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मनमोहन सिंह अधिकार जताएं या घर जाएं

राष्ट्र के पास ऐसे प्रधानमंत्री पर अफसोस जताने का वक्त नहीं है जो अपने जायज अधिकार भी नहीं जताता. या तो नियंत्रण  जताने के लिए या बाहर निकल जाने के लिए हिलने-डुलने की बजाए मनमोहन सिंह लगता है, जम गए हैं.

अपडेटेड 2 जुलाई , 2011

मनमोहन सिंह की कशमकश अवांछनीय है. वे अभी भी तय नहीं कर पा रहे हैं कि उन्हें भारत की जनता ने निर्वाचित किया है या सोनिया गांधी ने चुना है. 'दोनों' को यह श्रेय देना समझैता है, जो सामान्य हालात में तो ठीक चलता है पर मुश्किल घड़ी के पहले ही संकेत में बिखर जाता है.

सोनिया गांधी की समस्या प्रतिकूलता की पेचीदगी हैः आप मुक्ति वाहिनी को तो कह सकते हैं कि यह कोई सेना नहीं होती लेकिन यह नहीं कह सकते कि कोई मुक्ति या मोक्ष नहीं होता. मोक्ष का कांग्रेसी चेहरा मनमोहन नहीं, राहुल गांधी हैं. यही सरकार और पार्टी के बीच अलगाव पैदा करता है.

लिहाजा, दिग्विजय सिंह जैसे वरिष्ठ पार्टी पदाधिकारियों को अपनी मर्जी से मनमोहन को नजरअंदाज करने में कोई गुरेज नहीं होता. दिग्विजय सिंह बिहार चुनाव अभियान की विपदा या तमिलनाडु में शर्मनाक हार के बाद भी क्या राहुल गांधी की आलोचना करने की हिम्मत जुटा सकते हैं? नहीं. उन्हें मालूम है कि कांग्रेस में रोजी-रोटी कहां है. वे उनके प्रतिफल हैं जो लगातार मांग करते हैं कि राहुल गांधी को फौरन मनमोहन की जगह बैठाया जाए. राष्ट्रीय प्रधानमंत्री के मुकाबले काल्पनिक प्रधानमंत्री का कांग्रेस में ज्‍यादा दबदबा है.

सपनों का साम्राज्‍य खड़ा करने वाले एक दिग्गज व्यापारी कहा करते थे कि अगर कार एक ड्राइवर चला रहा हो तो रास्ते से भटकने की संभावना हमेशा रहती है; लेकिन अगर दो ड्राइवर हों तो कार का दुर्घटनाग्रस्त होना तय है. यूपीए सरकार में तीन ड्राइवर हैं, सभी आगे की सीट पर बैठे हैं. मनमोहन सिंह को कार की चाबी थमाए बिना स्टीयरिंग व्हील पर बैठा दिया गया है.

अगर कुछ आगे नहीं बढ़ता तो उन्हें दोषी ठहराया जाता है. जब वे कोशिश करके उसे आगे बढ़ाते हैं तो ड्राइवर और दिशानिर्देशक प्रायः अलग-अलग लक्ष्य की ओर बढ़ रहे होते हैं. सोनिया गांधी का एजेंडा लोकलुभावन उपायों पर आधारित है, उनका मानना है कि उन्हीं उपायों से राहुल गांधी निर्वाचित होने योग्य बन जाएंगे; मनमोहन वित्तीय जिम्मेदारियों की सीमाओं में सीमित हैं. भ्रष्टाचार के क्षयकारी प्रबंधन या कुप्रबंधन समेत हर मुद्दे से आंतरिक विरोधाभास झ्लकने लगते हैं.

मनमोहन 2004 में प्रधानमंत्री बने लेकिन उन्हें एक उच्चतर अथॉरिटी के साथ सत्ता की साझेदारी करनी थी. 2007 के बाद उन्हें अपने पद के विशेषाधिकारों से भी वंचित कर दिया गया. उन्हें ऐसे प्रतीक्षा कक्ष में पहुंचा दिया गया जहां उन्हें उस रोज तक इंतजार करना है जब तक राहुल गांधी प्रधानमंत्री बनकर भारतीयों पर एहसान करने के लिए पूरी तरह तैयार नहीं हो जाते. लेकिन राष्ट्र के पास ऐसे प्रधानमंत्री पर अफसोस जताने का वक्त नहीं है जो अपने जायज अधिकार भी नहीं जताता. हर प्रतीक्षा कक्ष में एक दरवाजा होता है. आप हमेशा उसी दरवाजे से बाहर निकल सकते हैं, जिससे अंदर जाते हैं.

मनमोहन हिलने-डुलने, चाहे अपना नियंत्रण जताना हो या बाहर निकलना, की बजाए जमकर अकड़ गए लगते हैं. यह अकड़न उनकी स्वर नली में भी है क्योंकि ऐसे माहौल में विनम्रता साफ झ्लक सकती है जिसमें उनके पार्टी नेताओं को सार्वजनिक रूप से उन पर तंज

करने की इजाजत है. मनमोहन विनम्र व्यक्ति हैं, लेकिन कारगर प्रधानमंत्री शर्मिंदगी के हालात में अपनी गलती मानने के लिए मजबूर नहीं होते. उन्हें लंबे समय से अपनी स्वर नली को ढीली करने के लिए मनाया जा रहा है, और हमें पता चला है कि वे मीडिया के साथ ''नियमित'' रूप से, शायद हर हफ्ते चाय पिएंगे. संदेशवाहक को मार गिराने की बजाए उससे बात करना हमेशा बेहतर रहता है, लेकिन यहां निश्चित रूप से यह सवाल उठता है कि क्या विरोधाभासों का कोई समाधान है, जिन्होंने शासन को जकड़ रखा है.

कोई सरकार शासन के बिना कितने लंबे समय तक बनी रह सकती है? इसका तकनीकी जवाब सबको मालूम है. संसद में बहुमत को प्रायः ''क्रूर'' करार दिया जाता है क्योंकि यह लोकभावना के लिए अभेद्य हो सकता है. अगर कांग्रेस मानती है कि सरकार और विपक्ष, दोनों हो सकती है, वह सत्ता के लाभ उठाते हुए एक बलि के बकरे प्रधानमंत्री के खिलाफ जनभावनाएं भड़का सकती है तो उसे अगले चुनाव में महंगी कीमत चुकानी होगी. दोहरापन कारगर नहीं होता.

मनमोहन कम बोलने वाले ऐसे इंसान हैं, जिनकी भावनाएं शायद ही दिखती हैं. लेकिन वे अपनी परेशानी को लंबे समय तक छुपा नहीं पाते. उन्होंने सार्वजनिक तौर पर कभी कहकहे नहीं लगाए, यहां तक कि खुशी की घड़ियों में भी नहीं, लेकिन उन्होंने यदा-कदा वह मुस्कान बिखेरी जो उनकी दाढ़ियों से फूटकर बाहर निकली, बहुत सादगी के साथ.

परमाणु विधेयक पर विजय, जिसने 2009 में दोबारा चुने जाने के लिए मूड तय कर दिया, के बाद वे दमक-से रहे थे. अपनी जिंदगी के बेहतरीन पलों के दो साल के भीतर ही उनकी मुस्कान गायब हो गई है. उन्हें या तो वह मुस्कान लानी चाहिए या फिर घर चले जाना चाहिए.

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