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राजस्थान: राजनीति पानी उतारने की तैयारी

नहर, झुंझनूं जिले के मतदाताओं की वो नब्ज है जिसे ऐन वक्त पर दबाकर कोई भी चुनावी समर में बाजी मार सकता है. और इस नब्ज की कमजोरी को दिग्गज कांग्रेसी नेता शीशराम ओला से बेहतर भला कौन जान सकता है, जो अपने हरेक चुनाव में नहर को मुद्दा बनाते हैं.

अपडेटेड 23 मई , 2012

नहर, झुंझनूं जिले के मतदाताओं की वो नब्ज है जिसे ऐन वक्त पर दबाकर कोई भी चुनावी समर में बाजी मार सकता है. और इस नब्ज की कमजोरी को दिग्गज कांग्रेसी नेता शीशराम ओला से बेहतर भला कौन जान सकता है, जो अपने हरेक चुनाव में नहर को मुद्दा बनाते हैं और जीत भी जाते हैं. पिछले चुनाव में भी उनकी नैया नहर से ही पार हुई थी.

इस बार ओला ने नहर की मांग कर एक तीर से दो निशाने साधे हैं. एक, अगले साल चुनाव हैं सो मतदाताओं की कमजोर नब्ज टटोलने का श्रीगणेश किया और दूसरा गहलोत को आंख दिखाना. कुछ ऐसे ही इरादों के साथ पिछले दिनों ओला ने नहर लाने के लिए गहलोत सरकार के खिलाफ जिले में एक दिन का प्रदर्शन किया. इस प्रदर्शन में ओला ने गहलोत सरकार और हरियाणा सरकार को जमकर कोसा.

ओला की मानें तो जब वे केंद्र में जल संसाधन राज्‍य मंत्री थे तब उन्होंने सेंटर वाटर कमीशन की मंजूरी के साथ 934 करोड़ रु. झुंझुनूं में नहर के लिए मंजूर करवाए. लेकिन राजस्थान और हरियाणा में अलग-अलग दलों की सरकारें होने से सहमति पत्र पर हस्ताक्षर नहीं हुए. ओला कहते हैं, ''मैं नहर के लिए आर-पार की लड़ाई लड़ने को तैयार हूं.''

ओला ने जमा भीड़ से सहयोग मांगा और साथ में यह भी कहा कि गहलोत सरकार से हमारी कोई दुश्मनी नहीं है लेकिन जिले में पानी की जरूरत पहले है. उनकी मांग जायज है, लेकिन ओला के बोल सियासी थे क्योंकि इस प्रदर्शन से पहले भाजपा नेता सुमित्रा सिंह ने कहा था कि नहर की मांग पर प्रदर्शन में ओला का साथ देंगी. पर ओला ने साफ कह दिया कि मंच पर कोई भाजपाई नहीं बैठेगा. इस पर पलटवार करते हुए सुमित्रा ने ओला को मनोरोगी बताते हुए कहा, ''ओला की रुचि नहर लाने में नहीं, राजनीति करने में है.''

खैर, अब राजनीति की बात करें तो ओला की इस सभा में कोई कांग्रेसी विधायक नहीं था और न ही भारी जनसमर्थन जुट पाया. इस सभा को नौटंकी करार देते हुए झुंझुनूं भाजपा जिला अध्यक्ष दशरथ सिंह शेखावत बताते हैं, ''ओला और नहर दोनों से जिले की जनता ऊब चुकी है. प्रदर्शन में एक लाख से ज्‍यादा भीड़ होनी थी लेकिन हुई 2,000. जनता सब जानती है.''

पिछले तीन दशक से ओला नहर के मुद्दे से जुड़े हैं और कई बार वे अनशन और इस्तीफा देने की धमकी भी दे चुके हैं. सुमित्रा सिंह की मानें तो जो मुद्दा ओला उठा रहे हैं, उसे वे दशकों पहले भी विधानसभा में उठा चुकी हैं, जब वे पहली बार विधायक बनी थीं. सुमित्रा सिंह की मानें तो उनके द्वारा उठाया गया मुद्दा विधानसभा के रिकॉर्ड में भी दर्ज है. उस समय इंदिरा गांधी नहर का नाम राजस्थान नहर था और खुदाई का काम चल रहा था. लेकिन झुंझुनूं को इस नहर से जोड़ने की कोई संभावना नहीं थी.

गौरतलब है कि झुंझुनूं जिले का राजनैतिक माहौल कांग्रेस बनाम भाजपा नहीं बल्कि कांग्रेस बनाम कांग्रेस है. ओला की किसी बात पर भाजपा अपनी प्रतिक्रिया दे उससे पहले कांग्रेस के नेता ओला के खिलाफ बोल पड़ते हैं. एक तरफ दिग्गज कांग्रेस नेता ओला तो दूसरी ओर सूरजगढ़ विधायक श्रवण कुमार एक दूसरे पर अकसर हल्ला-बोल से चर्चा में रहते है.

वहीं, राज्‍य सरकार के मंत्री डॉ. राजकुमार शर्मा और ओला भी सार्वजनिक मंच पर एक-दूसरे के खिलाफ जहर उगलने से पीछे नहीं हटते हैं. मंत्री राजेंद्र गुढ़ा और गहलोत सरकार के संकटमोचन मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह के भी ओला के साथ मधुर संबंध नही हैं. ओला को तकरीबन आधा दर्जन नेताओं ने घेर रखा है.

लेकिन कुछ कर गुजरने में विश्वास रखने वाले ओला ऐसा कोई मौका नहीं छोड़ते जिसमें वे अपने विरोधियों को आंख नहीं दिखाएं. ओला लगातार पांच बार सांसद, आठ बार विधायक और केंद्र और राज्‍य सरकार में मंत्री रह चुके हैं.

राजनैतिक गोटियां खेलकर उम्र के इस दौर में पहुंच चुके ओला जानते हैं कि कौन-सी चाल से किसको मात मिलेगी. तभी तो ओला ने हाल ही में उस मांग (नहर) पर सरकार को घेरा जिसके मंत्री (नहर मंत्री) खुद ओला के बेटे बिजेंद्र ओला हैं. लेकिन ओला जानते हैं कि निशाना कहां पर लगा है?

झुंझुनूं जिले में नहर पर चल रही राजनीति क्या वाकई में यहां के उन दर्जनों गांवों की प्यास बुझएगी जहां पीने का पानी तक नहीं है? किसी भी पक्ष की रुचि न होने की वजह से जाहिर है अब नहर की लागत इतनी बढ़ चुकी है कि इसके लिए बजट का बड़ा हिस्सा चाहिए. क्या इस हिस्से के लिए जिले के नेता और राजस्थान सरकार सही में राजनीति से परे जाकर एक होकर नेक प्रयास करेगी? हां, इस बात का सबको यकीन है कि अगले चुनाव में भी नहर ही मुद्दा रहने वाली है.

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