कर्नाटक के शिक्षा मंत्री विश्वेश्वर हेगड़े कगेड़ी ने सरकारी स्कूलों में भगवद्गीता पढ़ाए जाने के विरोधी अल्पसंख्यकों को सलाह दे डालीः ''जो लोग गीता पढ़ाने का विरोध कर रहे हैं, उन्हें भारत छोड़ देना चाहिए.''
उनकी यह टिप्पणी राज्य के शिक्षा विभाग की ओर से एक हिंदू मठ की सलाह पर सरकारी स्कूलों में भगवद्गीता की शिक्षा को अनिवार्य बनाए जाने के लिए 9 जुलाई को जारी सर्कुलर पर उठे विरोध के बाद आई.
हालांकि यह कार्यक्रम 2007 से जारी है, लेकिन इस पर विवाद एकदम आखिरी समय पर तब शुरू हुआ, जब सरकार इसे अपने स्कूलों में लागू करने वाली थी. मुस्लिम, ईसाई और अन्य अल्पसंख्यकों ने इस आदेश को 48 घंटे के अंदर वापस लेने की मांग करते हुए विरोध प्रदर्शन किए.
कर्नाटक मुस्लिम मुत्तहिदा महाज़ के संयुक्त संयोजक सैयद मुहम्मद इकबाल के एक बयान में कहा गया, ''यह धर्मनिरपेक्ष देश में भेदभावपूर्ण कार्यक्रम है. राज्य के आठ लाख मुसलमान एकजुट होकर इसका विरोध करेंगे.''
रेवरेंड डी. मनोहरचंद्र प्रसाद भी इसके विरोध में कहते हैं, ''मैं मानता हूं कि गीता में जीवन के कुछ अच्छे सिद्धांत हैं, लेकिन यह बाइबिल और कुरान के मामले में भी लागू होना चाहिए, क्योंकि सिर्फ हिंदू ही नहीं, सभी धर्मों में अच्छी बातें हैं.''
लेकिन सरकार ने आक्रामक रवैया दिखाते हुए विरोध के आगे झुकने से इनकार कर दिया है. भाजपा नेता धनंजय कुमार ने टीवी पर आकर खुलेआम घोषणा की, ''वे सभी धर्म जिनका उद्भव भारत में नहीं हुआ है, पश्चिमोन्मुख हैं और उनके अनुयायी बाहरी लोग हैं.''
इस कार्यक्रम को उत्तर कराड जिले के सिरसी तालुका में सोंडा स्वर्णवल्ली के स्वामी श्री गंगाधरेंद्र सरस्वती चला रहे हैं. यह मध्य प्रदेश में भाजपा सरकार की ओर से शुरू किए कार्यक्रम जैसा ही है, जिसके तहत सरकारी स्कूलों में पढ़ाई से इतर गतिविधियों के तौर पर विद्यार्थियों को जीवन के मूल्य समझाने के लिए भगवद्गीता का सहारा लिया जाता है.
अब यह मामला हाइकोर्ट में जा पहुंचा है, जहां कर्नाटक राज्य अल्पसंख्यक शैक्षिक संस्थान प्रबंधन महासंघ ने सरकार के इस कार्यक्रम को चुनौती दी है. अदालत ने इस पर केंद्र और राज्य सरकार का जवाब मांगा है.
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