राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (एनएसी) चाहती है कि तैयार होने से लेकर अंतिम रूप दिए जाने तक, सभी तरह के विधेयक जनता की तेज नजर से गुजरें. आम तौर पर, जब किसी विधेयक को संसद में पेश किया जाता है तभी उसकी विषय सूची को सार्वजनिक किया जाता है. एनएसी एक 'पूर्व विधायी प्रक्रिया' को अंतिम रूप देने में लगी है.
इससे संसद में रखे जाने वाले विधेयक को कैबिनेट की मंजूरी मिलने से पहले उस पर सार्वजनिक चर्चा कराना पक्का हो जाएगा. यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब यूपीए सरकार लोकपाल, व्हिसल ब्लोअर्स और सांप्रदायिक हिंसा जैसे विधेयकों की विषय सूची को लेकर सिविल सोसाइटी से जुड़े कई समूहों के साथ विवाद में उलझी है.
अगर एनएसी की चली तो सरकार को विभिन्न कानूनों के बारे में जनता से 'सलाह-मशविरा' करने और उसके विभिन्न वर्गों के विचार संबंधित विधेयक में शामिल करने के मुश्किल दौर से गुजरना होगा.
एनएसी की सदस्य अरुणा रॉय का कहना है, ''ऐसे समय में जब एक महत्वपूर्ण कानून के मसौदे में लोगों की भागीदारी और उनके विचार शामिल करने की मांग उठ रही है, इन लोकतांत्रिक आकांक्षाओं को जगह दी जानी चाहिए.
सोच-विचार की एक ऐसी उचित प्रक्रिया स्थापित करना जरूरी है, जिससे न्यायपालिका और कार्यपालिका के विशेषाधिकारों का हनन न हो, लेकिन साथ ही नागरिकों को अपनी राय सामने रखने और उन पर विचार करवाने का मौका भी मिले.''
पूर्व विधायी प्रक्रिया के कुछ प्रमुख बिंदु इस प्रकार हैं:1.सभी प्रमुख विधेयकों और नीतियों की घोषणा की शुरुआत ग्रीन पेपर से की जाए जिसमें उसकी प्रमुख बातों को रखा जाए ताकि उस पर सार्वजनिक बहस हो सके.
2.इसके बाद दूसरा चरण व्हाइट पेपर का होगा जिसमें सरकार ठोस प्रस्ताव रखकर स्पष्ट करेगी कि उसके प्रस्तावों की क्या दिशा रहेगी.
3.किसी भी विधेयक के मसौदे पर ग्रीन या व्हाइट पेपर आए या न आए, लेकिन संसद में पेश किए जाने से दो महीने पहले उसे जनता के सामने रखा जाना चाहिए.
इस समय स्थिति यह है कि कानून बनने से पहले जनता अपनी राय तभी व्यक्त कर सकती है, जब विधेयक को संसद की स्थायी समिति के पास भेजा जाए, जो उस पर संसद का फैसला होने पर ही विचार करती है.
लेकिन सेज कानून सरीखे कई प्रमुख कानूनों को कभी स्थायी समिति के पास नहीं भेजा गया. अभी यह स्पष्ट नहीं है कि क्या एनएसी भविष्य में नीति नियंताओं और जनमत के बीच अंतर फलक के रूप में बड़ी भूमिका निभाएगी.
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