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क्या भारत ने मानसून को पीछे छोड़ दिया है?

अतीत में कमजोर मानसून अकाल और भुखमरी जैसे हालात लेकर आया. लेकिन अब सबसे बुरी बात यह हो सकती है कि विकास दर में 0.5 फीसदी की गिरावट देखने को मिल खराब मानसून से फर्क तो पड़ता है. लेकिन हाल में मैंने यह देखा है कि मानसून अच्छा न होने से जीडीपी वृद्धि दर पर 0.5-1 फीसदी से ज्‍यादा असर नहीं होता खेती से होने वाली आमदनी पर अब गांवों की निर्भरता घटी.

खेती
खेती
अपडेटेड 6 जनवरी , 2012

चाणक्य के खेती से जुड़े अधिकारी गण या अधीक्षकों के जिम्मे बारिश की हालत को देखते हुए बुआई को नियंत्रित करने का काम था. अगर साल 2010-11 में वित्त मंत्री ने इंद्र देव की मदद मांगी और साल 2011-12 में उन्होंने इंद्र को धन्यवाद दिया तो ऐसा करके वे एक पुरानी परंपरा का पालन कर रहे थे.

4 जनवरी 2012: तस्‍वीरों में देखें इंडिया टुडे

विष्णु पुराण में भी एक खासी चर्चित प्रार्थना है, जिसमें इंद्र देव संपन्नता की खातिर लक्ष्मी का स्मरण करते हैं. हजारों साल बीतने के बाद भी भारत के कुछ हिस्सों की स्थितियों में कोई बदलाव नहीं आया है और यहां इंद्र और लक्ष्मी की पूजा जारी है.

28 दिसम्‍बर 2011: तस्‍वीरों में देखें इंडिया टुडे

एक समय था जब कमजोर मानसून की वजह से अकाल और भुखमरी जैसी स्थिति बनती थी. लेकिन आज की तारीख में कमजोर मानसून इतना भयावह नहीं हो सकता है. हालांकि, मानसून की कमजोरी या खराब मानसून सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) दर के बढऩे पर उलटा असर डालता है लेकिन यह बात साफ होनी बेहद जरूरी है कि आखिर खराब से हमारा आशय क्या है. औसत बारिश अप्रासंगिक है. जो चीज मायने रखती है वह सामयिक और इसका भौगोलिक विस्तार है.

21 दिसम्‍बर 2011: तस्‍वीरों में देखें इंडिया टुडे

आजादी मिलने के बाद छह दशक से ज्‍यादा का वक्त बीतने के बाद यह बात असहनीय होनी चाहिए कि विस्तृत भौगोलिक दायरे के बावजूद हम कम उत्पादकता और जीविकोपार्जन के स्तर की खेती पर अटके हुए हैं. सवाल यह भी है आखिर हमें मनरेगा की जरूरत क्यों हुई? क्योंकि हमारे यहां सिंचाई की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है. सिंचाई, खेती को आधुनिक बनाने का एक कारक है.

14 दिसंबर 2011: तस्‍वीरों में देखें इंडिया टुडे

कुल खेतिहर क्षेत्र का 56 फीसदी हिस्सा अब भी वर्षा सिंचित है. सीधे तौर पर यह बारिश पर निर्भर करता है और परोक्ष रूप में यह भूमिगत जल और इसके दोबारा भरने पर निर्भर है. 56 फीसदी का यह औसत आंकड़ा है, खाद्य और गैर खाद्य फसलों के बीच भिन्नता है. खाद्य फसलों की तुलना में गैर खाद्य फसलों के लिए वर्षा ज्‍यादा अहम है.

07 दिसंबर 2011: तस्‍वीरों में देखें इंडिया टुडे

खाद्य फसलों के बीच मानसून की बारिश मोटे अनाज की तुलना में दालों के लिए ज्‍यादा महत्वपूर्ण है. जहां तक गैर-खाद्य फसलों की बात है तो मौसमी बारिश तिलहन के लिए ज्‍यादा अहमियत वाली है.

आम तौर पर कमजोर या खराब मानसून दालों और खाद्य तेल के लिए बुरी खबर होती है. इससे इन चीजों की महंगाई में उछाल देखने को मिल सकता है. इसके अलावा जानबूझकर या अनजाने में लिए गए फैसलों से स्थिति जटिल हो जाती है, जिसके तहत कीमतों में आई अस्थिरता में नरमी लाने की खातिर व्यापार नीतियों का दक्षता के साथ इस्तेमाल नहीं किया जाता.

30 नवंबर 2011: तस्‍वीरों में देखें इंडिया टुडे

ऐसे मुल्कों की तादाद भी ज्‍यादा नहीं है, जहां से हम दालों का आयात कर सकें. पर्याप्त फसल बीमा न होने और नीतियों में होने वाली देरी के बारे में कुछ अलग बिंदु हैं. इसके अलावा मौसम विभाग के अनुमान का प्रदर्शन भी बहुत अच्छा नहीं है.

मानसून और खेती के बीच रिश्तों का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) पर असर को लेकर उलझन की स्थिति है. जीडीपी में खेती का योगदान करीब 15 फीसदी के स्तर पर है और इसमें लगातार गिरावट आ रही है. कृ षि और खेती एवं संबंधित गतिविधियों के बीच अंतर एक महत्वपूर्ण पहलू बना हुआ है.

जीडीपी मार्केटेड वस्तुओं और सेवाओं की वैल्यू है. हालांकि, जहां तक आरोपों की बात है तो वह खुद के लिए बनाए गए हैं. लेकिन अहम बात यह है कि जीडीपी में खेती का सबसे ज्‍यादा योगदान सिंचित राज्‍यों या राज्‍यों में आने वाले सिंचित क्षेत्रों का है.

ओडिसा, बिहार, हिमाचल, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश के कुछ हिस्सों, पश्चिम बंगाल के कुछ हिस्सों, कर्नाटक में कुछ जगहों पर और उत्तर प्रदेश के पूर्वी इलाकों में सिंचाई की सुविधा बढ़ाई जानी चाहिए (राजस्थान में ज्‍यादा दिक्कत हैं). ये सभी राज्‍य और क्षेत्र आज की तारीख में एग्रीकल्चर जीडीपी में ज्‍यादा योगदान नहीं करते हैं. विकास दर पर बुरे मानसून का असर उससे कहीं कम होता है जितना हम पैदावार वाले क्षेत्र पर उसका असर आंकते हैं.

इस मामले में बिहार मिसाल है. अगर कहीं अच्छा मानसून होता है तो यह जीडीपी के लिए अच्छा होता है. लेकिन जहां तक बिहार की बात है तो मानसून की वजह से बिहार में बाढ़ आ जाती है और यह जीडीपी के लिए अच्छा नहीं है.

अगर खरीफ की फसल खराब होती है तो इसकी भरपाई रबी की अच्छी फसल से हो सकती है. वृद्धि की दर इस बात पर निर्भर करती है तो पिछले साल इस मोर्चे पर प्रदर्शन कैसा रहा (बेस इफव्क्ट का मतलब है कि साल 2011-12 में कम वृद्धि और साल 2012-13 में ऊंची विकास दर).

हालांकि, इन मिसालों के लिहाज से देखें तो खराब मानसून से कई तरह का फर्क पड़ता है. इससे किसानों की आमदनी घट जाती है. साथ ही इससे विभिन्न उत्पादों की मांग में भी कमी आती है. खराब या कमजोर मानसून जीडीपी वृद्धि दर में 0.5 फीसदी से 1 फीसदी से अधिक की गिरावट नहीं ला सकता है.

हम इसे और स्पष्ट करते हैं. अगर लोगों से सवाल पूछा जाए कि भारत की कु ल आबादी का कितना फीसदी हिस्सा खेती करता है तो ज्‍यादातर प्रतिक्रियाएं 50 फीसदी से थोड़ा ज्‍यादा वाली होंगी (कुछ जवाबों में यह 55 फीसदी तक पहुंच सकता है).

हालांकि, यह केवल पुरुषों का आंकड़ा (इसमें महिलाएं शामिल नहीं हैं) है. इसके अलावा ये पुराने आंकड़े हैं, क्योंकि साल 2004-05 के बाद से नेशनल सैंपल सर्वे (एनएसएस) के पास संतोषजनक आंकड़े नहीं हैं.

कुल आबादी का 50 फीसदी हिस्सा खेती में लगा है, यह जवाब तो उस सवाल के बदले मिला, जिसमें लोगों के प्रमुख पेशे की बात की गई थी. जिन महीनों में खेती नहीं होती है, उन महीनों में किसान या खेती से जुड़े लोग दूसरे पेशों का रुख करते हैं. अगर ऐसा न हो तो लोगों का गुजारा मुश्किल हो जाए.

राष्ट्रीय आमदनी खातों में केंद्रीय सांख्यिकीय संगठन के पास दो श्रेणियां हैं-निर्माण और व्यापार, होटल, ट्रांसपोर्ट और संचार. ग्रामीण भारत में इन रोजगार माध्यमों में लगातार वृद्धि की प्रवृत्ति दिख रही है और एनएसएस के विभिन्न दौर से यह बात स्पष्ट है. हालांकि, यह एक समान रूप में पूरे भारत में नहीं हुआ.

लेकिन कई हिस्सों में ऐसा हुआ है. साथ ही इससे यह बात भी जाहिर हो जाती है कि आखिर क्यों ग्रामीण आमदनी और मांग में बढ़ोतरी देखने को मिली है.

यह अकेले कर्ज माफी और मनरेगा से नहीं है. ग्रामीण आमदनी फिलहाल खेती से हासिल होने वाली आय से कहीं ज्‍यादा अलग हो गई है.भूमि मालिक और खेतिहर मजदूर के बीच का भेद एक तरह से कृ त्रिम हो सकता है, क्योंकि अब यह अंतर बहुत धुंधला हो गया है.

ग्रामीण मजदूरों के लिए मनरेगा का भी आसरा है. हम जानते हैं कि मनरेगा से कोई खास लाभकारी चीजें हासिल नहीं हो सकी हैं. इसने आपूर्ति के स्तर पर बगैर बदलाव किए मांग में इजाफा कर दिया. मनरेगा के योजनाकरों ने शायद अमेरिकी अर्थशास्त्री कींस से प्रेरणा ली, लेकिन उन्होंने कींस के उद्धरण को गलत तरीके से सामने रखा.

कींस ने महामंदी के दौरान लोगों को रोजगार देने के लिए नालियां खोदने और दोबारा उन्हें काम पर लगाने की खातिर उन नालियों को भरने वाली बात कही थी. हालांकि, उस समय संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल मुमकिन नहीं था अब ऐसा है. कींस के पैदा होने से 100 साल पहले एक स्वदेशी पूर्ववर्ती की भी मिसाल मिलती है.

यह साल 1783 में असफु द्दौला के द्वारा लखनऊ में बनवाया गया बड़ा इमामबाड़ा है. इस इमामबाड़े को अकाल और भुखमरी के दौरान लोगों को रोजगार देने की खातिर बनवाया गया था. इस इमामबाड़े को तैयार करने की खासियत यह रही कि दिन के वक्त तो मजदूर इसमें निर्माण संबंधी काम करते थे, लेकिन प्रतिष्ठित और राजसत्ता से जुड़े लोग रात में उसे गिरा देते थे, ताकि अगली सुबह लोगों को फिर से काम मिल सके.इस कहानी में नौकरशाही को सीख दी गई है.

हालांकि, हम अब मनरेगा से जुड़े मुद्दे को एक किनारे रख, अहम मसले पर आ जाते हैं. असल मुद्दा यह था कि हम खेती से जुड़े लोगों के लिए रोजगार के मौके बनाना चाहते थे और इसके लिए हमने कोशिश की ताकि सही दिशा में ग्रामीण क्षेत्र के सुधारों को अमलीजामा पहनाया जा सके.

इन कोशिशों से मनचाही मंजिल नहीं मिली. हालांकि, ये सारी चीजें मनरेगा और निर्माण, व्यापार, होटल, ट्रांसपोर्ट और संचार के जरिए 'ईं. इसके अलावा, खराब मानसून असल समस्या से ध्यान भटकाने का एक सुविधाजनक माध्यम होता है. इस सब के बीच, एक सवाल बरकरार है कि आखिर वृद्धि दर 9 फीसदी से घटकर 7 फीसदी पर क्यों आ गई?

ऐसे हालात में भी सरकार का ध्यान असल दिक्कतों और नीतिगत मसलों पर नहीं जा रहा, वह इस स्थिति के लिए वैश्विक संकट को दोषी ठहराएगी.

अगर साल 2012-13 में इंद्र की मेहरबानी के बावजूद वृद्धि दर के मोर्चे पर प्रदर्शन कमजोर रहता है तो सरकार को नीतियों के अलावा दोष मढ़ने के लिए दूसरे विकल्प तलाशने पड़ सकते हैं. इंद्र की हैसियत खत्म हो रही है लेकिन सरकार चाहती है कि उनका वजूद बना रहे.

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