ती करना मुश्किल है. अब ऐसे लोगों को छांटा जा रहा है, जिनका खून मुसलमानों पर हो रहे कथित अत्याचारों पर कुछ जल्दी ही खौलता हो. कुछ महीने से लेकर कुछ साल तक के वक्त में ऐसे युवाओं को आइएम में शामिल कर आतंकी वारदात करने के लिए हर तरह से दक्ष कर दिया जाता है. इनमें उच्च शिक्षा प्राप्त लोग भी हैं.
आतंकवादी रिक्रूटमेंट और नेटवर्क की ताजा मिसाल मध्य प्रदेश एटीएस के खुलासे में हुई है. पुलिस के मुताबिक इस साल जून में गिरफ्तार आतंकवादियों का इन्फार्मेशन टेक्नोलॉजी में अच्छा-खासा दखल है. ये सब नौजवान हैं और खुद की पहचान छात्र के रूप में ही कराते हैं. इनके पास से सीडी, पेन ड्राइव, ड्राइविंग लाइसेंस और कई फर्जी दस्तावेज मिले. रतलाम से पकड़े गए जाकिर नाम के आतंकवादी ने तो सादिक के नाम से फर्जी यूआइडी कार्ड तक बनवा लिया था. इन दस्तावेजों की मौजूदगी में इन्हें नए सिम कार्ड खरीदने में भी कोई दिक्कत पेश नहीं आती थी. 
जुलाई 2011 में मुंबई बम धमाके के संबंध में गुजरात एटीएस ने एक आतंकवादी को अहमदाबाद में गिरफ्तार किया. उसकी निशानदेही पर उत्तर प्रदेश के महोबा जिले के राठ कस्बे से एक संदिग्ध को गिरफ्तार किया गया. राठ का नाम इसके पहले कभी आतंकवादी वारदात से नहीं जुड़ा. आइएम ने ऐसे कस्बे में अपना नेटवर्क पहुंचा दिया जहां रेल नेटवर्क भी नहीं है. मुंबई धमाके के तार मध्य प्रदेश के इटारसी से भी जुड़े बताए जा रहे हैं. आतंकवादी नेटवर्क कैंसर की तरह कैसे फैल रहा है, इसका खुलासा इस साल 5 जून को मध्य प्रदेश एटीएस की 8 आतंकवादियों की गिरफ्तारी से भी हुआ. गिरफ्तार आतंकियों में इकरार शेख और अबु फैजल सहित सिमी के 5 और इंडियन मुजाहिदीन के तीन सदस्य हैं. एटीएस के मुताबिक फैजल ने स्वीकार किया कि उसके रिश्ते रियाज भटकल और एजाज भटकल से हैं.
पुलिस के कसते शिकंजे के बीच आतंकवादियों ने आपस में संवाद के तरीके भी बदले हैं. साहनी कहते हैं कि इनक्रिप्टिड मैसेज, तस्वीर में छिपे संदेश और यहां तक कि पोर्नोग्राफिक (अश्लील) सामग्री के जरिए भी आतंकवादी गुप्त संवाद कर रहे हैं. अश्लील सामग्री भेजने की पीछे मंशा यह है कि इन्हें एजेंसियां गंभीरता से नहीं लेंगीं. इंस्टीट्यूट फॉर डिफेंस स्टडीज एंड एनालिसिस (आइडीएसए) में आइएम पर शोध कर रही सीनियर फेलो नम्रता गोस्वामी कहती हैं, ''ह्यूमन कूरियर इस समय आतंकवादियों का सबसे भरोसेमंद हथियार है. कोई आदमी चुपचाप आकर किसी से मिला और चला गया. इसका कोई रिकॉर्ड कहीं नहीं रहता. महत्वपूर्ण संदेशों और प्लानिंग में आतंकवादी यही तरीका अपना रहे हैं.'' इस काम में महिलाओं को भी लगाया गया है. गौरतलब है कि पाकिस्तान में अमेरिकी एजेंसियों के हाथों मारा गया ओसामा बिन लादेन कूरियर का ही इस्तेमाल कर रहा था.
लेकिन आइएम के मजबूत होने की एक दूसरी वजह को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. यह वजह है आतंकवाद के आरोप में तमाम ऐसे लोगों को गिरफ्तार किया जाना जिनके आतंकवाद में शामिल होने को लेकर विवाद है. आतंक के गढ़ के रूप में बदनाम हो चुके उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ कस्बे से आतंकवाद के सिलसिले में पिछले पांच साल में 14 प्रमुख आतंकियों को गिरफ्तार किया गया है. इनमें से कई लोगों पर उंगली उठाते हुए पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टी (पीयूसीएल) की उत्तर प्रदेश इकाई के संयुक्त सचिव मसीहुद्दीन संजरी ने कहा, ''अपराध का फैसला तो अदालत करेगी लेकिन कई गिरफ्तारियों में तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया. 2008 अहमदाबाद बम धमाकों के मास्टर माइंड बताए जा रहे अबु बशर को 14 अगस्त को पुलिस ने आजमगढ़ से उठाया लेकिन उसकी गिरफ्तारी 16 अगस्त, 2008 को लखनऊ से दिखाई गई. इस मामले में 16 अगस्त से पहले ही सुप्रीम कोर्ट को एक फैक्स कर बशर को आजमगढ़ से उठाने की शिकायत दर्ज कराई गई. यह फैक्स सुप्रीम कोर्ट के रिकॉर्ड में है.'' उन्होंने बताया कि लखनऊ और फैजाबाद धमाकों के आरोपी पेशे से डॉक्टर तारिक कासमी और खालिद मुजाहिद तथा जयपुर धमाके के सिलसिले में गिरफ्तार मोहम्मद सरवर की गिरफ्तारी में भी इसी तरह की गड़बडी पार्ई गई है. यही नहीं इंडिया टुडे को मिली जानकारी के मुताबिक आजमगढ़ के नौ युवा लंबे समय से फरार भी हैं. इनमें से कुछ पर 52 मुकदमे तक दर्ज हैं.
स्थानीय पुलिस को इनके बारे में कोई सुराग नहीं है और उनके परिजन कहते हैं कि उनके बच्चे गायब हैं. इस तरह के मामले आइएम के संगठन की शक्ल को साफ करने के बजाए और उलझा रहे हैं. हालांकि डोवल का मानना है आतंकवादी मामलों में खुफिया एजेंसियां बहुत एहतियात बरतती हैं और गलत व्यक्ति को उठाने की घटना ना के बराबर ही होगी.
कुछ ऐसी ही एहतियात पाकिस्तान भी बरत रहा है, लेकिन उसका मकसद कुछ और है. पाक नहीं चाहता कि आतंक की बिसात पर सीधे-सीधे उसका कोई मोहरा पिट जाए और अमेरिका की पंचायत में उसका वजीर सफाई देता फिरे. परदे के पीछे से आतंक की भट्टी में तेल छिड़कने की पाक की दोहरी नीति पर साहनी कहते हैं, ''तीन-चार साल से पाकिस्तान पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ गया है. ऐसे में आइएसआइ पहले की तरह आतंकवादियों को हथियार और गोला-बारूद नहीं दे पा रही है. यही वजह है कि पिछले कुछ साल में भारत में हुए ज्यादातर विस्फोट लो इंटेसिटी के थे और इनमें आरडीएक्स की बजाए आसानी से उपलब्ध अमोनियम नाइट्रेट इस्तेमाल हुआ. आतंकवादियों को सामान्य तौर पर आरडीएक्स पाकिस्तानी सेना से मिलता रहा है, लेकिन मुंबई पर 2008 में हुए हमले के बाद से पाक सेना दूरी बनाती हुई दिखना चाहती है. इसलिए वह आइएम को इस तरह मजबूत करना चाहता है कि वह खांटी भारतीय आतंकवादी संगठन दिखे. '' हालांकि मुंबई और दिल्ली पर हुए ताजा हमलों में पीईटीएन विस्फोटक इस्तेमाल हुआ जो आम तौर पर सेना के पास होता है. यह तथ्य पाक सेना की रणनीति में बदलाव का इशारा करता है.
बड़े धमाके कर आइएम ने यह साबित नहीं किया कि इंटेलिजेंस एजेंसियां ढंग से काम नहीं कर पा रही हैं या फिर उनके पास संसाधनों की कमी है? इस बारे में साहनी कहते हैं, ''जितने छोटे कस्बों में जाकर आतंकवादी अपना नेटवर्क फैला रहे हैं, क्या वाकई उस स्तर तक निगरानी करने के लिए हमारे पास खुफिया अधिकारी हैं? सारा खुफिया तंत्र मिला लिया जाए तो देश में फील्ड इंटेलिजेंस के लिए बमुश्किल 15,000 अधिकारी होंगे. वैसे भी खुफिया एजेंसियों के पास आतंकवाद के अलावा भी बहुत-सी जिम्मेदारियां हैं. इनमें राजनैतिक, आर्थिक और आपराधिक खुफियागीरी भी शामिल है.'' दिल्ली से सटे लोनी थाने में 15 लाख की आबादी पर खुफिया जानकारी जुटाने के लिए महज तीन पुलिसवाले हैं.
डोवल की मानें तो देश में खुफिया अधिकारियों की संख्या कम नहीं है, लेकिन आतंकवाद पर नजर रखना वाकई उनकी पहली प्राथमिकता है, इस बात को लेकर कई सवाल हैं. उनका तो यहां तक मानना है कि पोटा खत्म होने के बाद से पुलिस आतंकवादियों से सख्ती से पूछताछ नहीं कर पाती है.
लेकिन असल बात यह है कि देश में एक के बाद एक बड़ी आतंकवादी वारदात हो रही हैं और लोग खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं. उस पर आइएम नाम का वह रहस्यमय संगठन जिसके मुखिया का नाम दावे के साथ कोई नहीं जानता, देश के चप्पे-चप्पे में स्लीपर सेल की बारूदी सुरंग बिछाता जा रहा है जिन्हें खोदने के फेर में कभी कामयाबी मिलती है तो कभी सुरक्षा एजेंसियों के हाथ झुलस जाते हैं. ऐसे में सवाल यह है कि क्या सरकार खुफिया तंत्र को इतना मजबूत करेगी कि आतंकवृक्ष की जड़ों में मट्ठा डाला जा सके या फिर सरकारी सोच मुद्रास्फीति के हिसाब से मौत का मुआवजा बढ़ाने तक ही सीमित है.
आतंक का फैलता देसी नेटवर्क
दिल्ली हाइकोर्ट पर 7 सितंबर को हुए आतंकवादी हमले के बाद आए ई मेल की गुत्थी सुलझाने में लगी नेशनल इंटेलिजेंस एजेंसी (एनआईए)के हत्थे 15 सितंबर को हुजी के दो कार्यकर्ता हिलाल अमीन और आमिर अब्बास चढ़ ही गए. इन्हीं दोनों ने किश्तवाड़ के दो स्कूली छात्रों आबिद हुसैन और शारिक अहमद को मेल भेजने के लिए अपना मोहरा बनाया था.

अपडेटेड 21 सितंबर , 2011
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