आखिर ऐसा क्या हुआ कि समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के रिश्ते जो एक वक्त में नाज-नखरों की लखनवी तहजीब से शुरू होकर आपसी मेल-मिलाप तक पहुंच चुके थे, आधा चुनाव बीतते-बीतते तलाक की दहलीज पर आ चुके हैं.
गाली-गलौज एक घिसा-पिटा हथियार है जो दुश्मन को तो कोई खास नुकसान नहीं पहुंचाता, लेकिन जब खुद पर यह पलटवार करता है तो इसकी मार सबसे तीखी होती है. ऐसा अकसर होता है. लेकिन इन सबसे बढ़कर किसी का मजाक उड़ाना पुराने जख्मों को फिर से हरा कर सकता है, खासकर जब उसके पीछे कोई तर्क काम कर रहा हो. ऐसा लगता है कि समाजवादी पार्टी के राजकुमार ने निंदा में रस लेने की कला सीख ली है, और उनका पहला और इकलौता निशाना राहुल गांधी बने हैं. कांग्रेस चाहे तो यादव की इस चुटकी को नजरंदाज भी कर सकती है कि राहुल गांधी ने चुनाव प्रचार की शुरुआत आस्तीनें मोड़ने से की, फिर समाजवादी पार्टी के घोषणापत्र को फाड़कर प्रचार में आगे बढ़े और संभव है कि इस राजनैतिक नाटक का पटाक्षेप उनके मंच से नीचे कूद पड़ने में हो. लेकिन एक बात की तो चिंता उसे करनी ही होगी, कि इस नाटक को देखने वाले अब हंस रहे हैं. बड़े से बड़े करिश्माई दावे को हवा करने के लिए एक हंसी ही काफी होती है. यह संयोग नहीं कि चढ़ाई आस्तीनों का जो कुछ भी असर था, वह धीरे-धीरे गायब होता दिख रहा है.
किसी राजनैतिक रुझान को पकड़ पाने में काफी वक्त लगता है, लेकिन 45 बरस का लंबा वक्त उस रुझान के अपवादों को दरकिनार कर देने के लिए पर्याप्त होता है. 45 साल पहले 1967 में कांग्रेस ने हिंदुस्तान का ज्यादातर हिस्सा क्षेत्रीय पार्टियों के हाथों गंवाना शुरू कर दिया था. इसकी पराकाष्ठा 1967, 1977 और 1990 के दशकों में दिखी जब यह दिल्ली में घुटनों के बल रेंगने लगी और अमृतसर से लेकर कलकत्ता तक इसका कोई नामलेवा नहीं रह गया. इसकी किस्मत का सितारा बुलंदी पर 1971-72 में पहुंचा जब इंदिरा गांधी ने पार्टी में विचारधारा का मंत्र फूंका. यही हाल 1984-85 में रहा जब उनकी शहादत कांग्रेस की चुनावी विजय में तब्दील हो गई. लेकिन 1952 से 1967 के बीच के 15 साल तक कांग्रेस सत्ता को लेकर जिस तरह आश्वस्त रही, वह दौर फिर कभी नहीं आया.
श्रीमती गांधी की विरासत अब भी दिमाग के बंद कोनों में कहीं-कहीं कौंध जाती है जो अब भी मतदाताओं के व्यवहार को तय करती है. वे एक मजबूत केंद्र और उसके अधीन कमजोर राज्य सरकारों में विश्वास करती थीं. क्षेत्रीय पार्टियों ने ऐसे में पलटवार किया और उनका साथ दिया हमारे संविधान के संघीय चरित्र ने. इस देश का मतदाता, जो तार्किक तौर पर मजबूत केंद्र और साथ ही मजबूत राज्य सरकार भी चाहता है, उसने दिल्ली के लिए तो कांग्रेस में भरोसा जताया लेकिन राज्यों के लिए दूसरी पार्टियों में. यहां तक कि अटल बिहारी वाजपेयी के एनडीए गठबंधन की कामयाबी भी 1977 से 1980 के बीच जनता पार्टी के राज में हुए विनाश की स्मृतियों को पूरी तरह मिटा नहीं सकी है. मतदाता शायद ही कभी गलत होता है और कांग्रेस हर बार राज्यों में उसे सही ठहरा देती है. यूपीए 2 भले ही टूट रही हो, लेकिन उससे ज्यादा गहरे गड्ढे में अगर कोई सरकारें पड़ी हैं तो वे हैं राजस्थान, आंध्र प्रदेश और गोवा की कांग्रेसी सरकारें.
राज्यों में कांग्रेस की इतनी खराब हालत है कि क्षेत्रीय पार्टियों के बीच धड़ेबाजी और गुटबाजी तक का दोहन करने में वह नाकाम रही है. यह पेनाल्टी स्ट्रोक में चूक जाने से कम बड़ा अपराध नहीं कहा जाएगा. इसकी बजाए इस किस्म के क्षेत्रीय विभाजनों ने कांग्रेस की वापसी को या तो रोका है या फिर उसकी संभावना ही खत्म कर डाली है. मसलन, तमिलनाडु में लोग द्रमुक के राज करने के तरीकों से खफा थे और कांग्रेस की बहाली संभव थी, लेकिन द्रमुक से अलग हुए अन्ना द्रमुकने सत्ता संभाल ली और अपने संस्थापक एम.जी. रामचंद्रन की मौत के 25 साल बाद भी आज सत्ता में है. बिहार में लालू यादव और नीतीश कुमार असहज स्थिति में ही सही, पर एक ही पार्टी में साथ थे. लालू ने बिहार पर कब्जा किया और अच्छी पारी खेली. उनके अहं और जातिगत समीकरण का गुब्बारा फूटा तो पटना की गद्दी पर नीतीश ने कब्जा कर लिया. कांग्रेस मुंह ताकती रह गई. अब लगता है कि नीतीश कुमार कांग्रेस को लालू के मुकाबले कहीं ज्यादा समय तक सत्ता से बाहर रखेंगे.
बंगाल में क्षेत्रीय ताकत यानी वाम तो एकजुट रहा, गोया कांग्रेस खुद टूट गई. एक बार फिर जब वाम का यहां पतन हुआ, तो वोटरों ने कांग्रेस को नहीं बल्कि ममता बनर्जी को विकल्प के तौर पर चुना. महाराष्ट्र में इस रुझान का दूसरा संस्करण आप देख सकते हैं. यहां कांग्रेस और उससे टूटी शरद पवार की एनसीपी ने अपने आंतरिक मतभेदों को दरकिनार कर के शिवसेना-भाजपा गठबंधन के खिलाफ कामयाब सरकार दी, लेकिन अब जब यह गठजोड़ कमजोर पड़ रहा है तो इसकी सबसे ज्यादा मार कांग्रेस पर पड़ी है, एनसीपी पर नहीं. उत्तर प्रदेश में तो कांग्रेस का पतन हुए 22 साल हो गए. मुलायम सिंह यादव और भाजपा ने बारी-बारी से सत्ता संभाली. जब मतदाता इन दोनों से ऊब गया, तो उसने कांग्रेस नहीं बल्कि चौथी ताकत मायावती को सत्ता थमा दी.
राहुल गांधी के सलाहकारों को अगर कोई दैवी आशीर्वाद मिला है तो वह है लगातार उत्साहित रहने की ताकत, शायद इसीलिए अतीत की उदास तस्वीर से वे नजरें चुरा लेते हैं. मुझे नहीं पता कि कांग्रेस यूपी में कैसा प्रदर्शन करने जा रही है, लेकिन यूपी के चुनाव को राहुल की ऊंची कूद का मैदान बना देना जोखिम भरा काम था. यदि तमाम हांफने-कांपने के बाद भी वे छलांग पूरी नहीं कर पाए तो यह उनके लिए बेहद शर्मनाक होगा. आपको भविष्यवक्ताओं और पत्रकारों के मुकाबले सटोरियों के पास ज्यादा सटीक जमीनी जानकारी मिलेगी. बीती 21 फरवरी को वे इन आंकड़ों पर दांव लगा रहे थे-सपा के लिए 120-130, बसपा के लिए 100 से 110, भाजपा के लिए 80-90 और कांग्रेस सिर्फ 50 से 60 के बीच. अगर यह सही है, तो अतीत का अब भी वर्तमान पर कुछ तो अख्तियार है.

