बुरे समय में नींद
रामाज्ञा शशिधर
अंतिका प्रकाशन, शालीमार गार्डन, गाजियाबाद-5,
कीमतः 200 रु.
रामाज्ञा शशिधर का यूं तो यह तीसरा काव्य संग्रह है लेकिन उनके कवि की मुकम्मल पहचान के लिए यह पहला महत्वपूर्ण संग्रह माना जा सकता है.
सामने घाट और सिमरिया घाट जैसे दो घाट खंडों में विभाजित इस संग्रह में कुल 69 कविताएं हैं, जो घाटों की विविधता जैसी अलग-अलग रूपाकृतियां लिए हुए हैं लेकिन जैसे हर घाट की विविध रूपाकृतियां अंततः एक सांस्कृतिक प्रवाह लिए हुए होती हैं, वैसे ही ये कविताएं भी एक सतत और स्थिर सांस्कृतिक प्रवाह लिए हुए हैं और वह है-जीवन में नित प्रति उठने वाली हलचलों और तरंगों का बोध, जो रामाज्ञा के कवि को एक आधुनिक भंगिमा से भर देता है.
ठीक गंगा की तरह ही इन कविताओं को एक करने वाली जो नवीन तरंग, भंगिमाएं हैं, वे कवि को एक अलग व्यक्तित्व देती हैं.
संग्रह की पहली ही कविता है-कविता में धान, जिसमें कवि कहता है मैं धान हूं/कागज पर उठा हुआ/नए कवि की/कविता में. धान न तो पथरीली जमीन पर उगता है और न ही ऊसर में. वह उगता है धरती के नमी वाले क्षेत्र में. कवि अगर कागज पर उगा रहा है तो निश्चय ही यह कागज शुष्क न होकर भीगा हुआ है. कठोर न होकर मुलायम है, सख्त न होकर लचीला है.
कागज पर नमी का यह बोध कवि की चितवन को एक तरफ आर्द्र बनाता है तो दूसरी तरफ उल्लसित. यह दोनों ही मिलकर मानवीय करुणा के जिस भाव को व्यक्त करते हैं, वह कवि को एक तरफ वाल्मीकि के विह्वल मानस से जोड़ता है तो दूसरी तरफ कबीर की संघर्षशील फक्कड़ता से. इसी कारण यह संग्रह धान के भात बनने के अवरोधी तत्वों की सख्त मीमांसा भी करता है.
संग्रह में ऐसी बहुत-सी कविताएं हैं, जैसे विदर्भ, खेत, सेवाग्राम, बुनकर, चौकीदार, भूख, बासमती गीत, मांझी जो कवि के करुणा विगलित मानस के साथ उसकी व्यापक सामाजिक बेचैनी का पता देती हैं. ये कविताएं बताती हैं कि कोई कवि आत्महंता होने की हद तक अपने कवि को खतरे में डाल सकता है. देवता बनने से ज्यादा मनुष्य होने का संघर्ष भी दिखाई देता है शशिधर की कविताओं में.
कुल मिलाकर कह सकते हैं कि इस संग्रह की कविताओं में बौद्धिक अनुशासन तो है लेकिन प्रभुत्व दिखाने की बेचैनी से परहेज है, जो आजकल की नकली कविताओं का शिल्प हो गया है. ये 'गौरव गदराई' न होकर अदहन अकुलाई कविताएं हैं. देह की भाषा न बोलकर दिल की भाषा बोलने वाली कविताएं.

