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डार्क मोड

बाजार में डूबते छोटे निवेशक

सेंसेक्स और निफ्टी भले दलाल स्ट्रीट पर किसी बड़ी गिरावट की कहानी बयां न कर रहे हों लेकिन छोटी मझोली कंपनियों में निवेश करने वाले निवेशकों का हाल बुरा है. दरअसल, बाजार में मंदी 2008 से ज्यादा गहरी हो चुकी है. अर्थव्यवस्था के आंकड़ों और सेंसेक्स निफ्टी की चाल से यह हरगिज जाहिर न हो लेकिन मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों की फिसलन इसका प्रमाण है.

फोटो सौजन्यः बिजनेस टुडे
फोटो सौजन्यः बिजनेस टुडे
अपडेटेड 12 सितंबर , 2019

सेंसेक्स और निफ्टी भले दलाल स्ट्रीट पर किसी बड़ी गिरावट की कहानी बयां न कर रहे हों, लेकिन छोटी मझोली कंपनियों में निवेश करने वाले निवेशकों का हाल बुरा है. दरअसल, बाजार में मंदी 2008 से ज्यादा गहरी हो चुकी है. अर्थव्यवस्था के आंकड़ों और सेंसेक्स निफ्टी की चाल से यह हरगिज जाहिर न हो, लेकिन मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों की फिसलन इसका प्रमाण है. जनवरी, 2018 से अब तक छोटी-मझोली कंपनियों में निवेश करने वाले निवेशक 28 लाख करोड़ रुपए की पूंजी गंवा चुके हैं. 

2008 की मंदी में स्मॉलकैप इंडेक्स में गिरावट का सिलसिला 15 महीने चला, जबकि इस बार जनवरी, 2018 से शुरू हुई गिरावट 19 महीने बाद भी थमने के संकेत नहीं दे रही. 2008 में निफ्टी अपने ऊपरी स्तर 6,357 से गिरकर 2,252 तक पहुंचा था, इसी दौरान मिडकैप इंडेक्स 9,781 से गिरकर 2,930 के स्तर पर आ गया था. 

गिरावट का यह सिलसिला 15 महीने चला था. 

मौजूदा दौर की बात करें तो निफ्टी का 2019 में उच्चतम स्तर 11,953 रहा जबकि निचला स्तर 11,301 रहा. जब निफ्टी अपने ऊपरी स्तर से अभी महज 6 फीसदी गिरा है, मिडकैप की गिरावट 30 फीसदी की हो चुकी है. 2018 में मिडकैप इंडेक्स ने 21,840 का उच्चतम स्तर छुआ और निफ्टी स्तर 15,802 का था.

आंकड़ों से इतर यह समझना जरूरी है कि जनवरी 2018 से अब तक सेंसेक्स और निफ्टी में तो 12 फीसदी की तेजी आई है लेकिन बीते डेढ़ साल में मिडकैप 21 फीसदी और स्मॉलकैप 30 फीसदी तक टूट चुके हैं. छोटे निवेशक ज्यादातर इन्हीं शेयरों में निवेश करते हैं. क्योंकि मूल्य में ये कम होते हैं और बाजार के अच्छे दिनों में इनका रिटर्न भी तेजी से बढ़ता है. कई बार पैसे दोगुना होने में भी बहुत वक्त नहीं लगता है. लेकिन बाजार में हाथ जलाने के बाद बड़ी संख्या में छोटे निवेशक बाजार से तौबा कर लेते हैं. छोटे निवेशकों का बाजार में रुझान घटना नकारात्मक संकेत है. 

ऐसे समय में जब अर्थव्यवस्था में मंदी के संकेत साफ दिख रहे हों, नकदी की किल्लत से एक के बाद एक कंपनी के दिक्कत में फंसने की खबरें आ रही हों, बाजार में वापसी की उम्मीद को धुंधला करती हैं. अमीरों पर ज्यादा टैक्स, एफपीआइ पर सख्ती और रिटेल निवेशकों की हिस्सेदारी बढ़ाने जैसी बजट घोषणाएं शायद विदेशी निवेशकों को रास नहीं आईं. यही कारण है कि बजट से अब तक कैश मार्केट में विदेशी निवेशक 8 हजार करोड़ से ज्यादा की बिकवाली कर चुके हैं, जबकि एफऐंडओ (फ्यूचर-ऑप्शन) में बिकवाली 4 हजार करोड़ से ज्यादा की है. 

ऐसे समय में जब बिकवाली हावी है बड़ी कंपनियों का संभलना मुश्किल है तो छोटों का इंतजार और लंबा होना लाजमी है.

(शुभम शंखधर इंडिया टुडे के एसोसिएट एडिटर हैं)

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