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प्‍लेसमेंट एजेंसियां: जिस्म से कमाई के नए सौदागर

दिल्ली में प्लेसमेंट एजेंसियों के जरिए लड़कियों की खरीद-फरोख्त जोरों पर. सब्जबाग दिखाकर घरों में काम के अलावा धकेल रहे जिस्मफरोशी के धंधे में.

अपडेटेड 24 जुलाई , 2011

पश्चिम बंगाल के 24 परगना के एक सुदूर गांव की सकीना (बदला हुआ नाम) अपने परिवार को पस्त आर्थिक हालातों से उबारना चाहती थी. वह अपने एक पहचान वाले के नौकरी के वादे पर दो साल पहले दिल्ली आ गई. लेकिन यहां कदम रखते ही उसके पांव तले की जमीन खिसक गई.

उसे काम दिलाने की बजाए देह व्यापार के गर्त में धकेल दिया गया. वह कुछ समझ पाती, उसने खुद को हरियाणा के रोहतक में अनजान लोगों के रहमोकरम पर पाया. अब वह इस चंगुल से बाहर आ चुकी है. लेकिन उसके साथ हुई ज्‍यादतियों का खौफ उसके चेहरे पर अब भी साफ नजर आता है.

वह टूटी-फूटी हिंदी में सिर्फ इतना ही बता पाती है, ''वह खुद को प्लेसमेंट एजेंसी का एजेंट बताता था. यहां लाया, हम नहीं जानते थे हम कहां हैं. उन्होंने हमारा जिस्म लूटा. सब बुरे थे.'' अब सकीना वापस अपने घर लौट चुकी है.

सकीना जैसी गरीब परिवारों की हजारों लड़कियां रोजगार की तलाश में दिल्ली सरीखे महानगरों का रुख कर रही हैं और इसी बात का फायदा उठा रही हैं फर्जी प्लेसमेंट एजेंसियां. पुलिस उपायुक्त (अपराध) अशोक चांद बताते हैं, ''पिछले कुछ समय में फर्जी प्लेसमेंट एजेंसियों के मामले बढ़े हैं और हमने कई लोगों को धरा भी है.''

इस बात की पुष्टि काफी हद तक 18 जून, 2011 को दिल्ली के राजौरी गार्डन की राजधानी प्लेसमेंट एजेंसी पर दिल्ली पुलिस की अपराध शाखा की मानव तस्करी निरोधक इकाई की कार्रवाई से हो गई. पुलिस की इस कार्रवाई में 9 नाबालिग लड़कियां को छुड़ाया गया और प्लेसमेंट एजेंसी के मालिक मुन्ना चौधरी (41) को धरा गया.

चांद बताते हैं, ''असम का रहने वाला मुन्ना पिछले छह साल से प्लेसमेंट एजेंसी चला रहा था. यह एजेंटों के जरिए असम के गरीब परिवारों की लड़कियों को यहां लाता था. एजेंटों को प्रति लड़की 12,000 रु. मिलते थे जबकि एजेंसी जिन घरों में लड़कियां घरेलू काम के लिए जाती थीं उनसे 20,000-25,000 रु. वसूलती थी. इन लड़कियों को कुछ नहीं मिलता था.''

बताया जाता है कि मुन्ना चौधरी लगभग 320 बच्चियों को अभी तक रोजगार के बहाने ला चुका है और उस पर लड़कियों के यौन शोषण के भी आरोप हैं.

इस अभियान में अहम भूमिका निभाने और मानव तस्करी के खिलाफ काम करने वाले स्वयंसेवी संगठन शक्तिवाहिनी के एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर निशिकांत कहते हैं, ''जब से प्लेसमेंट एजेंसियों पर निगरानी बढ़ी है तबसे एजेंसियां खुद को फर्जी एनजीओ के नाम से पंजीकृत करा रही हैं. ये एजेंसियां लड़कियों का यौन उत्पीड़न तो करती ही हैं साथ ही इनके काम का पैसा भी इन्हें नहीं देतीं.''

इस तरह के उत्पीड़न की शिकार पश्चिम बंगाल के दह्निण दीनाजपुर की गायत्री (बदला हुआ नाम) बताती है, ''साल भर पहले सुनील नाम का एक शख्स मुझे नौकरी के लिए दिल्ली लाया था. मुझे उसने एक घर में काम दिलाया. वहां मैंने एक साल काम किया पर एक पैसा भी नहीं मिला.

बाद में सुनील मुझे गुड़गांव ले गया और उसने वहां मुझे आठ-नौ दिन रखा और शारीरिक संबंध भी बनाए. बाद में एक शख्स की मदद से ही मैं उसके चंगुल से छूट पाई.'' निशिकांत बताते हैं, ''हम पिछले एक साल में लगभग 200 लड़कियों को छुड़ा चुके हैं और इनमें प्लेसमेंट एजेंसियों के जरिए शोषित होने वाली लड़कियों की संख्या काफी है. अधिकतर मामलों में इनके यौन-उत्पीड़न की बात सामने आती है.''

दिल्ली में इन एजेंसियों के मकड़जाल का खुलासा स्वयंसेवी संगठन बचपन बचाओ आंदोलन के आंकड़ों से बखूबी हो जाता है. इस स्वंयसेवी संगठन से जुड़े राकेश सेंगर कहते हैं, ''हमने दिल्ली में एक सर्वे किया था, जिसके मुताबिक लगभग 2,500 प्लेसमेंट एजेंसियां बिना किसी पंजीकरण के यहां काम कर रही हैं.''

ऐसा नहीं है कि कानून इसे लेकर खामोश है, लेकिन कार्रवाई के नाम पर कुछ होता नजर नहीं आता. पिछले साल दिसंबर में दिल्ली हाइकोर्ट ने सरकार को निर्देश दिया था कि वह राजधानी में काम करने वाली एजेंसियों के पंजीकरण पर नजर रखे. लेकिन धरातल पर ऐसा कुछ होता नजर नहीं आता.

दिल्ली के विभिन्न इलाकों में धड़ल्ले से  ऐसी एजेंसियां खुल रही हैं जो नियमों की धज्जियां उड़ा रही हैं. अदालत ने दिल्ली पुलिस को प्लेसमेंट एजेंसियों का मुआयना करने के लिए भी कहा था, लेकिन इस संबंध में पुलिस अधिकारी कुछ भी कहने से कतरारते नजर आते हैं.

खास यह कि प्लेसमेंट एजेंसियां बहुत सोच-समझ्कर अपने ठिकाने बनाती हैं. चांद बताते हैं, ''ये लोग आवासीय कॉलोनियों के करीब अपने दफ्तर खोलते हैं.'' तभी तो दह्निणी दिल्ली में इनके ठिकाने गोविंद पुरी, संगम विहार, कोटला मुबारकपुर, चिराग दिल्ली, लाजपत नगर में हैं,  तो पश्चिमी दिल्ली में मादीपुर और उत्तर-पश्चिम दिल्ली में शकूरपुर और वजीरपुर हैं.

खास यह कि एजेंट लड़कियों की आपूर्ति के लिए गरीब राज्‍यों और पिछड़े जिलों को चुनते हैं. राज्‍यवार स्थिति पर नजर डालें तो झारखंड के पाखुर, रांची, लोहरदग्गा, गुमला, पूर्वी सिंहभूम; बिहार के सहरसा, मधेपुरा, अररिया, खगड़िया, कटिहार; पश्चिम बंगाल के 24 परगना, मालदा, दार्जिलिंग, हावड़ा; असम का डिब्रूगढ़ और ओडीसा के कोकराझार, सुंदरगढ और कालाहांडी से लड़कियों को महानगरों की ओर भेजे जाने की संख्या सर्वाधिक है.

एजेंटों के लड़कियों को बहकाने के बारे में सेंगर कहते हैं, ''अक्सर ये गरीब परिवार या बेसहारा लड़कियों को निशाना बनाते हैं. ये एजेंट लड़कियों के परिवार के करीबी या उनके जानने वाले होते हैं जो उन्हें सब्जबाग दिखाते हैं. फिर ये लड़की को स्टेशन पर लाकर दूसरे शख्स के हवाले कर देते हैं जो उन्हें 2,000 रु. तक देता है. इन लड़कियों को लाने वाला शख्स इन्हें दिल्ली में 5,000-10,000 रु. प्रति लड़की के हिसाब से प्लेसमेंट एजेंसी के हवाले कर देता है.''

एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी कहते हैं कि लड़की दिल्ली लाए जाने के बाद या तो मालिक के शोषण का शिकार होती है या फिर उसे जिस्म के सौदागरों के सुपुर्द कर दिया जाता है. पश्चिम बंगाल के 24 परगना की चित्रा (बदला हुआ नाम) इसका सटीक उदाहरण है.

उसे नौकरी का झंसा देकर प्लेसमेंट एजेंसी का एक एजेंट दिल्ली लाया लेकिन यहां उसने उसे जीबी रोड पर बेच दिया. कोलकाता हाइकोर्ट के आदेश पर हुई कार्रवाई के बाद ही उसे नारकीय जीवन से मुक्त कराया गया. चित्रा बताती है, ''कुछ दिन तो मुझे पता ही नहीं चला कि मेरे साथ क्या हो रहा है, लेकिन जब तक पता चलता बहुत देर हो चुकी थी. मेरे साथ रोज जोर-जबरदस्ती होती थी.''

दिल्ली या किसी भी महानगर में लाए जाने पर इनके साथ जानवरों जैसा व्यवहार होता है. गायत्री बताती है, ''प्लेसमेंट एजेंसी के मालिक ने एक छोटी-सी कोठरी में कई लड़कियों को रखा हुआ था. वह अक्सर हमारे साथ मारपीट और जोर-जबरदस्ती किया करता था.''

लड़कियों की इस तस्करी पर नजर डालें तो उन्हें बहला-फुसला तीन कारणों से लाया जाता है-पहला घर में काम करवाने, दूसरा देह व्यापार और तीसरा हरियाणा तथा पंजाब में जबरन ब्याह के उद्देश्य से. यही नहीं, नया खुलासा करते हुए एक सामाजिक कार्यकर्ता बताते हैं, ''जिस तरह भारतीयों में विदेशी लड़कियों के प्रति आकर्षण रहता है, उसी तरह भारत आने वाले कई विदेशी आदिवासी लड़कियों की मांग करते हैं. राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान आदिवासी लड़कियों की दिल्ली में मांग काफी बढ़ी थी.''

इस तरह की बढ़ती घटनाओं के कारण पिछले दिनों असम पुलिस (स्पेशल ब्रांच) के अधिकारी आनंद कुमार ने दिल्ली पुलिस को मानव तस्करी पर एक रिपोर्ट सौंपी है. रिपोर्ट में ऐसी 40 एजेंसियों की पहचान की गई है जो दिल्ली में मानव तस्करी को अंजाम दे रही हैं. रिपोर्ट में कहा गया है कि इन एजेंसियों के मालिक पहले खुद एजेंट थे पर अब इन्होंने अपनी  एजेंसियां खोल ली हैं. यही नहीं, इन लड़कियों को उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब और जम्मू-कश्मीर में बेचा जाता है.

इस पूरे परिदृश्य में जहां पुलिस कुछ कार्रवाई करती नजर आती है, वहीं श्रम विभाग सिर्फ गैर पंजीकृत एजेंसियों के चालान की बात करता है. ज्‍वाइंट लेबर कमिश्नर राजेंद्र धर कहते हैं, ''नियम तोड़ने वाली एजेंसियों पर हम निगरानी रख रहे हैं और उनका चालान भी कर रहे हैं.'' बेशक पुलिस और प्रशासन अपना-अपना पल्ला झाड़ सकते हैं. लेकिन मामले की गंभीरता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.


*दिल्ली में लगभग 2,500 प्लेसमेंट एजेंसियां गैर पंजीकृत
*सरकारी आंकड़ों में दर्ज हैं करीब 100 एजेंसियां मात्र
*झारखंड, बिहार, प. बंगाल, असम और ओडीसा से लाई जाती हैं लड़कियां
*उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब और जम्मू-कश्मीर में होती है सप्लाई


रोजगार के नाम पर
17 अप्रैल, 2011: दिल्ली के ईस्ट ऑफ कैलाश से एक प्लेसमेंट एजेंसी से 3 लड़कियों को बचाया गया. इन लड़कियों को नौकरी का झंसा देकर पश्चिम बंगाल से लाया गया था.
6 मई, 2011: दिल्ली पुलिस ने असम की एक लड़की को मानव तस्करों के चंगुल से छुड़ाया. काम के बहाने से एक शख्स इसे दिल्ली लाया. उससे बलात्कार किया और दिल्ली की एक प्लेसमेंट एजेंसी में रखा.
17 मई, 2010: बबिता एंटरप्राइजेज नाम की प्लेसमेंट एजेंसी पर छापे में 11-15 वर्ष की उम्र की 7 लड़कियां छुडाई गईं.
3 जुलाई, 2011: नौकरी का झंसा देकर पश्चिम बंगाल की तीन लड़कियों को हरियाणा में दलालों के हाथ बेच देने वाले एक गिरोह का पर्दाफाश. नाबालिग लड़की को जबरन देह व्यापार के गर्त में धकेला जा रहा था.
18 जुलाई, 2011: दिल्ली के राजौरी गार्डन की राजधानी प्लेसमेंट एजेंसी से 9 नाबालिग लड़कियां मिलीं.

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