गए दिसंबर के आखिरी दिनों में नई दिल्ली से एक गुप्त चिट्ठी ढाका पहुंची. इसे सीधा बांग्लादेश की प्रधानमंत्री 65 वर्षीया शेख हसीना को पहुंचाया गया. इसमें उन्हें चेतावनी दी गई थी कि बांग्लादेश की सेना के भीतर मौजूद कुछ इस्लामी चरमपंथी तख्तापलट की साजिश रच रहे हैं.
हसीना के पास इस पर भरोसा करने और तख्तापलट की आशंका से डरने की पर्याप्त वजह भी थी. सन् 1975 में 15 अगस्त की वो रात थी जब उनके पिता यानी बांग्लादेश के पहले राष्ट्रपति शेख मुजीबुर्रहमान, उनकी मां और तीन भाइयों को बांग्लादेश की सेना के अफसरों ने मार डाला था. शेख हसीना और उनकी बहन सिर्फ इसलिए बच गईं क्योंकि उस वक्त वे यूरोप में थीं.
तख्तापलट की आशंका को भांपते हुए भारत ने शेख हसीना, उनकी कैबिनेट और अवामी लीग पार्टी के आला नेताओं को बचाने के लिए एक आपात योजना तैयार कर ली थी. तख्तापलट की हालत में पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा के एयरबेस पर तैनात भारतीय हेलिकॉप्टर उड़ान भरते और पूरी योजना को हवाई सुरक्षा प्रदान करते. ढाका में और उस के इर्द-गिर्द हेलिकॉप्टर को उतारने की जगहों की पहचान की जा चुकी थी ताकि पार्टी के नेताओं को वहां से निकाला जा सके.
पूरे दिसंबर भर बांग्लादेश की गुप्तचर एजेंसी डायरेक्टरेट जनरल ऑफ फोर्सेज इंटेलिजेंस (डीजीएफआइ), जो सीधे हसीना को रिपोर्ट करती है, चुपचाप अपना काम करती रही. उसने फोन पर होने वाली बातचीत, एसएमएस और ई-मेल टैप किए, जिनमें साजिश की बू आती थी. सोशल नेटवर्किंग साइटों पर निगरानी रखी गई. दिसंबर के अंत से लेकर जनवरी के बीच कई गिरफ्तारियां भी की गईं.
इन गिरफ्तारियों पर विपक्ष की नेता बांग्लादेश नेशनल पार्टी (बीएनपी) की बेगम खालिदा जिया ने चटगांव में एक रैली में आरोप लगाया कि सेना के अधिकारी ''अचानक गायब हो रहे हैं.'' सेना की मीडिया विंग इंटर सर्विसेज पब्लिक रिलेशंस (आइएसपीआर) ने जिया को चेतावनी दे डाली कि वे ऐसे बयानों से बचें. सेना को इस बात की चिंता थी कि कहीं संभावित तख्तापलट की सूचना मीडिया में लीक न हो जाए.
तख्तापलट की कोशिशें बेहद बारीक तरीके से शुरू हुईं. एक फेसबुक ग्रुप ''सोल्जर्स फोरम'' में फौजियों को सरकार के खिलाफ भड़काने वाले कुछ पोस्ट डाले गए. मिलिटरी अकादमी का स्नातक और मिलिटरी इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस ऐंड टेक्नोलॉजी में प्रशिक्षक मेजर जिया तख्तापलट की कोशिश का मास्टरमाइंड निकला. वह ब्रिटेन के नंबर वाला एक मोबाइल फोन इस्तेमाल कर के साजिश के बारे में सेना के अन्य 11 अफसरों से बात करता था. अपने फेसबुक एकाउंट पर उसने लिखा कि ''बांग्लादेशी फौज के मध्य क्रम के अफसर जल्द ही कोई बदलाव लाने जा रहे हैं.'' बीती 8 जनवरी को प्रतिबंधित चरमपंथी संगठन हिज्ब-उल-तहरीर ने उसकी पोस्ट पर आधारित एक भड़काऊ परचा बांटा.
जिया अपने फेसबुक एकाउंट पर आतंकवाद विरोधी एजेंटों द्वारा बांग्लादेशी फौज के अफसरों की गिरफ्तारी की सूचनाओं को अपडेट करता रहता था. ऐसी एजेंसियों में भारत की रॉ का नाम भी लिया गया था. उसके संदेशों का प्रसार कुछ ब्लॉग्स तक हो गया और उसे बीएनपी समर्थक एक अखबार आमार देश ने भी उठा लिया. इस दौरान डीजीएफआइ और अन्य सुरक्षा एजेंसियां संदिग्ध लोगों पर लगातार नजर रखे हुए थीं. उन्होंने पाया कि तख्तापलट की संभावित तारीख 10 या 11 जनवरी थी. एक के बाद एक इन लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया. अब वे सेना मुख्यालय ढाका में नजरबंद हैं.
बीती 19 जनवरी को सेना ने इस साजिश की खबर को सार्वजनिक कर डाला. ढाका के आर्मी ऑफिसर्स क्लब में की गई अपनी पहली प्रेस कॉन्फ्रेंस में आइएसपीआर के प्रवक्ता ब्रिगेडियर जनरल मुहम्मद मसूद रज्जाक ने सारे सवालों के जवाब दिए. उन्होंने हसीना की ''लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई धर्मनिरपेक्षता समर्थक सरकार'' को खतरे के बारे में बात की. हालांकि वे विस्तार में नहीं गए. उन्होंने दावा किया कि सेना के ही मध्य क्रम के पूर्व और वर्तमान के 14 से 16 कट्टरपंथी अफसर सरकार को गिरा कर इस्लामिक सत्ता लाने की साजिश में लगे थे. सरकार को उखाड़ फेंकने की साजिश करने के आरोप में दो पूर्व सैन्य अफसरों लेफ्टिनेंट कर्नल अहसान यूसुफ और मेजर जाकिर को गिरफ्तार किया गया और उन्होंने ''साजिश रचने में अपनी भूमिका को स्वीकार किया.'' कोमिला 33वीं इन्फैंट्री डिवीजन के एरिया कमांडर मेजर जनरल मुहम्मद कमरुज्जमां को पद से हटाकर ढाका में नजरबंद कर लिया गया है जबकि 9वीं डिवीजन की 71वीं ब्रिगेड के कमांडर ब्रिगेडियर तारिक उल आलम और रंगपुर की 66वीं डिवीजन के मेजर जनरल शब्बीर अहमद पर सुरक्षा एजेंसियां नजर रखे हुए हैं. ढाका और अन्य छावनियों के 11 अन्य अफसरों को ढाका छावनी में नजरबंद किया गया है.
बांग्लादेश के सेना प्रमुख जनरल मुहम्मद मैनुल इस्लाम कहते हैं कि मेजर जनरल और कुछ मजहबी कट्टरपंथियों ने कट्टर अफसरों को भड़काने की योजना बनाई थी. उन्होंने बताया, ''उन्होंने लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए धर्मभीरु अफसरों को चुना था जो इस काम को अंजाम देते.'' 21 जनवरी को हसीना ने कहा, ''मैं बांग्लादेश की सेना और सशस्त्र बल का शुक्रिया अदा करना चाहूंगी. उन्होंने अगर वक्त रहते इस साजिश का पर्दाफाश न किया होता तो मुल्क में बड़ी तबाही आ सकती थी. सेना ने लोकतांत्रिक सरकार को पलट देने की साजिश को नाकाम करके इस मुल्क को और इसकी देशभक्त ताकतों को बचा लिया.'' उन्होंने कहा कि अपनी राजनैतिक दुश्मन बेगम खालिदा जिया पर तख्तापलट की साजिश करने का आरोप लगाया. बीएनपी ने इसका खंडन किया और इसके अलावा उस आरोप को भी खारिज कर दिया जिसमें कहा गया था कि देश से बाहर रह रहे बीएनपी के नेता और जिया के बेटे तारिक रहमान इस नाकाम तख्तापलट का हिस्सा थे.
बांग्लादेश की सेना कह रही है कि तख्तापलट का कथित मास्टरमाइंड मेजर जिया गिरफ्तारी से बच निकला है. इसके बावजूद एक भूमिगत इस्लामिक संगठन के सक्रिय होने की बात ने मामले को दिलचस्प बना दिया. बांग्लादेश की सेना ने साजिश करने वालों को हिज्ब-उल-तहरीर से जोड़ा है. येरूशलम में 1953 में स्थापित तहरीर अब 40 से ज्यादा देशों में फैल चुका है और पाकिस्तान में भी सक्रिय है. हसीना सरकार ने अक्तूबर, 2009 में तहरीर पर पाबंदी लगा दी थी. आतंकवाद विरोधी एजेंसियों और सुरक्षा एजेंसियों जैसे रैपिड एक्शन बटालियन, नेशनल सिक्योरिटी इंटेलिजेंस और गुप्तचर विभाग लगातार दावा कर रहे थे कि उन्होंने तहरीर को नियंत्रित कर लिया है. अपने दावे के समर्थन में उन्होंने कुछ महत्वपूर्ण लोगों और सैकड़ों अन्य को हिरासत में लिए जाने की बात कही. इनमें एक प्रतिष्ठित निजी विश्वविद्यालय के शिक्षक तौफीक इलाही और ढाका के यूनाइटेड हॉस्पिटल में चिकित्सक 45 वर्षीय डॉ. गुलाम हैदर रसूल को भी गिना गया. हालांकि हिज्ब-उल-तहरीर का नेता मौलाना ममूनुर रशीद, जो ढाका के एक मदरसे का प्रिंसिपल भी है, भगोड़ा बताया जा रहा है.
तहरीर के करीब 500 सदस्यों को रैलियां निकालने और परचे बांटने के आरोप में हिरासत में लिया गया. पुलिस अधिकारी मानते हैं कि सिर्फ गिरफ्तारियां करके अच्छी-खासी फंडिंग पाने वाले इस संगठन पर लगाम नहीं लगाई जा सकती है. अपराध निरोधक रैपिड एक्शन बटालियन की गुप्तचर शाखा के निदेशक लेफ्टिनेंट कर्नल जिया उल हसन कहते हैं, ''यह मुश्किल है क्योंकि हिरासत में लिए गए कार्यकर्ताओं के परिवारों को ग्लोबल नेटवर्क से पैसा मिलता है. उन्हें इनके गिरफ्तार होने की बहुत चिंता नहीं रहती.'' हिरासत में लिए गए अधिकतर आतंकवादी जमानत पर रिहा होने के बाद दोबारा संगठन में चले जाते हैं. प्रतिबंध लगने के बाद यह संगठन और ज्यादा ताकत से उभरा है.
वर्दीधारी कार्यकर्ताओं के अलावा तहरीर के लोग गोपनीय तरीके से समाज के आभिजात्य तबकों, सरकारी कर्मचारियों, अकादमिकों और नेताओं के बीच फैले हैं. ढाका विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान पढ़ाने वाले नज्मुल अहसान कलीमुल्ला कहते हैं, ''कट्टरपंथ का उनका नया तरीका यह है कि कौवे के घोंसले में कोयल के अंडे डालो.''
खाकी वर्दी वाले ये इस्लामिक कार्यकर्ता बांग्लादेश के कमजोर लोकतंत्र के लिए शुरू से खतरा रहे हैं. 1975 में मुजीबुर्रहमान की हत्या के बाद से यहां की फौज ने चार बार तख्तापलट को अंजाम दिया है. फौज दो चुने हुए राष्ट्रपतियों की हत्या कर चुकी है और तीन अन्य राष्ट्रपतियों को जबरन सेना समर्थित इमरजेंसी लगाने के लिए बाध्य कर चुकी है. पिछला तख्तापलट जनवरी, 2007 में हुआ था. उसके बाद से ही सेना को बैरकों में सीमित रखने की कोशिश हुई है. सुप्रीम कोर्ट यहां एक प्रमुख संस्था है. पूर्व चीफ जस्टिस मुहम्मद तफज्जुल इस्लाम की अध्यक्षता वाली एक खंडपीठ ने 28 जुलाई, 2010 को एलान किया था कि 15 अगस्त, 1947 से लेकर फरवरी, 1979 के बीच आई तीन सत्ताएं गैरकानूनी थीं. संसद द्वारा नवंबर, 2011 में स्वीकार नए संविधान ने सभी धर्मों के सम्मान के बुनियादी तत्व तथा जातीय अल्पसंख्यकों की मान्यता को बहाल किया है. लेकिन जैसा कि ब्रिटेन के आतंक विशेषज्ञ क्रिस ब्लैकबर्न कहते हैं, ''हालिया तख्तापलट की साजिश दिखाती है कि दक्षिण एशिया में चरमपंथ के कई चेहरे हैं. सेना के भीतर हमेशा से एक रुझान रहा है कि देश को आपस में जोडऩे में धर्म के महत्व को स्वीकार करना होगा और इसकी पहल फौज को ही करनी चाहिए. निश्चित तौर पर सेना में ऐसे कुछ अफसर हैं जो खुद को राज्य और धर्म दोनों का रखवाला समझते हैं. लेकिन मैं अब भी सोचता हूं कि तख्तापलट की कोशिश में तहरीर की भूमिका पर कोई भी अटकलबाजी करना जल्दबाजी होगी. यह एक कट्टरपंथी समूह है.''
शेख हसीना 2009 की शुरुआत में सत्ता में आने के बाद से ही लगातार खतरों से मुकाबिल हैं. खतरा और ज्यादा तब बढ़ गया जब अर्द्धसैनिक बल बांग्लादेश राइफल्स (अब नया नाम बॉर्डर गार्ड्स बांग्लादेश) के 1,000 से ज्यादा जवानों ने सेना की मनमानी के खिलाफ विद्रोह कर दिया. प्रधानमंत्री कार्यालय के सूत्रों के मुताबिक जैसे ही इस अर्द्ध सैन्य बल में विद्रोह फूटा, भारत ने आपातकालीन स्थिति में ढाका उड़ान भरने के लिए विशेष बल-50 पैराशूट इंडिपेंडेंट ब्रिगेड को अलर्ट कर दिया. भारत साफ तौर पर शेख हसीना का समर्थन कर रहा है. प्रधानमंत्री के तौर पर शेख हसीना के तीसरे कार्यकाल में बांग्लादेश अब भारत में आतंक-वादी गतिविधियां चलाने वाले आतंकवादी समूहों के लिए उस तरह जन्नत नहीं रह गया है, जैसा पहले हुआ करता था.
21 जनवरी को शेख हसीना ने बांग्लादेशी फौज का शुक्रिया अदा किया कि उसने चुनी हुई सरकार के खिलाफ साजिश को नाकाम कर दिया. इस दौरान सेना ने गद्दार अफसरों के खिलाफ कोर्ट ऑफ इंक्वायरी बैठाने के लिए काफी तेजी से कदम बढ़ाया है. सेना के आला अफसरों ने राष्ट्रपति को अपने सहयोग और धर्मनिरपेक्ष चरित्र के प्रति आश्वस्त किया है.
तख्तापलट की कट्टरपंथी कोशिश को नाकाम किए जाने के एक हफ्ते बाद राजधानी में एक सेमिनार में बांग्लादेश के सेना प्रमुख जनरल मैनुल इस्लाम ने कहा, ''बांग्लादेश की फौज में धार्मिक कट्टरपंथियों के लिए कोई जगह नहीं है.'' जाहिर है, बांग्लादेश की शेख हसीना सरकार के पास इस बात पर भरोसा करने के अलावा और चारा नहीं है.

