रसूखदारों को भी कभी न कभी कर्मों का फल भुगतना ही पड़ता है. गत हफ्ते ऐसे ही एक मामले में विशेष न्यायाधीश गौरीशंकर दुबे ने इंदौर विकास प्राधिकरण के पूर्व अध्यक्ष देवी सिंह राठौर, प्रशासनिक अधिकारी और प्राधिकरण के तत्कालीन मुख्य कार्यकारी एन. के. जैन, तत्कालीन मुख्य अभियंता आर. पी. गुप्ता सहित सात आरोपियों को 19 साल पहले किए अपराध के लिए एक-एक लाख रु. के जुर्माने सहित दो साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई. सड़क निर्माण में घोटाले की अज्ञात शिकायत पर कार्रवाई कर लोकायुक्त पुलिस ने 26.5 लाख रु. का हेरफेर पाया था.
लोकायुक्त पुलिस इंदौर के पुलिस अधीक्षक वीरेंद्र सिंह बताते हैं, ''मामला 1992 का है जिसमें उज्जैन के सिंहस्थ मेले के समय उपयोगी साबित होने वाली सड़क के डामरीकरण का ठेका सिंहस्थ होने के बाद बगैर निविदा बुलाए सांठगांठ कर दे दिया गया था.''
दरअसल आगरा-मुंबई राजमार्ग को उज्जैन रोड से जोड़ने वाली सड़क, एमआर10, सिंहस्थ में आने वाली भीड़ के मद्देनजर दुरस्त होनी थी लेकिन यह काम सिंहस्थ खत्म होने के छह माह बाद हुआ. अधिकारियों ने पद का दुरुपयोग करते हुए निविदा आमंत्रित किए बगैर नवंबर 1992 में प्रचलित सीएसआर से बेहद महंगी दरों पर खुराना कंस्ट्रक्शन कंपनी को ठेका दे दिया.
वीरेंद्र सिंह कहते हैं, ''लोकायुक्त पुलिस की जांच, जिसमें 26.5 लाख रु. से अधिक का घोटाला पाया गया, पूरी होने पर 1995 में प्रकरण दर्ज किया गया.'' राठौर, जैन और गुप्ता के साथ प्राधिकरण के दो कार्यपालन यंत्री सी.एम. डगांवकर और जगदीश राजगुरु, तत्कालीन अधीक्षण यंत्री एस.सी.जैन और ठेकेदार योगेंद्र खुराना के खिलाफ वर्ष 2000 में आरोपपत्र पेश किया गया. 2009 में सुनवाई पूरी होने के बाद सुरक्षित रख लिया गया फैसला 21 अप्रैल, 2010 को सुनाया गया.
खुराना भारतीय दंड विधान की धारा 120 बी के तहत जबकि प्राधिकरण से जुड़े आरोपी भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 की धारा 13 (1 डी) और 13 (2) के तहत दोषी पाए गए. लोकायुक्त के विशेष लोक अभियोजक लक्ष्मण सिंह कदम बताते हैं, ''दोषियों ने मामला खारिज कराने के लिए हरसंभव प्रयास किए, वे सुप्रीम कोर्ट तक गए, इससे मामला लंबित तो हुआ लेकिन उन्हें राहत नहीं मिली.'' हालांकि हाईकोर्ट में अपील करने के लिए आरोपियों को जमानत मिल गई लेकिन आखिरकार यह कहावत कि पापों का घड़ा भरता जरूर है, सही साबित हुई.

