तद्भवः आख्यान पर एकाग्र
संपादकः अखिलेश
18/201, इंदिरा नगर, लखनऊ-16,
कीमतः 50 रु.
एक गंभीर पत्रिका तद्भव अपने चौबीसवें पड़ाव पर पाठकों के बीच है, आख्यान पर एकाग्र अंक लेकर. इस अंक में काशीनाथ सिंह की कहानी महुआ चरित्र को संपादक ने शायद इसलिए शुरू में रखा है कि जिससे यह नए कहानीकारों के लिए एक प्रतिमान हो. लेकिन सिंह काशी का अस्सी के अपने प्रतिमान से आगे नहीं बढ़ पाते.
महुआ साजिद और हर्षुल दोनों का उपयोग-उपभोग तो करती है अपने खालीपन को भरने के लिए लेकिन वह उन दोनों को इसकी इजाजत नहीं देती. मुक्ति अकेले की नहीं होती. वहीं पुरोहित जिसने मछलियां पालीं की मैना रामदत्त से प्रेम करती है और शादी मछेरे के साथ करके खुश रहना चाहती है. वह दोनों के प्रति ईमानदार है.
शिवमूर्ति कम लिखते हैं, अच्छा लिखते हैं. किस्सागोई की उनकी अपनी शैली है. ख्वाजा ओ मेरे पीर कोई मील का पत्थर भले न गाड़ती हो लेकिन कसाईबाड़ा के कहानीकार की ही यह कहानी है, इसका एहसास जरूर कराती है. योगेंद्र आजा की कहानी एक्युरेट पैथॉलॉजी अपने शैलीगत दुहराव के बावजूद अपने समय के सामाजिक कंसर्न से जुड़ी कहानी है.
अपने बेहतरीन गद्य के लिए जाने जाते राजेश जोशी की गाइबबाज में उनके गद्य की नई बानगी है और अपूर्व किस्सागोई है. महिला कथाकारों में सारा राय अपनी कहानी अपराध में स्मृति से जूझ्ती हैं तो नीलाक्षी सिंह साया कोई में आज के वर्तमान से. दोनों ही कहानियां ध्यान से पढ़ी जानी चाहिए. युवा उपन्यासकार के नाम पत्र मारियो वर्गस लोसा का है, जो काफी पहले रिल्के के युवा कवि के नाम पत्र की याद दिला जाता है.
राजकुमार के एक लेख कहानी पच्चीस साल की की ये पंक्तियां कितनी माकूल हैं: ‘कहानी ट्रीटमेंट और भाषा की विशिष्टता को छोड़ दें तो समूची कहानी यथार्थवादी ढर्रे पर ही आगे बढ़ती है.’ पिछले पच्चीस वर्षों में कहानी का पूरा परिदृश्य बदल चुका है और इस बदले समय के बारे में ज्ञानरंजन का कहना एकदम सटीक है कि ‘साहित्य और राजनीति के बीच किसी भी तरह का फर्क गायब हो चुका है.
इसमें छोटे द्वीप ही नहीं आर्थिक सचाइयां भी काम कर रही हैं और नए रचनाकारों को अपने उन्मेष के लिए लगभग दिशाहीनता से जूझना पड़ रहा है.’ इस दिशाहीन जूझने में अखिलेश के संपादकीय चयन के विवेक से नए रचनाकारों को मदद मिलेगी.

